Monday, February 17, 2020

क्या वर्ष 2021 की जनगणना में भी जनजातियों की जनसंख्या के आंकड़े होंगे शून्य ?

क्या वर्ष 2021 की जनगणना में भी जनजातियों की जनसंख्या के आंकड़े होंगे शून्य ?

कड़वी कलम
संपादक विवेक डेहरिया 
गोंडवाना समय
भारत देश के मूल निवासी आदिवासी ही है वहीं जनजातियों को मामले में सम्माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट आदेश जारी कर कहा है कि जनजातियों का धर्म अलग है वहीं उनके लिये ट्राईबल एक्ट भी बना हुआ है। इसके साथ ही चाहे देश के प्रथम नागरिक महामहिम राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, राज्यपालगण, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सहित अनेक संवैधानिक पदों पर विराजमान बुद्धिजीवियों द्वारा जनजातियों की संस्कृति, धर्म, भाषा को लेकर अपने वक्तव्य में यह कहते है कि वे प्रकृति को पूजने वाले है। 
            भारत में जनजातियों की जनसंख्या की जानकारी धर्म के आधार पर सरकार के पास तो अधिकृत आंकड़े नहीं है लेकिन अधिकांशतय: विशेषज्ञ शोधकर्ताओं के अनुसार अनुमानतय: लगभग 20 करोड़ के आसपास हो जनजातियों की जनसंख्या हो सकती है। इसके साथ ही वकायदा भारत में जनजातियों के लिये आरक्षित सीट सांसद व सैकड़ों की संख्या में विधायकों के लिये भी सुरक्षित है। वहीं भारत में सर्वाधिक जनजातियों की जनसंख्या मध्य प्रदेश राज्य में है और मध्य प्रदेश में 47 विधायकों के लिये विधानसभा सीट आरक्षित है।

मध्य प्रदेश में कुछ जिलों की वर्ष 2011 के आंकड़े जहां जनजाति की संख्या है शून्य

यदि हम वर्ष 2011 में हुई जनगणना की जनसंख्या के आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2011 में हुई जनगणना में मध्य प्रदेश में जनजातियों की जनसंख्या शून्य की स्थिति में ही नजर आ रही है क्योंकि यदि हम सिर्फ जनजाति बाहुल्य कुछ ही जिलों के आंकड़ों पर नजर डाले तो जनजातियों की की जनसंख्या कितनी है वे कौन से धर्म में है और किस के साथ उन्हें जोड़ा गया है यह स्पष्ट नहीं है। 

सांसद-विधायक सदन में नहीं खोलते मुंह 

मध्य प्रदेश में 89 जनजाति बाहुल्य ब्लॉक के रहते हुये भी आजादी के बाद वर्ष 1951 से जनजाति समाज की जनसंख्या की जनगणना के आंकड़ें में धर्म या जनजाति के आधार पर जारी नहीं किये जाने के बाद भी अभी तक सांसद व विधायकों में से कुछ ही सांसद-विधायकों द्वारा मुंह खोला गया है, जबकि अधिकांश इस मामले में अपने मुंह में दही जमाकर चुपचाप बैठे रहकर अपना सामाजिक धर्म कर्म निभाते चले आ रहे है। इसके पीछे जनजाति सांसदों व विधायकों की आखिर क्या मजबूरी है यह तो वे ही जानते होंगे परंतु यह भी सौ प्रतिशत सत्य है कि भारत देश के मूलनिवासी, दुनिया में जन्म लेने वाले पहले महामानव आदिवासी समाज की जनसंख्या को शून्य करार दिया गया है। 

और अभी भी संभावना वहीं नजर आ रही

भारत में मध्य प्रदेश सर्वाधिक जनजाति बाहुल्य वाला प्रदेश है, मध्य प्रदेश में आदिवासी समाज की धर्म पर आधारित जनसंख्या को जीरों के आंकड़े पर लाकर शून्य की स्थिति में पूर्व की भांति वर्ष 2011 की जनगणना में भी पहुंचा दिया गया था। यदि हम वर्ष 2011 के आंकड़ों पर गौर करें तो मध्य प्रदेश के लाखों जनजातियों समाज को किस धर्म के साथ जोड़ा गया है यह भी पता नहीं है इस पर संदेह आज भी बना हुआ है और जनजाति समाज की जनगणना धर्म के आधार पर या जनजातियों के आधार पर ही किये जाने की आवाज उठाने वालों की आवाज को तो कोई सुनने वाला भी पहले भी नहीं था और अभी भी संभावना वहीं नजर आ रही है। 

