Friday, January 31, 2020

गोंड समुदाय की सभ्यता, धर्म, संस्कृति, परम्परा, भाषा-बोली और जीवन पद्धति का विकास नर्मदा के उद्गम स्थान से हुआ

गोंड समुदाय की सभ्यता, धर्म, संस्कृति, परम्परा, भाषा-बोली और जीवन पद्धति का विकास नर्मदा के उद्गम स्थान से हुआ 

अमरकोट के त्रिकूट पर्वत से प्रकटी नर्मदा त्रिकूटा के नाम से जानी जाती है

संपादकीय लेख
विवेक डेहरिया 
संपादक गोंडवाना समय
समाजिक महाकुंभ, नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा, नर्मदा परिक्रमा और अनेको आयोजन के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार भी अमरकंटक नर्मदा महोत्सव का आयोजन करवा रही है। गोंड जनजाति और उनके उत्पत्ति स्थल अमरकोट तथा गोंडों को पोषित करने वाली उनकी नारमाता, नर्मदा के विषय में आखिर हकीकत क्या है सत्यता क्या है यह जानना भी आवश्यक है। गोंडी शब्द नार अर्थात ग्राम, गांव, पल्ली, खेड़ा या छोटा ग्राम होता है तथा माता का अर्थ जीवनदायिनी मॉ से है। अत: नारमाता का आशय आदिम समुदाय की जीवनदायिनी माता नर्मदा से है। युगों-युगों से इनकी जीवनदायिनी माता नर्मदा इनकी उत्पत्ति के साथ ही पोषित, पल्लवित और जीवन प्रदान कर रही है। इनकी सभ्यता, धर्म, संस्कृति, परम्परा, भाषा-बोली और जीवन पद्धति का विकास इसके उद्गम स्थान सें हुआ है, ये आदिम जातियां अमरकोट अर्थात अमरकंटक के इस परिक्षेत्र में प्राचीन काल से यहां की प्रकृत्ति प्रदत्त पेड़-पौधे, जंगल-पहाड़, नदी-नाले, जीव-जन्तु, आकाश और पाताल आदि की सेवा पूजा करते आ रहे हैं । 

नर्मदा की गोद में सभ्यता, संस्कृति का विकास और उद्भव होना, गोंड जाति के लिए गौरव की बात 

अमरकोट के त्रिकूट पर्वत से प्रकटी नर्मदा त्रिकूटा के नाम से जानी जाती है, तीनों लोकों में प्रसिद्ध, पग-पग में पुण्यदायिनी, पवित्र, समस्त नदियों में श्रेष्ठ, समस्त दुखों और कष्टों को हरने वाली सबसे प्राचीन मानी जाती है। नदियों में सरस्वती का जल तीन दिनों में पवित्र करता है, गंगा का जल तुरन्त पवित्र करता है परन्तु नर्मदा का जल दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देता है अर्थात समस्त नदियों में श्रेष्ठ, सर्वोत्तम और पवित्र नर्मदा की गोद में आदिम समुदाय की सभ्यता और संस्कृति का विकास और उद्भव होना इस गोंड जाति के लिए गौरव की बात है। जहां हजारों सालों से गोंड तपस्वी तप करके उत्तम सिद्धि को पा चुके हैं, इनके पुरखे तीनों लोको में राज्य कर चुके हैं। इसके तट में विश्राम करने मात्र से पीढ़ियां तर जाती हैं, जहां इनके पुरखे सर्वगुणसम्पन्न, पवित्र आचार-विचार से युक्त, बुद्धिमान, क्षमाशील, त्रिकाल, जपपरायण, पंचाग्नि तापने वाले, प्रकृति उपासना करने वाले, सिर्फ अमावस्या-पूर्णिमा को भोजन ग्रहण करने वाले, कई वर्षों-बरस तक एक पैर में खड़े होकर या उल्टा होकर निराहार, वायु का आहार या जल का पान करके तपस्या या उपासना करते थे। तीनों लोकों में ऐसे सात्विक, सिद्ध और सरल जीवन जीने वाले लोग कहीं नही थे । 

