Friday, December 6, 2019

भारत के इतिहास के पन्नों में लिखा रहेगा बाबा साहब का स्वर्णाक्षरों में नाम

भारत के इतिहास के पन्नों में लिखा रहेगा बाबा साहब का स्वर्णाक्षरों में नाम

उनके मानवता के प्रति किए गए कार्यों को किया जायेगा हमेशा याद 

हर व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य बाबा साहेब को पढ़ना चाहिए

63 वीं पुण्यतिथि पर बाबा साहेब को अश्रुपूरित श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके चरणों में कोटि कोटि नमन 


विशेष संपादकीय 
डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे, प्र्रोफेसर एम्स भोपाल
आज बाबा साहेब जी की 63 वीं पुण्यतिथि है और आज के दिन ही यानी 6 दिसंबर 1956 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी। डॉ भीम अम्बेडकर जी का इस धरती पर अवतरण 14 अप्रैल 1891 को हुआ था और वे बहुत लंबा जीवन नहीं जी पाए लेकिन मात्र 65 वर्ष 7 माह और 22 दिन के जीवन काल में बाबा साहेब ने जो कार्य कर दिया उसके लिए सामान्य व्यक्ति को सदियाँ लग जाएँगी, फिर भी वो उस मुकाम तक नहीं पहुँच पायेगा।

पूरा विश्व उनकी प्रतिभा का मानता है लोहा 

बाबा साहेब अद्वितीय प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री थे। बाबासाहब एक कुशल राजनीतिज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद् दार्शनिक, लेखक, विचारक, पत्रकार,समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, धर्मशास्त्री, इतिहासविद्, प्रोफेसर, संपादक और समाज सुधारक थे। इतनी विशेषताएँ एक ही व्यक्ति में हों ये बहुत कम देखने को मिलता है। पूरा विश्व उनकी प्रतिभा का लोहा मानता है और उनके व्यक्तिव की सराहना करता है ।

बचपन से ही समाजिक बुराइयों को खत्म करने का बीज पनपा

डॉ अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश में इंदौर शहर के निकट स्थित महू स्थित एक सैनिक छावनी में हुआ था। उनके पिता जी का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता जी का नाम भीमाबाई सकपाल था। वे अपने माता-पिता की 14 वीं संतान थे। उनके वंशज महाराष्ट्र के हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो एक दलित और अछूत जाति समझी जाती थी। इसके कारण बाबा साहेब को बचपन से ही सामाजिक और आर्थिक भेदभाव सहन करना पड़ा। उनके पिता जी तत्कालीन ब्रिटिश आर्मी में सूबेदार के पद पर थे और माता जी घरेलू महिला थीं। पढ़ाई लिखाई में अव्वल होने के बावजूद छात्र भीमराव को छुआछूत का सामना करना पड़ता था और यहीं से उनके जीवन में समाजिक बुराइयों को खत्म करने का बीज पनपा।

प्रारम्भिक शिक्षा का सघंर्ष 

बाबा साहेब बचपन महू में बिताने के बाद लगभग 9 वर्ष की उम्र में 7 नवम्बर 1900 को सतारा के गवर्नमेंट हाईस्कूल में दाखिला दिलवाया गया। बाबासाहेब के बचपन का नाम भिवा था और उनके पिता ने स्कूल में सरनेम सकपाल न लिखवाकर आंबेडकर लिखवाया जो कि उनके गाँव आंबडवे गांव से संबंधित था। महाराष्ट्र के बहुत सारे लोग अपने नाम के साथ गाँव का नाम लिखवाते थे। कुछ दिनों बाद उसी स्कूल के एक शिक्षक कृष्णा महादेव अम्बेडकर जो बाबासाहेब को बहुत मानते थे उन्होंने भिवा नाम के आगे से आंबडवेकर हटाकर अपना सरनेम अम्बेडकर लिखवा दिया और तब से आज तक वे आम्बेडकर नाम से जाने पहचाने जाते हैं। बचपन से 
बाबासाहेब गौतम बुद्ध और उनकी शिक्षा से प्रभावित रहे। कक्षा पाँचवीं उत्तीर्ण करने के बाद मुंबई के एलिफिस्टन रोड स्थित गवर्नमेंट हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की ।