जनजातियों के धर्म को कब मिलेगी संवैधानिक मान्यता 

हमे भारत के संबंध में यह भी जानना जरूरी है कि भले ही करोड़ों की जनसंख्या में निवास करने वाले प्रकृति धर्म को मानने वाले जनजाति समाज के धर्म को संवैधानिक मान्यता नहीं मिली हो परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया है कि आदिवासी हिन्दु नहीं है, आदिवासी अपनी संस्कृति, परंपरा, व्यवस्था से संचालित होते है उनकी धार्मिक व्यवस्था भी अलग है इस आधार पर वे हिंदु, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध जैन सहित अन्य धर्म में नहीं आते है तो फिर आदिवासी समाज के मध्य प्रदेश के ही वर्ष 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों पर गौर किया जाये तो उन्हें कहां पर किसके साथ जोड़ा गया है। वहीं आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी करोड़ों की जनंसख्या वाले जनजाति समुदाय के धर्म को संवैधानिक मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है यह सवाल उठ रहा है परंतु संवैधानिक सदन में इस सवाल को कोई पूछने वाला या इसका विधिवत जवाब देने वाला कोई सामने जिम्मेदार नहीं आना चाहता है आखिर क्यों ? 

जिनकी संख्या में जिलोंं में 1000 भी नहीं उनके आंकड़े होते है जारी 

भारत देश में जनजातियों की जनसंख्या बहुतायात वाला प्रदेश मध्य प्रदेश राज्य है और इसी कारण मध्य प्रदेश में देश व विदेश के पूंजीपतियों उद्योगपतियों की निगाहे गिद्ध जैसी लगी हुई रहती है। आजादी के बाद से पूर्व के वर्षों की भांति ही वर्ष 2011 के जनसंख्या के आंकड़े भी जारी किये गये थे। इन आंकड़ों पर गौर करें तो इनमें सभी धर्म व समाज के आंकड़े दर्शायें गये है। यहां तक कि जिनकी जनसंख्या कुछ जिलों में 1000 के ऊपर भी नहीं है तब भी उन धर्मों की नागरिकों की जनसंख्या के आंकड़ों को जारी किया गया है। 

गोंड आॅर नॉट हिंदु अर्थात गोंड जनजाति के लोग हिंदु नहीं है

वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों में अन्य को लेकर भी नागरिकों की जनसंख्या के आंकड़ों को जारी किया गया है परंतु जनजाति बाहुल्य मध्य प्रदेश में जनजाति समाज की जनसंख्या के आंकड़े को जारी नहीं किया गया है। हालांकि इस मामले में यह तर्क दिया जाता है कि जनजाति समाज के धर्म को संवैधानिक मान्यता नहीं है परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह फैसला दिया है कि गोंड आॅर नॉट हिंदु अर्थात गोंड जनजाति के लोग हिंदु नहीं है। जनजाति समाज का अपना अलग धर्म है और वह प्रकृति को पूजता है, उनके रीति-रिवाज, परंपरा, संस्कृति सर्वश्रेष्ठ व भिन्न है और मध्य प्रदेश में जनजातियों की जनसंख्या सर्वाधिक है। इसके बाद भी जनजातियों के जनगणना में संख्या के आंकड़े को जारी नहीं किया जाने के पीछे क्या कारण है?

वर्ष 2011 में गोंडी धर्म या जनजाति लिखवाने पर गायकी में होता था फीड

वर्ष 2011 की जनगणना के कार्य के समय भी मध्य प्रदेश के जनजातियों के द्वारा जनगणना के दौरान गोंडी धर्म के अनुयायियों ने धर्म के कॉलम में गोंडी धर्म भी लिखवाया था। जनगणना के दौरान भी यह तथ्य भी सामने आया था कि जनगणना की फीडिंग के दौरान यदि जनजाति समुदाय के द्वारा गोंडी जाति व धर्म लिखवाने पर फीडिंग के दौरान गायकी व अन्य प्रकार के शब्द उल्लेखित होते थे। इस संबंध में जानकारी मिलने पर शिकायत जनजाति समुदाय के हितैशी राजनैतिक दलों व समाजिक संगठनों ने विरोध कर आपत्ति भी दर्ज करवाया था। हम आपको बता दे कि वर्ष 2011 की जनगणना के दौरान ही जनजाति समुदाय के अधिकांश परिवारों ने जनगणना के दौरान गोंडी धर्म के साथ साथ अपनी जनजाति को भी लिखवाया था परंतु इसके बाद भी जब जनगणना के आंकड़े वर्ष 2011 के सामने आये तो मध्य प्रदेश में जनजातियों की संख्या शून्य में दिखाई दे रही थी। यह अचंभित-आश्चर्यचकित व लाखों जनजाति समुदाय के हक अधिकार के साथ दु:खद स्थिति को बयां करने वाला था।

