गोंडवाना समय

Gondwana Samay

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Monday, March 16, 2020

बीत रहे साल की सहर्ष प्रकृतिनुरूप ससम्मान विदाई करना ही है सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो

बीत रहे साल की सहर्ष प्रकृतिनुरूप ससम्मान विदाई करना ही है सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो 

गढ़ी मे गोंडियन जनों का सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो एवं सांस्कृतिक समारोह सम्पन्न

बालाघाट। गोंडवाना समय। 
हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सगा सग्गुम आदिम सामाजिक संस्था भोपाल मध्यप्रदेश एवं संयोजन समिति गढ़ी के तत्वधान में बलगांव निवास भालापुरी के सौजन्य से कोया पुनेम नेंग सेंग मिजान सांस्क्रतिक एव संवैधनिक हक अधिकार सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो का कार्यक्रम आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सभी गोंडियन सगाजनों ने सहपरिवार, बढ़-चढ़कर बहुत ही ऊत्साहपूर्वक से हिस्सा लिया एवं कार्यक्रम को अभूतपूर्व रुप से सफल बनाया। 

करमा झूमर सूवा पाटा नृत्य एवं गोंड़ीगीतो की शानदार रही प्रस्तुति

उपस्थित समाज की मातृशक्ति ने करमा झूमर सूवा पाटा नृत्य एवं गोंड़ीगीतो के द्वारा समा बाँध दिया। कार्यक्रम में गोंडवाना स्टूडेंट्स यूनियन नैनपुर की झलक दिख रही थी।
वही  कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता के लिए धन रे गोंडवाना बेटा के सुप्रसिद्ध गायक शंकर शाह मरावी की आवाज ने सुंदर सुंदर प्रस्तुतियां दी गई। कार्यक्रम के दौरान प्रथम सत्र के समापन के बाद आयोजन समिति के द्वारा भोजन की व्यवस्था की गई जहां पधारे समुदाय को पारम्परिक व्यजंन पेज भाजी के साथ स्वादिष्ट महुआ के कुडुम का भोजन कराया गया ।

क्या कहता है संस्था का चिंतन, आदिम समुदाय क्यों मनाता है सिमगा सग्गुम 

प्रख्यात साहित्यकारो एवं भाषाविदो के मतानुसार गोंडवाना संस्कृति, विश्व संस्कृति की जननी है। गोंड कोया विडार जिस निश्चित भू-भाग में रहते हैं। अपनी पाना पारसी भाषा मे गण्डोदीप, गोंडवाना या सिरडी संयुग गण्डदीप से संबोधित करते हैं। प्रकृति के अनुरूप प्रकृति के सम्मान में है एवं हमारा कोयापुनेम दर्शन हर पल, हर क्षण प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आज हमे अपने स्वयं के पुरखा व प्रकृति सम्मत व्यवस्था को स्वयं के नजरिये से जानने का प्रयास करना है। 

और ना ही अपने अस्तित्व की है चिंता 

दूसरो के नजरिये से जानने की कोशिश करेंगे तो हमारी प्रकृति सम्मत हर व्यवस्था को नजदीक सही सही समझना मुश्किल होता जायेगा। फलस्वरूप आपसी वैचारिक मतभेद, अविश्वास, असंगठित व असुरक्षित होने की भावना से ग्रसित हो रहे हैं और इसी का परिणाम है कि आज हम अपने अस्तित्व खोने के कगार पर खड़े हैं। पर संस्कृतियो का प्रभाव हमारे जहन मे इस कदर बैठ गया है कि हम अपना सुध-बुध भूल बैठे हैं ना हमे अपनी मौलिक परम्परा व पहचान की परवाह है और ना ही अपने अस्तित्व की चिंता । संविधान प्रदत्त अधिकारो व व्यवस्था के तहत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में हम अपनी मौलिक धर्म भाषा व संस्कृति के उत्थान की बात न करें तो ये बड़े दुर्भाग्य की बात होगी । कोयापुनेमी गोंड कोयतोड़ियन विडार की प्रकृति सम्मत व्यवस्था देशजत्व, धर्म भाषा संस्कृति पाबु-पड्डुम नेंग सेंग मिजान रूढी प्रथा व परम्परा, गढ़-गढ़ा, गोटुल, पोया, भुमका, मुठवा, मुकद्दम व पाड़ी व्यवस्था की रक्षा करना हमारा मूल कर्तव्य है ।

बीतने वाले साल को दिया जाता है सबसे बड़ा सम्मान 

सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो अर्थात बीत रहे साल की सहर्ष प्रकृतिनुरूप ससम्मान विदाई करना ही सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो है। पूनल सावरी (नया साल) आगमन, उन्दोमान (चैत) से लेकर साल पूरे होने पाण्डामान ऊनो (फाग अमावस्या) तक हर माह के पाबुन-पड्डुमो (पर्वो) में प्रकृति को सम्मान देते हुए एवं साल के पूर्णता मे गढा गोंगो, पड्डुम उत्सव कर, बीतने वाले साल को सबसे बड़ा सम्मान दिया जाता है। 

