Sunday, April 26, 2020

हाथ उठाकर दें सीधा

हाथ उठाकर दें सीधा

मानव सेवा के लिये नि:स्वार्थ, निसंकोच सक्षम लोगों की है आवश्यकता

जनजातियों के कार्यक्रमों में आज भी अन्न सहयोग का है चलन 

संपादकीय 
विवेक डेहरिया
संपादक गोंडवाना समय
जैसा की आदिकाल कहें या पूर्वकाल में हमारी अर्थव्यवस्था कृषि और ग्रामीण जन-जीवनमूलक थी और अन्नदान को सबसे बड़ा महादान माना गया है। चूंकि किसी भी आदमी के जीवनदायिनी शक्ति का स्त्रोत भोजन ही होता है और भोजन को इसलिये प्रथम सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। जो परोपकारी संस्कृति का मूलाधार है और सामाजिक संरचना की परस्पर दृढ़ता व मानव सेवा का सबसे बड़ा प्रमाणक है।  

जनजाति संस्कृति का प्रमुख प्रमाण

जनजाति वर्गों की संस्कृति में आज भी यह देखने को मिलता है कि उनके यहां दु:ख के समय होने वाले कार्यक्रमों में गांव के लोग और परिचित अपने साथ में अनाज साथ में लेकर आते है। इसके पीछे यही कारण होता है कि दु:खी परिवार को दु:ख के समय आर्थिक सहारा होता है। इतना ही नहीं जनजातिय समुदाय के द्वारा सामाजिक कार्यक्रमों के लिये अनाज सामाजिक बंधुओं द्वारा प्रदान किया जाता है। इससे उनके होने वाले कार्यक्रमों में भोजन व अन्य समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है। जनजातिय समुदाय का उदाहरण प्रमाण स्वरूप देना इसलिये जरूरी था क्योंकि वर्तमान समय में सभी समाज, सभी वर्ग का वह जरूरतमंद जो प्रतिदिन रोजी रोजगार कर अपना घर परिवार का पालन पोषण करता है। उसकी स्थिति बयां करने की आवश्यकता नहीं है। 

जो भगवान शब्द की सार्थकता को भी करता है सिद्ध 

भ= भूमि
ग= गगन/ आकाश/अंतरिक्ष/क्षितिज
वा=वायु/हवा/ समीर/अनिल/पवन/मारुत।
व अक्षर के साथ अ की मात्रा मिलकर वा का निर्माण करती है अत: अ का आशय अग्नि /पावक/ दहन/ कृशानु/ अनल से है।
न= नीर/पानी/जल/अंबु होता है।
     अत: हम जो सीधा/ राशन/ अन्नदान आदि दान करते हैं उसमें उपरोक्त बताये गये सभी तरह के तत्वों का समावेश होता है और जिस आदमी / व्यक्ति को हम दे रहे हैं उसमें भी वही भूमि , गगन वायु अग्नि,जल आदि पंचतत्वों का मिश्रण है, जो प्राकृतिक और जीवनदायिनी आवश्यकता है,जिसके बिना प्रकृति, जीवन और भगवान की कल्पना असंभव और निरर्थक है।

महादान सीधा का यह है पूर्व स्वरूप 

हमने भी देखा है कि अधिकांशतय: धार्मिक आयोजनों में दान स्वरूप अन्नदान या घरों पर जरूरतमंदों को सहयोग करने के लिये सूपा में सीधा सजाकर दान दिया जाता था यह आज भी प्रचलन में है। सीधा में दी जाने वाले भोजन हेतु सामग्री परिवार के पालन पोषण में अत्याधिक सहायक होती है। हालांकि धीरे धीरे विकास के चकोचौंध में प्रगति के युग के साथ इस तरह का दान का स्वरूप अब बदल चुका है या कहें कि गुमनाम सा हो चुका है। सीधा में दी जाने वाली भोजन बनाने के लिये सामग्री को वास्तव में बहुत ही लाभकारी और किसी परिवार को सहायता पहुचांने में बहुत ही मददगार साबित होती है। वर्तमान में हाथ उठाकर सीधा देने की सख्त आवश्कता है। 

सिवनी में अग्रणी संस्था का ये है सीधा का स्वरूप 

वर्तमान समय में देश में महामारी का संकट है और कामकाज बंद है, प्रतिदिन रोजी रोजगार कर परिवार पालन पोषण करने वालों के सामने चूल्हा चालू करने की समस्या है। ऐसे समय में सिवनी शहर के अग्रणी समाज संस्था के युवाओं ने बहुत ही अच्छी पहल करते हुये मानव सेवा में अग्रणी रहने वाले दानदाताओं का सहयोग लेकर सीधा मतलब महादान का जो स्वरूप भोजन के लिये आवश्यक सामग्री प्रदान कर जरूरतमंदों की सेवा कर रहे है। इस कार्य में यदि और भी लोग आगे आकर हाथ बटांये तो कम से कम मानव जीवन के लिये आवश्यक भोजन की आवश्यकता पूर्ण हो सकती है। यहीं नहीं जो संस्थायें कार्य कर रही उनके साथ मिलकर सहयोग कर सकते है या फिर स्वयं अपने पास पड़ौस के जरूरतमंदों की सेवा करने में अपनी भूमिका निभा सकते है। 

ग्रामीण अंचलो में कम लेकिन शहरों में स्थिति खराब

गांव में संकट के समय में फिर भी एक दूसरे का सहारा मिल ही जाता है। गांव में अधिकांशतय: एक दूसरे की सहयोग की भावना रहती है। हालांकि संकट का समय गांव में भी स्थिति ठीक नहीं है लेकिन भी ग्रामीण जहां पर एक दूसरे की मदद कर रहे है वहां पर ज्यादा दिक्कत नहीं होना चाहिये। इसी तहर यदि हम शहर की बात करें तो शहर में प्रतिदिन काम पर निर्भर रहने वालों के साथ साथ मासिक वेतन के रूप में भी काम करने वालों की स्थिति ठीक नहीं है। अधिकांश लोग गांव से काम की तलाश में शहर की ओर आते है। अधिकांश लोगों के पास सरकारी सुविधाओं के लिये आवश्यक दस्तावेजों का अभाव होता है। शहरी क्षेत्र में समस्या विकट है लेकिन समाधान भी आसान है सिर्फ सरकार से पहले समाज के सक्षम लोगों को आगे आने की आवश्यकता है। 

सरकार से पहले समाज की जिम्मेदारी

सरकार अपने स्तर से तो प्रयास कर ही रही है परंतु क्या हमें सिर्फ सरकार के भरोसे ही रहने की आवश्यकता है। देश में संकट का समय है ऐसे हालात में समाज की क्या जिम्मेदारी है ? यह किसी एक जाति, समाज, वर्ग की बात नहीं है समस्त धर्म, जाति, संपद्राय, वर्ग समाज की समस्या है। देश में ऐसे समय में सभी वर्ग के लोंगों को एकजुटता के साथ सामने आकर जरूरतमंदों की सेवा करने का अवसर है। हम देश की समस्या का समाधान तो नहीं कर सकते है लेकिन जो जहां पर है, जिस क्षेत्र में अपने पास पड़ौस, करीब के जरूरतमंदों की मदद ऐसे समय में कर सकता है। यह कोई जरूरी नहीं है स्वेच्छा से सेवा है पर इतना जरूर है कि यह समय वास्तव में सच्ची समाज सेवा का है।

1 comment:

  1. मानव सेवा ही ईश्वर की सेवा करना है।

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