जनजातियों को कोई आक्रोश-नाराजगी दिला रहा है तो कोई हाथ फेर रहा है 

जनजाति समाज जो कि प्रकृति धर्म को मानते है उनकी जनसंख्या पूरे देश में लाखों करोड़ों है लेकिन उसके बाद भी उनकी जनसंख्या के आंकड़ों को आजादी के बाद से ही क्यों छिपाया गया है यह समझ से परे है। जबकि जानकारों की माने तो झारखण्ड में सरना धर्म लिखवाने पर वहां पर जनजाति समाज की जनसंख्या को 62 लाख के लगभग बताया गया था परंतु मध्य प्रदेश में तो जनजातियों की जनसंख्या को शून्य कर दिया गया था। जनजाति समाज की जनसंख्या को किस धर्म के साथ जोड़ा गया है इसकी जानकारी जनगणना करने वाले विभाग को ही होगी।
            वहीं दूसरी ओर जनजाति समाज जो कि लाखों की संख्या में मध्य प्रदेश में व करोड़ों की संख्या में निवासरत है वे अपनी जनसंख्या के आंकड़े को शून्य में पाकर आक्रोश में तो है, उनमें नाराजगी भी है परंतु जनजाति समाज का वोट पाकर जनजाति समाज के आरक्षित वर्ग से सांसद-विधायक बनकर उनका प्रतिनिधित्व करने वाले जनजाति वर्ग के जनप्रतिनिधि ही जब इस मामले में खामौश है, सांसद व विधायक के पद पर बैठने वाले ही मजबूर है तो फिर जनजाति समाज वर्ग के वोट बैंक समझने वाले अन्य वर्गों के सांसद-विधायक या सत्ता की प्रमुख की कुर्सी संभालने वाले क्यों समझेंगे हां लेकिन विरोध और साथ में होने वाले दिखावे का खेल जरूर प्रारंभ हो गया है। एक अपने आप को जनजाति वर्ग के साथ में बता रहे है तो दूसरे जनजाति समाज को अपने पक्ष में लेने के लिये मेहनत कर रहे है। 

वर्ष 2011 की जनसंख्या में हिंदु 0.7 प्रतिशत घटे तो मुस्लिम 0.8 प्रतिशत बढ़े थे

वर्ष 2011 में हुये जनगणना के आंकड़ों को जानने वाले जानबकारों की माने तो केद्र सरकार द्वारा जब धर्म पर आधारित जनगणना के आंकड़े जारी किये गये थे। जिसमें देश की जनसंख्या 2001 की जनगणना की तुलना में मुस्लिमों की जनसंख्या वर्ष 2011 में 0.8 प्रतिशत बढ़ गई थी। वहीं दूसरी तरफ हिंदुओं की जनसंख्या 0.7 प्रतिशत घट गई थी। वहीं देश भर की लगभग जनसंख्या 121.09 करोड़ के आंकड़े के रूप में सामने आई थी जिसमें हिंदुओं की जनसंख्या को लगभग 96.63 करोड़ बताया जा रहा था। वहीं जबकि मुस्लिमों की जनसंख्या 17.22 करोड़ बताया जा रहा था। 
सरकार ने सामाजिक आर्थिक जनगणना के आंकड़े वर्ष 2011 के जब जारी किये थे तब से ही राजद, सपा, जदयू, डीएमके समेत अन्य राजनैतिक दलों व समाजिक संगठनों ने जनगणना के आंकड़े को जनता के बीच में सार्वजनिक जातिगत आधार पर भी जारी करने की मांग रखा था परंतु रजिस्ट्रार जनरल अ‍ैर सेंसस कमिश्नर ने इसके बजाय धर्म आधारित जनगणना के आंकड़े जारी किये थे। 
इसके अनुसार हिंदु ही नहीं सिख और बौद्ध भी कम हुये थे। कुल जनसंख्या में सिख लगभग 0.2 प्रतिशत और बौद्ध 0.1 प्रतिशत कम हुये थे। क्रिश्यचयनों व जैन समुदाय की की संख्या में तो कोई विशेष अंतर नहीं आया था। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों में जानबकारों ने जब तुल्नातक अध्ययन किया था तो उन्होंने पाया था कि औसत वृद्धि से ज्यादा मुस्लिमों की बढ़त भारत की जनसंख्या की गणना में संख्या बढ़ने की चाल वर्ष 2001-2011 के बीच जहां 17.7 प्रतिशत थी। इसकी तुलना में मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग 24.6 प्रतिशत की चाल से बढ़ी थी। वहीं बाकी धर्मों की जनसंख्या बढ़ने की रफतार राष्टÑीय औसत से कम रही थी। हिंदुओं की जनसंख्या 16.8 प्रतिशत, ईसाईयों की संख्या 15.5 प्रतिशत, सिखों की संख्या 8.4 प्रतिशत, बौद्धों की संख्या 6.1 प्रतिशत, जैनियों की संख्या 5.4 प्रतिशत की चाल से बढ़ी थी। 

