Tuesday, October 1, 2019

एससी/एसटी एक्ट सुप्रीम कोर्ट ने वापस लिया पुराना फैसला, अब बिना जांच दर्ज की जा सकेगी एफआईआर

एससी/एसटी एक्ट सुप्रीम कोर्ट ने वापस लिया पुराना फैसला, अब बिना जांच दर्ज की जा सकेगी एफआईआर 

केस दर्ज होते ही होगी गिरफ्तारी, आरोपी को नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत 

एससी/एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी उत्पीड़न और भेदभाव का करना पड़ रहा है सामना 

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत गिरफ़्तारी के प्रावधानों को हल्का करने संबंधी अपना पुराना फैसला वापस ले लिया है। वहीं 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तारी के प्रावधानों को हल्का किया था। इसके मुताबिक एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ़्तारी से छूट दी गई थी। हालांकि इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने रिव्यू याचिका दाखिल की, जिस पर जस्टिस अरुण मिश्रा के नेतृत्व में जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी आर गवई की सदस्यता वाली कमेटी ने दो न्यायाधीशों के फैसले को पलट दिया है।

नई दिल्ली। गोंडवाना समय। 
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में अपने पुराने फैसले को वापस ले लिया है। माननीय सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस एक्ट के तहत बिना जांच के एफआईआर दर्ज की जा सकेगी। यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों को हल्का करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते समय लिया गया है। बता दें कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट में संशोधन कर उसे मूल स्वरूप में बहाल करने के विरोध में सवर्ण समुदाय के लोगों ने 6 सितंबर को भारत बंद का आह्वान किया था। देश के कई इलाकों में बंद को सफल कराने के लिए प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे थे। मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भारत बंद कराने के लिए सवर्ण समुदाय के लोग सड़क पर थे। उस दौरान कहीं दुकानें बंद कराई गई थी तो कहीं आगजनी की गई थी। 
सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में अपना पुराना फैसला वापस ले लिया है। अब इस एक्ट के तहत बिना जांच के एफआईआर दर्ज की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों को हल्का करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनाया है। अब सरकारी कर्मचारी और सामान्य नागरिक को गिरफ्तार करने से पहले अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। इससे पहले शिकायत दर्ज करने के बाद जांच करने पर ही एफआईआर दर्ज करने के कोर्ट ने आदेश दिए थे। अब कोर्ट ने यह बदल दिया है, अब अब पहले जांच जरूरी नहीं है। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस बी आर गवई की पीठ फैसला ने सुनाया फैसला। 

ऐसे में इस कानून को डायल्यूट करने का नहीं है कोई औचित्य 

तीन सदस्यीय बेंच ने कहा अदालत वह काम नहीं कर सकती जो काम विधायिका के जरिए संभव नहीं हो। माननीय सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की बेंच ने ये भी माना कि एससी/एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में इस कानून को डायल्यूट करने का कोई औचित्य नहीं है। इस फैसले के बाद अब एफआईआर दर्ज होने से पहले की जाने वाली जरूरी जांच की बाध्यता भी खत्म हो गई है। 

सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में किया था पहले किया था यह बदलाव

सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए कहा था कि मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। कोर्ट ने कहा था कि शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा भी दर्ज नहीं किया जाएगा। शीर्ष न्यायालय ने कहा था कि शिकायत मिलने के बाद डीएसपी स्तर के पुलिस अफसर द्वारा शुरूआती जांच की जाएगी और जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक नहीं होगी। डीएसपी शुरूआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है या फिर किसी तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा था कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। 

संशोधन के बाद अब ऐसा होगा एससी/एसटी एक्ट

एससी\एसटी संशोधन विधेयक 2018 के जरिए मूल कानून में धारा 18 अ जोड़ी जाएगी। इसके जरिए पुराने कानून को बहाल कर दिया जाएगा। इस तरीके से सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए प्रावधान रद्द हो जाएंगे। मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान है। इसके अलावा आरोपी को अग्रिम जमानत भी नहीं मिल सकेगी। आरोपी को हाईकोर्ट से ही नियमित जमानत मिल सकेगी। मामले में जांच इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर करेंगे। जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होगा। एससी/एसटी मामलों की सुनवाई सिर्फ स्पेशल कोर्ट में होगी। सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को अथॉरिटी से इजाजत नहीं लेनी होगी। 

तब मोदी सरकार को काफी आलोचनाओं का करना पड़ा था सामना 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 20 मार्च, 2018 के फैसले को संविधान के मूल भावना के विरुद्ध बताते हुए पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। जब ये फैसला आया था तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था कि वह एससी/एसटी समुदाय के लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उस वक़्त आया है जब महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों में 29 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं जबकि राज्य में करीब 13 फीसदी मतदाता अनुसूचित जाति वर्ग से हैं। जबकि हरियाणा की 90 में 17 सीटें आरक्षित हैं और राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी 21 प्रतिशत है।

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