अंबेडकर जी का वैवाहिक जीवन  

जब उनके पिता जी रामजी सकपाल का तबादला सन 1906 में हो गया तब वे सपरिवार बम्बई (मुंबई) आ गए थे। उस समय भीमराव लगभग 15 वर्ष आयु के थे और कक्षा 5 के छात्र थे क्यूँकि उनका दाखिला ही काफी लेट हुआ था। उसी समय उनके माता पिता ने नौ साल की लड़की रमाबाई से उनका बाल विवाह करवा दिया क्यूँकि 
उन दिनों दलित और नीची जातियों में बाल-विवाह का प्रचलन था। शादी के उपरांत इनके पाँच बच्चों में चार पुत्र (यशवंत, रमेश, गंगाधर, राजरत्न) और एक पुत्री इन्दु थी। दुर्भाग्य देखिए कि यशवंत' को छोड़कर कोई भी संतान जिदा नहीं रही और सबकी बचपन में ही मृत्यु हो गई थी।

बाबा साहेब का उच्च व विदेशी शिक्षा का सफर 

वर्ष 1908 में उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से संबद्ध एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया और आगे की शिक्षा पूर्ण की। सन 1912 में भीमराव ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की । वर्ष 1913 में, उन्हें बड़ोदा के राजा द्वारा लगभग 12 डालर प्रति माह की छात्रवृत्ति मिली जिसके 
कारण आम्बेडकर 22 साल की आयु में अमेरिका चले गए। जून 1915 में उन्होंने कोलम्बिया विश्वविध्यालय न्यूयार्क से कला स्नातकोत्तर (एमए) परीक्षा पास की। चूँकि छात्रवृत्ति केवल तीन वर्ष लिए ही थी इसलिए 1916 में आगे की शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड चले गये। अक्टूबर 1916 में उन्होंने ग्रेज इन में बैरिस्टर कोर्स (विधि अध्ययन) के लिए प्रवेश मिला और साथ ही उन्होंने लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में भी प्रवेश लिया जहां उन्होंने अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट थीसिस पर काम करना शुरू किया। वर्ष 1917 में कोलम्बिया यूनिवर्सिटी अमेरिका से राजनीति शास्त्र में पीएचडी पूरी की जो आधिकारिक रूप से उन्हें सन 1927 में अवार्ड हुई । इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्हें मुंबई के सिडनेम कॉलेज आॅफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। सन 1920 में वे फिर इंग्लैंड गए और 1921 में विज्ञान स्नातकोत्तर (एम॰एससी॰) प्राप्त की। वर्ष 1922 में ग्रेज इन से बैरिस्टर-एट-लॉज डिग्री मिलने बाद उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। वर्ष 1923 में उन्होंने अर्थशास्त्र में दूसरी डॉक्टरेट्स की डिग्री (डी॰एससी॰ ,डॉक्टर आॅफ साईंस) प्राप्त की। उसके बाद उन्होंने तीसरी डॉक्टरेट्स (एलएल॰डी॰) कोलंबिया विश्वविद्यालय से वर्ष 1952 में और चौथी डॉक्टरेट्स डिग्री (डी॰लिट॰) उस्मानिया विश्वविद्यालय से वर्ष 1953 में अर्जित की । डॉ अम्बेडकर ने शिक्षा के क्षेत्र में कई संगठनों जैसे डिप्रेस्ड क्लासेस एज्युकेशन सोसायटी, द बाँबे शेड्युल्ड कास्ट्स इम्प्रुव्हमेंट ट्रस्ट और पिपल्स एज्युकेशन सोसायटी की स्थापना की थी।