धर्म को संवैधानिक मान्यता नहीं तो जातिगत जनगणना के वास्तविक आंकड़े ही सार्वजनिक करें

अक्सर देखा जाता है कि जब भी कभी भी वाद-विवाद होता है तो सामने वाला चुनौती देता है कि कितने घर के हो यानि यदि संख्या है तो शक्ति है का सिद्धांत है और इसी बात से आजादी से लेकर आज तक जितनी भी सरकारे रही है उनमें घबराहट थी कि एससी-एसटी और विशेषकर ओबीसी को अपनी जाति संख्या का पता चल जायेगा तो इनकी सत्ता खतरे में आ जायेगी और इससे इन वर्गों को अनभिज्ञ रखकर इनका वोट पाकर सत्ता शासन की कुर्सी में बैठकर राजधर्म स्वतंत्रतापूर्वक चलाते आ रहे है। बहुसंख्यक जातियों के भोलेपन का अनुचित फायदा लेकर उन्हें समाजवाद, सांप्रदायिक सद्भावनात्मक, सदभाव, राष्टÑीय एकता, अखण्डता, भाईचारा जैसी भावनात्मक बातों में उलझाकर अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने के लिये राजनैतिक दलों में रहकर वोट के सहारे संवैधानिक शीर्ष पदों पर बैठकर जो बहुसंख्यक जातियों का शोषण करने के लिये षडयंत्र कर रहे वह क्षमा योग्य तो नहीं है।

अंग्रेजों की खिलाफत के बाद भी जनगणना में ईमानदारी 

भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिये जो आंदोलन क्रांति व संग्राम हुये है। उसमें यह सत्य है कि सबसे पहले अंग्रेजों का विरोध करने वाले या उन्हें भारत से खदेड़ने और भारत छोड़कर चल जाने के लिये मजबूर करने वालों में अग्रणी पंक्ति में सबसे पहले जनजाति समुदाय का ही नाम आता है भले ही जैसे उन्हें जनगणना में स्थान आजाद भारत में जनजातियों को नहीं मिल पा रहा हो लेकिन वही अंग्रेजी हुकुमत जिसकी खिलाफत जनजातियों ने सबसे पहले किया था उसके बाद भी अंग्रेजों ने जनजातियों की जनगणना करने में ईमानदारी दिखाया था क्योंकि आजादी के पहले जनजातियों की जनगणना होती थी जिसकी आंकड़े आज भी मौजूद है परंतु स्वतंत्रता मिलने के बाद जनजाति समुदाय के त्याग-बलिदान-शहादत को स्वतंत्रता के संग्राम में इतिहास में वह स्थान और सम्मान नहीं मिल पाया है। हां लेकिन संवैधानिक पदों पर और प्रमुख सत्ताधारी भाषणों में बताते जरूर है और जिनके हाथों में 1 सेकेण्ड में फैसला निर्णय लेने की शक्ति है वह आखिर लिखाना क्यों नहीं चाहते है। इसलिये जनजातियों को अपना इतिहास लिखने के लिये स्वयं को कलम चलाने की सख्त आवश्यकता है। 

जनसंख्या के आंकड़े को सार्वजनिक करने की कर रहे मांग

अब फिर जनगणना होने वाली है और केंद्र सरकार इसकी कवायद में जुट गई है लेकिन जिनकी जनसंख्या में लाखों करोड़ों में देश में है क्या केंद्र सरकार उनके धर्म या जातिगत आधार पर ही  जनगणना का भविष्य या जनगणना के आंकड़े उजागर करते हुये विधिवत जनसंख्या के आंकड़े प्रस्तुत कर पायेगी। यदि हम बात करें जनजाति वर्ग की तो वह अपने हक अधिकार संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई आजादी के बाद से ही लड़ते आ रहा है। जनजाति समुदाय को आजाद भारत में ही इतने वर्षों तक अंधेरे में क्यों रखा गया है उनकी जनसंख्या को क्यों छिपाया गया है। जनजातियों की क्षमता, जनजातियों की प्रतिभा, जनजातियों के उत्साह पर कुठाराघात क्यों किया जाता रहा है और उन्हें मिले संवैधानिक अधिकारों को भी उनसे आज भी छीना जा रहा है । हालांकि जनजातियों समुदाय के संघर्ष का स्वरूप अब काफी बदल गया है वह अब वास्तविक परिवर्तन के मूड में है और अपने संवैधानिक अधिकारों को एकजुट होकर आवाज भी उठा रहे और केंद्र सरकार पर वर्ष 2021 की जनगणना में जनजातियों के जनसंख्या के आंकड़े को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे है। 

