Monday, September 9, 2019

राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य क्षेत्र को संवारने में उजड़ रहे आदिवासियों के आशियाने

राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य क्षेत्र को संवारने में उजड़ रहे आदिवासियों के आशियाने 

विशेष संपादकीय
मध्यप्रदेश में 46 अनुसूचित जनजाति रहती है, जिसमें तीन समुदाय को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है। जनगणना वर्ष 2011 के अनुसार मध्यप्रदेश की कुल आबादी 7 करोड़ 26 लाख में आदिवासियों की जनसंख्या 1 करोड़ 53 लाख है अर्थात 21.1 प्रतिशत है। राज्य में 10 राष्ट्रीय पार्क एवं 25 अभयारण्य हैं, जो कि 10 हजार 882 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। प्रदेश के कुल 52 हजार 739 गाँवों में से 22 हजार 600 गाँव या तो जंगल में बसे हैं या फिर जंगल की सीमा से सटे हुए हैं। इसमें 925 वन ग्राम हैं जो कि कुल वन क्षेत्र का 11.40 प्रतिशत है। शुरूआती दौर में इन राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्यों से 94 गाँव के 5 हजार 460 परिवारों को विस्थापित  किया जा चुका है, जिनका कोई पुनर्वास नहीं हुआ तथा अब कोर एरिया बढ़ाने के नाम पर 109 गाँव के 10 हजार 438 परिवारों को हटाये जाने की कार्यवाही जारी है ।  इन्ही राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्यों के क्षेत्रों के लिए में 426 गांव के 38 हजार 778 परिवारों को संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं के पुनर्निर्माण (realignment) से बाहर किया जाना (Excision) प्रस्तावित  है ।

कान्हा के 161 गांव तथा पेंच के 99 गांव है शामिल

10 राष्ट्रीय पार्कों में से कान्हा, पेंच, सतपुड़ा, बांधवगढ़, पन्ना एवं संजय धुबरी को 1973 से टाईगर रिजर्व घोषित किया गया है। जिसका कोर एरिया 4773.627 वर्ग किलोमीटर है। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 तथा संशोधित 2006 की धारा 38(4)(।।) के अन्तर्गत प्रत्येक टाईगर रिजर्व में बफर क्षेत्र अधिसूचित किया जाना अनिवार्य है। बफर क्षेत्र क्रिटिकल टाईगर हेबीटेट या कोर क्षेत्र का वह हिस्सा है, जहां कम प्रतिबंध लगाया जाता है। इन 6 टाईगर रिजर्व के लिए 2010 से बफर जोन की अधिसूचना जारी कर 6318.72 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बढ़ाया है। जिसमें कान्हा के 161 गांव तथा पेंच के 99 गांव शामिल है। ताडोबा, नवेगांव (महाराष्ट्र) से पेंच, कान्हा एवं अचानकमार(छत्तीसगढ़) तक वन्य प्राणी गलियारा (कॉरिडोर)बनाने की योजना है जिसमें प्रदेश के सिवनी, छिन्दवाङा, बालाघाट, मंडला एवं डिंडोरी जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र शामिल है।

शहरों के झुग्गी बस्तियों में रहने को मजबूर हैं आदिवासी समुदाय                   

इन क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय को वन अधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत सामुदायिक अधिकार पत्र देने में अवरोध पैदा किया जा रहा है। जंगली जानवर इनके फसल तथा मवेशियों को भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाते हैं परन्तु किसी तरह की क्षतिपूर्ति पार्क संचालकों द्वारा नहीं दिय़ा जाता है। बफर जोन में अनेक तरह प्रतिबंधों के कारण आवागमन, निस्तार,लघु वनोपज संग्रहण, मवेशी चराई तथा खेती पर भारी संकट के कारण आदिवासी समुदाय पलायन करने को मजबूर है। कोर एरिया में शामिल अथवा संरक्षित वन क्षेत्र से विस्थापित करने के पहले वन अधिकार कानून 2006 की धारा 4(2) के अनुसार राज्य सरकार राज्य स्तरीय समिति का गठन करेगी, जिसमें ग्राम सभा के लोग भी होंगे, जो यह अध्ययन करेगी कि वन्य प्राणी पर प्रभाव अपरिवर्तनीय नुकसान के लिए पर्याप्त हैं और उक्त प्रजाति के अस्तित्व और उनके निवास के लिए खतरा है। अध्ययन में यह बात साबित होने के बाद  ही विस्थापन की कार्यवाही नियमानुसार किये जाने प्रावधान है परन्तु ऐसी कोई प्रकिया नहीं अपनाते हुए सीधे ग्रामवासियों को हटाने का नोटिस जारी किया जा रहा है। अपने संसाधनों से उजड़कर आदिवासी समुदाय रोजगार की तलाश में शहरों के झुग्गी बस्तियों में रहने को मजबूर हैं। सस्ते मजदूर के रूप में जबलपुर, नागपुर, नरसिंहपुर, भोपाल आदि शहरों में काम कर रहे हैं ।
लेखक
राज कुमार सिन्हा 
9424385139

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