क्योंकि परसा फूलो में सूर्य की तपिश सहने की होती है अद्भुत क्षमता 

गढ़ा गोंगो का रोन साफ-सफाई से निकले रोन रजगा का सिमगा, सग्गुम पाबुन गोंगो के साथ शुरू हो जाता है। जो फाग पूनो (पूर्णिमा) से शुरू होकर फाग उनो (अमावस्या) तक चलता है। फाग पाटा में व्यवस्था का बखान कर हर्षोल्लास से नाचते गाते परसा पुंगारो (फूल) के रंग से सरोबार होकर आनंदित होते हैं एवं गढ़ा गोंगो उत्सव की तैयारी करते हैं क्योंकि परसा फूलो में सूर्य की तपिश सहने की अद्भुत क्षमता होती है। 
जिससे इस प्रकार कोयतुरियन मिजानगत ग्रीष्म कालीन तपिश का पूर्व प्रबंध कर लेते हैं। वही पुराने साल के ससम्मान विदाई देना ही सिमगा सग्गुम पाबुन गोंगो है । मतलब फाल्गुन मास के पूर्णिमा के दिन जूनल सावरी (पुराने वर्ष) और पूनल सावरी (नए वर्ष) का सग्गुम का दिन होता है। इस दिन वर्ष के अंतिम माह फाल्गुन की पूर्णिमा और नए वर्ष के प्रथम दिन चैत्र माह के परेवा का संगम होता है। उसी दिन शिमगा सग्गुम मनाते है। शेष भारत में भी होली का त्यौहार इसी दिन मनाया जाता है। हालांकि शेष भारत में होली को हिंदू मिथकों से जोड़कर धार्मिक पर्व बना दिया गया है। 

एक त्यौहार नहीं, बल्कि कई पर्वों का समुच्चय है

जबकि वास्तव में यह  कोइतूरो का शुद्ध रूप से कृषि प्रधान त्यौहार है। इसके पीछे लंबी परंपरा और वैज्ञानिक आधार भी। कोइतूर परंपरा में शिमगा सग्गुम कोई एक त्यौहार नहीं, बल्कि कई पर्वों का समुच्चय है, जो 15 दिनों तक चलता है। इसमें मुख्य तौर पर चार पर्व शामिल हैं, रोन रजगा गोंगोंं पाबुन (घर की साफ सफाई का पर्व )अद्दीटिया पेन गोंगोंं (नई आग के स्वागत का पर्व )उन्हारी नवा खवाई पाबुन (रबी की फसल का नया खाना पर्व) शिमगा सग्गुम या सगा सग्गुम पाबुन (पुराना साल और नये साल का मिलन समय) के रूप में मनाया जाता है ।

समाज का भविष्य हैं आज के हमारे बच्चे जिसकी नींव रखने में समुदाय का हर युवा भागीदारी निभाएगा 

गोंडवाना भू-भाग में स्वस्थ समाज, समर्थ समाज, समृद्ध समुदाय बनाने के लिए युवाओं को आगे आने का आह्वान करते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष सम्मल सिंह मरकाम  ने कहा कि समाज के बच्चे तथा युवा आज का ससक्त समाज के निर्माण में सकारात्मक बदलाव का संदेश वाहक बनेंगे। तिरु सम्मल सिंह मरकाम ने प्रतिभावी ओर जज्बा से विभूषित होने वाले हमारे कोयापुंगार से आह्वान किया कि वे महज शिक्षा प्राप्त कर संतुष्ट होकर न बैठें, बल्कि सामाजिक संकीर्णताओं को दूर करने के लिए आगे आएं। 
उन्होंने आगे कहा कि समाज में चेतना प्रज्ज्वलित कर समाज में व्याप्त अनैतिकता को खत्म करने में आज के युवाओं को अभूतपूर्व योगदान देना होगा। जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं, बल्कि इन भौतिक जरूरतों से ऊपर उठकर काम करने की यात्रा है, वही गोंडवाना आंदोलन का सिपाही है ।हमारे बच्चे समाज की बेहतर निर्माण में अहम भूमिका निभा सकते है और उन्हें अवश्य निभानी भी चाहिए क्योंकि आज युवा शक्ति को पहचानने की आवश्यकता है।  
हमारे समृद्ध गोंडवाना लिए बड़े ही गर्व का विषय है की हमारी युवा शक्ति मजबूती के साथ आगे बढ़कर समाज की उद्देशय हेतु सलाह मशवरा करते है। सीधा संवाद करते हैं। वहीं 21 वीं सदी में गोंडवाना सवर्णिम युग में प्रवेश कर लिया है, जिसकी नींव रखने में समुदाय का हर युवा भागीदारी निभाएगा।

कार्यक्रम में ये रहे विशेष रूप से मौजूद 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथी के रुप मे संस्था के सचिव, तिरु फूलसिंह मरावी एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष तिरु सम्मल सिंह मरकाम तथा विशिष्ट अथितियों के रूप में तिरु गोपाल कुशरे सयोजन समिति गढ़ी, तिरु सुखचैन कड़ोपे सयोजन समिति खेरालांजी, तिरु जयपाल धुमकेती सयोजन समिति तिरगांव, तिरु रामनाथ मसराम सयोजन समिति बांधा टोला, तिरु दलपत साह वट्टी सयोजन समिति लामता, तिरु टेकचंद परते सयोजन समिति नैनपुर मंडला, तिरु सगन लाल सैयाम, तिरु धनसिंह पावले सयोजन समिति जारगा मंडला, आमत्रित अतिथिगण में बुद्धन सिंह पुसाम मुकद्दम भालापुरी ,जगदीश धुर्वे मुक्कदम बलगांव , सिवा धुर्वे मुक्कड़दम निवास,राजेन्द्र धुर्वे मुकद्दम गढ़ी, नेमसिंह कुशरे माना, कोमल ताराम खजरा ,रामजी चिचाम बिलाईखारी , दशवंत भलावी रामहेमर, नंदकुमार मरकाम धीरी, फगनु मरावी सिझोरा,  इंदल मरकाम गढ़ी ,महेश मरकाम सरपंच सामरिया, तिवारी मरकाम सरपंच कुगांव, बसंत मरावी सरपंच भीमलाट, शान्ति धुर्वे भू पू सरपंच भालापुरी ऊपस्थित रहे एवं अपने ऊद्बोधन से समाज-सगाजनों को मार्गदर्शन और चिंतन-वर्धन किया।

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