नौकरी और कार्य क्षेत्र-

अमेरिका और इंग्लैंड से उच्च शिक्षा लेकर लौटे डा भीम राव अम्बेडकर को बड़ोदा के महाराजा गायकवाड़ के सैन्य सचिव की नौकरी करनी पड़ी क्यूँकि उनके द्वारा आिर्थक मदद के कारण ही वे इतना पढ़ लिख सके थे लेकिन वहाँ भी उनकी जाति ने उनका पीछा नही छोड़ा और जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें सचिव पद छोड़ना पड़ा। गरीब परिवार और बच्चों को पालने के लिए उन्होंने मुंबई में कुछ दिनों अकाउंटेंट का कार्य भी किया लेकिन जातिगत भेदभाव के कारण वहाँ से भी भागना पड़ा। फिर कुछ दिनों तक वे एक निजी शिक्षक के रूप में भी कार्य किये। डॉ भीम राव अम्बेडकर ने एक निवेश परामर्श केंद्र खोला और लोगों को निवेश सम्बंधी परामर्श देना शुरू किया लेकिन जैसे ही लोगों को उनके अछूत होने की खबर लगी पूरा धंधा ही चौपट हो गया। फिर भी डॉ अम्बेडकर ने हार नही मानी और अपनी बैरिस्टर की डिग्री का उपयोग करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट में विधि और न्याय की प्रैक्टिस शुरू कर दी और उसके बाद से मृत्युपर्यन्त तक फिर कभी पीछे मुड़कर नही दखा।

सामाजिक जीवन और विभिन्न आंदोलनों में भूमिका

डॉ भीम राव अम्बेडकर ने दलित बौद्ध आंदोलन की शुरूआत की और अछूतों से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया। भारतीय श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों के लिए कई आंदोलनों में बढ़चढ़ कर नेतृत्व प्रदान किया। डॉ अम्बेडकर ने शिक्षा, सामाजिक और आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय संस्थान बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की। एक कुशल सम्पादक के रूप में उन्होंने पाँच महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं मूक नायक, बहिष्कृत भारत, समता, प्रबुद्ध भारत और जनता का सम्पादन किया और दलित और अछूतों की आवाज बने। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने 13 मार्च 1927 को समता सैनिक दल (समानता के लिए संगठन) नामक एक अन्य सामाजिक संगठन का गठन किया जो भारतीय समाज के सभी उत्पीड़ित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा का उद्देश्य से बनाया गया था। भीमा कोरेगाँव की लड़ाई में शहीद हुए भारतीय महार सैनिकों के सम्मान में डॉ अम्बेडकर ने 1 जनवरी 1927 को कोरेगाँव में एक शिलालेख पर सैनिकों के नाम लिखवाकर विजय स्मारक की स्थापना की और उसे दलित सम्मान के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जहाँ पर प्रतिवर्ष महार समुदाय के लोग इकट्ठा होते हैं ।

महाड़ आंदोलन

महाड़ का सत्याग्रह (चवदार तालाब सत्याग्रह व महाड का मुक्तिसंग्राम) डॉ अम्बेडकर की अगुवाई में 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के महाड स्थान पर हजारों दलितों ने भाग लिया जिसमें डॉ अम्बेडकर ने स्वयं तालाब का पानी पीकर उस तालाब को दलितों और अछूतों सभी के लिए खोल दिया फिर हजारों स
त्याग्रहियों ने उनका अनुकरण किया। यह डॉ अम्बेडकर का पहला सत्याग्रह था।

मनुस्मृति का दहन

दिनांक 25 दिसंबर सन 1927 को डॉ अम्बेडकर ने हजारों अनुयायियों के साथ मनुस्मृति की प्रतियों को जलाया था तब से लगातार उस स्मृति में प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस के मनाया जाता है।वर्ष 1930 में डॉ अम्बेडकर ने लगभग 15 हजार समर्थकों के साथ कालाराम मन्दिर सत्याग्रह शुरू किया जिससे नाशिक में बहुत प्रतिरोध हुआ और हिंदुओं द्वारा बहुत सारी प्रक्रियाएं हुईं। मंदिर में घुसने से रोकने के लिए ब्राह्मण पंडितों ने मंदिर के कपाट बंद कर दिए थे।

