Saturday, January 18, 2020

जनजातीय समुदाय का आदिकाल से रहा वजूद तो प्रकृति के साथ शुरू से ही रहा गहरा लगाव

जनजातीय समुदाय का आदिकाल से रहा वजूद तो प्रकृति के साथ शुरू से ही रहा गहरा लगाव

ब्रह्मांड और मानव जाति की उत्पति पर देश-विदेश से आए विद्वानों ने रखे अपने विचार 

रांची। गोंडवाना समय।
जनजातीय समुदायों का वजूद आदिकाल से रहा है और आज पूरी दुनिया में यह अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहा है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनजातीय समुदाय किसी भी सभ्यता और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है और इसकी कला, संस्कृति, परंपरा, खानपान, रहन-सहन आदि के केंद्र में प्रकृति के साथ रिश्ता चला आ रहा है। यह समुदाय प्रकृति पूजा में विश्वास करता है और प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित व संरक्षित करने में इन्होंने सदैव अहम भूमिका निभायी है और निभाती आ रही है। रांची के आड्रे हाउस में ट्राइबल फिलॉसफी पर शुरू हुए तीन दिवसीय अंतराराष्ट्रीय सेमिनार के पहले दिन देश-विदेश से आए आदि दर्शन के विशेषज्ञों ने जनजातीय दर्शन के दृष्टिकोण से ब्रह्रमांड की उत्पति, मानव जाति की उत्पति प्रकृति से रिश्ता आदि पर पेपर प्रेजेंटेशन किया। इन्होंने कहा कि जनजातीय दर्शन कोई अलग दर्शन नहीं है, लेकिन इस दर्शन की महत्ता अन्य दर्शनों को विकसित करने में काफी अहम रही है। 

ब्रह्रमांड की उत्पति और प्रकृति से इनके रिश्ते को विस्तार से बताया

ट्राइबल फिलॉसफी के पहले दिन उद्घघाटन सत्र को छोड़कर चार सत्र आयोजित किए गए। इन सभी सत्रों में जनजातीय दर्शन से जुड़े विशेषज्ञों ने ब्रह्रमांड की उत्पति और प्रकृति से इनके रिश्ते को विस्तार से बताया। इस दौरान उन्होंने बताया कि इस अंतराष्ट्रीय सेमिनार से जनजातीय समुदायों के प्रति जानकारी को लोगों तक पहुंचाने में काफी मदद मिलेगी। इस तरह के सेमिनार आगे भी होते रहने चाहिए, ताकि जनजातीय दर्शन को एक विधा के तौर पर स्थापित किया जा सके।

डॉ पुष्पा गावित ने गोंड़ जनजाति के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पति को लेकर रखे अपने विचार 

पहले सत्र में आस्ट्रो-एशियाटिक के मुंडा/संथाल/हो/खड़िया/भूमिज और द्रविड़ समूह के गोंड़ और माल्टो जनजातीय समुदाय के दृष्टिकोण से ब्रह्मांड की उत्पति, पुरुष-स्त्री, प्रकृति, जंतु, चेतना एवं प्राणियों में चेतना विषयों पर को लेकर श्री कयन्त्येवबोर सोहटून, श्री एगेन्स्टार कुरकलनग, डॉ पॉल स्ट्रेउमेर और डॉ मिहिर कुमार जेना ने अपने विचार रखे। कॉन्फ्रेंस के दूसरे सत्र में श्रीमती बिजोया सवाइन, श्रीमती सुनुमि चांगमी, डॉ हेज तबयो और श्री काच्यो लेपचा ने उत्तर पूर्व के अनुसूचित जनजाति के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पति, मानव की उत्पति, प्रकृति और जंतुओं से आदिवासी समुदाय के रिश्ते पर अपनी बातें रखी। कॉन्फ्रेंस के तीसरे सत्र में श्री राफेल रोसलौ, श्री राजू नायक, श्री गोपाल भील, श्री मान सिंह इमाम, डॉ स्नेहलता नेगी और डॉ माहेश्वरी गावित ने बताया कि भील और मीना जनजाति में ब्रह्रांड और मानव उत्पति को लेकर अलग दर्शन है। इन्होंने विभिन्न जनजातीय समुदायों में जीवन चक्र के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। कॉन्फ्रेंस के चौथे सत्र में श्री मोहन, हीराबाई हीरालाल और श्री देवजी नवाल तोफा, डॉ राजेश राथवा, डॉ जयश्री गावित, प्रोफेसर विनायक साम्बा तुमराम, डॉ पुष्पा गावित ने गोंड़ जनजाति के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पति को लेकर अपने विचार रखे।

No comments:

Post a Comment

Translate