सिवनी-मण्डला में ईसाई तो बालाघाट में बौद्ध सर्वाधिक जनजातियों का जीरों

मध्य प्रदेश में सर्वाधिक जनसंख्या जनजातियों की है लेकिन उसके बाद भी उनकी जनसंख्या की जानकारी शून्य में वर्ष 2011 में सामने आई थी क्योंकि जब केंद्र सरकार द्वारा धर्म आधारित जनगणना के आंकड़ें जारी किये गये थे, जनसंख्या के जानबकारों के द्वारा तुलनात्मक आंकड़ों के अनुसार सिर्फ गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ क्षेत्र में आकलन की यदि हम बात करे तो उसमें यह सामने आया था कि बालाघाट जिले में सर्वाधिक बौद्ध धर्मालंबियों की संख्या थी और बालाघाट में बौद्ध की संख्या 72162 दर्ज की गई थी। वहीं बौद्ध धर्म की जनसंख्या के मामले में दूसरे नंबर पर सिवनी जिला आया था जहां पर आंकड़ा 7288 आया था। इसी तरह मंडला जिले में क्रिश्चयनों की संख्या 12450 के आंकड़े के रूप में सामने आई थी। इसी तरह सागर में मुस्लिम धर्मालंबियों की संख्या 103480 के आंकड़े के रूप में सामने आये थे। 

तो कैसे टीएसपी का बजट होता है निर्धारित

भारत में टीएसपी के तहत केंद्र सरकार और राज्य सरकार बजट का निर्धारण करती है और आजादी के बाद अरबों खरबों रूपये का बजट भी सरकार जनजाति समुदाय के विकास-उत्थान-कल्याण के लिये स्वीकृत कर चुकी है ये ओर बात है कि जनजातियों के लिये निर्धारित बजट को अन्य मदों में खर्च कर दिया जाता है। वहीं अरबों खरबों के बजट के बाद भी जनजाति समुदाय शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं के लिये आज भी तरस ही रहा है। सबसे बड़ी गौर करने वाली बात यह है कि जब केंद्र सरकार जनजातियों के आंकड़े सार्वजनिक नहीं करती है तो फिर कैसे टीएसपी के बजट का प्रावधान करती है यही समझने का विषय है। 

जनजातियों की जनसंख्या को जनगणना के प्रपत्र में नहीं जोड़ा जाना का अन्याय

अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिये सर्वप्रथम और मुखर होकर विरोध का बिगुल फूंककर उलगुलान करने वाले सिर्फ और सिर्फ आदिवासी ही है। अंग्रेजों ने अपनी ताकत के बल पर लगभग सभी समुदाय को झुका लिया था अर्थात गुलाम बना लिया था लेकिन आदिवासियों को झुकाने में अंग्रेजी हुकुमत सफल नहीं हो पाये उसके बाद भी अंग्रेजी हुकुमत के दौरान आदिवासियों की जनगणना में ईमानदारी बरती गई और बकायदा जनगणना के दौरान आदिवासियों की गणना की गई लेकिन हजारों लाखों की संख्या में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के लिये प्राण गंवाने वाले आदिवासी समुदाय के सगाजनों को आजाद भारत में षडयंत्र या साजिश रचकर वर्ष 1961-62 की जनगणना प्रपत्र से हटा दिया गया आखिर क्यों, इसके पीछे क्या कारण है।
        भारत में जिनकी संख्य हजारों लाखों में होगी उनके धर्म को भी संविधान में मान्यता दी गई है लेकिन आदिवासी धर्म कोड आज भी नहीं मिला है वहीं उन्हें जनगणना के प्रपत्र से भी अलग कर दिया गया है यह आदिवासियों के साथ अन्याय है। जबकि देश के सम्माननीय सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य न्यायालयों में भी फैसला सुनाया है कि आदिवासियों का अपना अलग धर्म, रीति-रिवाज पंरपरा है उसके बाद भी जनजातियों की जनसंख्या को जनगणना के प्रपत्र में नहीं जोड़ा जाना कहां का न्याय है या सीधे सीधे यह जनजातियों के साथ अन्याय है।

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