राजनैतिक आन्दोलन के प्रणेता और कुशल राजनीतिज्ञ

वर्ष 1925 में डॉ अम्बेडकर को साइमन कमीशन के बम्बई प्रेसीडेंसी समिति में अकेले भारतीय प्रतिनिधि के रूप में नामित किए गए । इस आयोग के विरोध में सम्पूर्ण भारत में प्रदर्शन हुये थे लेकिन डॉ अम्बेडकर ने भारतीयों के लिए महत्त्वपूर्ण संवैधानिक सुधार प्रस्तावित किए थे। डॉ अम्बेडकर ने अछूत समुदाय के लिये एक ऐसी 
राजनीतिक व्यवस्था और पहचान चाहते थे जिसमे कांग्रेस, महात्मा गांधी और ब्रिटिश तीनों का दखल ना हो। वे गांधी के अछूत वाले माडल के बहुत खिलाफ थे। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में डॉ अम्बेडकर ने लंदन में 8 अगस्त, 1930 को दुनिया के सामने दलित विमर्श और दलित समस्याओं पर अपनी राजनीतिक राय को रखा और शोषित वर्ग की स्वतंत्रता की बात की । वर्ष 1932 में ब्रिटिशों ने डॉ अम्बेडकर के विचारों के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा कर दी थी। पूना पैक्ट अथवा पूना समझौता डॉ भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में 24 सितम्बर, 1932 को हुआ था। इस समझौते में डॉ॰ अम्बेडकर को कम्युनल अवॉर्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ना पड़ा तथा आज प्रचलित संयुक्त निर्वाचन पद्धति को स्वीकार करना पड़ा परन्तु साथ हीं कम्युनल अवार्ड से मिली 78 आरक्षित सीटों की बजाय पूना पैक्ट में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर 148 करवा ली। 

बाबासाहेब स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री भी रहे

बाबासाहेब ने कई राजनीतिक संगठनों की नीव भी रखी थी जिसमें ये शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन, स्वतंत्र लेबर पार्टी, भारतीय रिपब्लिकन पार्टी तीन प्रमुख हैं। 29 अगस्त 1947 को आम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। बाबासाहेब स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री भी रहे। डॉ अम्बेडकर दो बार राज्य सभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद बने थे। राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका पहला कार्यकाल 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1956 के बीच था और उनका दूसरा कार्यकाल 3 अप्रैल 1956 से 2 अप्रैल 1962 तक आयोजित किया जाना था लेकिन कार्यकाल समाप्त होने से पहले, 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया।

किताबें-साहित्य, विशेष सम्मान और पुरस्कार

डॉ बाबासाहेब को बर्ष 1956 में बोधिसत्व सम्मान मिला इसके बाद उन्हें सन 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न मिला । इसके बाद 2004 में कोलंबियन अहेड आफ देयर टाइम और 2012 में द ग्रेटेस्ट इंडियन का सम्मान मिला। डॉ भीमराव अम्बेडकर बहुत ही प्रतिभाशाली और जुझारू लेखक थे। उनकी 32 किताबें और मोनोग्राफ (22 पूर्ण तथा 10 अधूरी किताबें), 10 ज्ञापन, साक्ष्य और वक्तव्य, 10 अनुसंधान दस्तावेज, लेखों और पुस्तकों की समीक्षा एवं 10 प्रस्तावना और भविष्यवाणियां आज भी उपलब्ध हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं में 1. रुपये की समस्या: इसका मूल और इसका समाधान, 2. बहिश्रुत भारत (भारत ओस्ट्रकाइज्ड), 3. जनता (साप्ताहिक), 4. मूक नायक (साप्ताहिक), 5. जाति का अनैहिकरण, 6. फेडरेशन वर्सस फ्रीडम, 7. पाकिस्तान पर विचार, 8. रानाडे, गांधी और जिन्ना, 9. श्री गांधी और अछूतों की मुक्ति, 10. कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया है, 11. पाकिस्तान या भारत का विभाजन, 12. राज्य और अल्पसंख्यक, 13. शूद्र कौन थे, 14. महाराष्ट्र एक भाषाई प्रांत के रूप में, 15. अछूत, 16. बुद्ध या कार्ल मार्क्स, 17. बुद्ध और उनके धम्म, 18. हिंदू धर्म में पहेलियों, 19. मनु और शूद्र, 20. भारतीय संविधान है। 

उनके चरणों में कोटि कोटि नमन

भारत के इतिहास के पन्नों में बाबा साहब का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। उनके मानवता के प्रति किए गए कार्यों को हमेशा याद किया जाएगा। उनके बारे में जितना भी लिखा पढ़ा जाए वो कम है। बाबा साहेब आने वाली पीढ़ियों में और भी ज्यादा प्रसिद्ध होंगे। हर व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार अवश्य बाबा साहेब को पढ़ना चाहिए। आज उनकी 63 वीं पुण्यतिथि पर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके चरणों में कोटि कोटि नमन (डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे, प्र्रोफेसर एम्स भोपाल) 
विशेष संपादकीय 
डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे, प्र्रोफेसर एम्स भोपाल

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