उनकी धर्म, संस्कृति, भाषा-बोली और जीवन पद्धति पर किया जा रहा कुठाराघात 

वृहद श्रीनर्मदा पुराण, बारहवांसर्ग, पृष्ठ संख्या 50 में वर्णन आता है कि जब सौ वर्षों पर्यन्त उत्तर और अन्य दिशाओं में वर्षा नहीं होने से सातों समुद्र सूख गये, संसार क्षय से त्राहिमाम-त्राहिमाम होने लगा, अल्पशक्ति जीव समाप्त हो गये, इस भंयकर अनावृष्टि से कुरूक्षेत्र और उसके आस-पास रहने वाले साठ हजार ऋषि, वानप्रस्थ व्रतधारी, सब भूख-प्यास से व्याकुल, जर्जर, मरणासन्न स्थिति में स्त्री, पुत्रों सहित कुरूक्षेत्र एवं उत्तरदिशा को छोड़कर सभी दिशाओं में श्रेष्ठ सर्वोत्तम दक्षिण दिशा को प्रस्थान करके गोंड समुदायों की भूमि नर्मदा परिक्षेत्र के नगर, ग्राम, छोटे ग्राम, खेड़ों, नगरों और बड़े नगरों में आकर प्रलय और अनावृष्टि के भय से डरे हुए आर्य, तपस्वी, गुहावासी ऋषि-मुनि अपने स्त्री,ं पुत्र एवं सन्तानों के साथ नर्मदा के दोनों तटों पर इन गोंड जनजनजाति के ग्राम, खेड़ों और नगरों में व्रत धारण करते हुए दिव्य आश्रम बनाकर बस गये तथा धीरे-धीरे इस भू-भाग में रहने वाले इनके गोंड वंशजों को  बुद्धिहीन, असभ्य और जंगली कहने लगे, इनकी सभ्यता एवं संस्कृति का विनाश करने लगे, उनसे घृणा, तिरष्कार, नफरत करने लगे। उन्हें सांस्कृतिक, शारिरिक, मानसिक भौगोलिक तोर पर प्रताड़ित करने लगे। आज भी इन आदिम समुदायों का विकास और आधुनिकीकरण के नाम से, औद्योगीकरण, परियोजना परमाणु संयत्र, विस्थापन के नाम से इनकी सभ्यता एवं सस्ंकृति को नष्ट किया जा रहा है। अवैध उत्खनन और इस परिक्षेत्र का भारी दोहन किया जा रहा है। उनकी गरीबी, लाचारी और सरलता का लाभ उठाकर शोषण किया जाता है, राजनीतिक फायदे के लिए सरकारे इस परिक्षेत्र में आदिवासी सामाजिक महाकुंभ, मेला, उत्सव, महोत्सव के नाम पर उनकी धर्म, संस्कृति, भाषा-बोली और जीवन पद्धति पर कुठाराघात कर रही है। आज इनके संवैधानिक अधिकार, धर्म, संस्कृति, भाषा, आदिवासी अस्तित्व, स्वाभिमान, आदिवासी पहचान को बचाने का संकट पैदा हो गया है। गोंड समुदाय के पुरखें अद्भुत निमार्ता और शिल्पकार रहे हैं, महाप्रतापी, महाबलशाली, रहस्य विज्ञान के ज्ञाता गोंडों और उनके अन्य समुदायों को छल-बल द्वारा परास्त किया गया। इस देश में आज भी आदिम जाितयों को लोकतंत्र में चाल, चेहरा और चरित्र बदलकर हराया, सताया व मिटाया जा रहा है । आज फिर से गोंडवाना को स्थापित करने के आदिवासियों में जोश, जज्बा और जूनून दिखाई देता है, वहीं दूसरी तरफ जातियता, उंच-नीच और आपसी मतभेद से ग्रसित होकर एक तीर एक कमान, हम सब आदिवासी एक समान का नारा लगाने से क्या कुछ होने वाला है ?

मां नर्मदा का उद्गम स्थल तथा इसका बहाव क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है

आज आदिम जनजातियों के वंशजों की स्थिति उस समय से ठीक नही है, इनको विकास और औद्योगीकरण, आधुनिकीकरण और परियोजनाओं के नाम पर विस्थापित करके इनके मूलस्वरूप को नष्ट किया जा रहा है, इनकी जीवन रेखा मॉ नर्मदा का प्रवाह बिगाड़ा जा रहा है, नर्मदा परिक्षेत्र में रहने वाले इनके वंशजों को पानी की भारी समस्या होने के बावजूद राजनीतिक लाभ के लिये सरकारें दूसरों को पानी का लाभ पंहुचाने का प्रयास कर रही हैं। आधुनिकीकरण और आद्यौगीकरण के नाम पर, अस्थि विसर्जन जैसे धर्म और रीतिरिवाज के नाम पर आज नर्मदा को प्रदूषित किया जा रहा है, इसके प्रदूषण नियंत्रण रिपोर्ट बहुत खतरनाक स्तर पर है, भारतीय मानक संस्थान ने पेयजल में पीएच 6.5 से 8.5 का मानक तय किया है लेकिन अमरकंटक से दाहोद तक मॉ नर्मदा का पेयजल का पीएच स्तर 9.02 तक दर्ज है जो पीने योग्य नही है। खनन माफियाओं द्वारा अवैध खनन किया जाता है, उनके हौसले इतने बुलंद होते हैं कि कई बार सरकारी महकमों के उपर हमला कर देते है । इन कई कारणों से इसका उद्गम स्थल तथा इसका बहाव क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है । 

माता नर्मदा गोंड समुदाय की है जीवन रेखा 

जबकि प्राचीनकाल से गोंड जनजाति को नर्मदा अपने पवित्र जल से शमन करती, सब जीवों को जीवन देने वाली, उनकी रक्षा करने वाली, नभचरों को सुख देने वाली, विपत्तियों को विदीर्ण करने वाली, सुरीली ध्वनि से गुंजायमान करने वाली धीर पक्षियों की रक्षा करने वाली, निज शक्ति प्रदान करने वाली, देश-प्रदेश, पर्वत, ग्राम और आश्रम को पवित्र करने वाली, सब नदियों में श्रेष्ठ, दर्शन मात्र से जीवन को पवित्र करने वाली, स्वर्णमयी आभा वाली, कमलदल नेत्रों वाली, चन्द्रमा के समान मुख वाली, श्यामवर्णमयी, उत्तम दिव्य रूपवाली, पवित्र सर्वमंगलदायिनी, कल्याण स्वारूपा, त्रेलोक्य को मोहित करने वाली, गजगामिनी, शीलवती, शाश्वत शरीररूपिणि विमला, विपाशा, रेवा, दिव्यमायारूप, मेघ के समान श्यामल,  अनुपम, चन्द्र,  नक्षत्र,  नदी,  नभ, अण्डज, स्वेदज,  उद््िभज,  जरायुज प्रणियों को उत्पन्न करने वाली माता नर्मदा गोंड समुदाय की जीवन रेखा है। 
संपादकीय लेख
विवेक डेहरिया 
संपादक गोंडवाना समय
 

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