Thursday, June 4, 2020

पर्यावरण संरक्षण एवं वैधानिक प्रावधानो में कोयापुनेम की भूमिका

पर्यावरण संरक्षण एवं वैधानिक प्रावधानो में कोयापुनेम की भूमिका

वर्ष 2020 मे पर्यावरण दिवस की थीम ''जैव विविधता'' है

मानव को बचाए रखने के लिये प्रकृति को बचाए रखना जरूरी है 

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख
सम्मल सिंह मरकाम
वनग्राम जंगलीखेड़ा, जिला-बालाघाट, म.प्र.
पृथ्वी पर व्याप्त पर्यावरण प्रकृति का सर्वोत्म वरदान है एवं मानव जीवन का आधार स्तंभ स्वस्थ एवं स्वच्छ पर्यावरण है। यही कारण है कि सृष्टिरचना मे जल, वायु, सूर्य, पृथ्वी और वनस्पति विविधता तथा जीव विविधता के रचना के बाद मानव का सृजन किया गया । यद्यपि यह सच है कि पर्यावरण एवं मानव का संबंध एवं पर्यावरण पर मानव की आश्रितता सृष्टि के प्रारंभ से ही चली आ रही है और पर्यावरण के सुधार व विकास के प्रयास होते रहे हैं। फिर भी इसकी विशेष आवश्यकता जनसंख्या विस्फोट एवं औद्योगीकरण के तारतम्य में महसूस मानव ने की।

मानव के प्रत्येक लालच को पूरा नही कर सकती

       
कारण यह है कि प्रकृति मानव की प्रत्येक आवश्यकताओं की तो पूर्ति कर सकती है परंतु वह मानव के प्रत्येक लालच को पूरा नही कर सकती। प्राकृतिक मूल्यों के बेतहाशा दोहन से पारिस्थैतिकी संकट, अतिशयवादी औद्योगीकरण से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण आदि की समस्यायें बढ़ती गयी।                 
          हालांकि इस विकराल समस्या पर चिंतनमनन संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थापना के समय से होती आयी है। भारत सहित विश्व के अनेक देशो मे पर्यावरणीय समस्याओं की तरफ ध्यानाकर्षण एवं समाधान के प्रयास की प्रेरणा अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के कारण हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समस्याओं का प्रभाव राष्ट्रों पर भी पड़ा है ।

पृथ्वी सम्मेलनो में यूनेप की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

             अंतत: पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन 1972 मे संयुक्त राष्ट्र के स्टॉकहोम ( स्वीडन) में 5 जून 1972 से 16 जून 1972 तक विश्व भर के देशो का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया गया। इसी सम्मेलन मे संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) का जन्म हुआ, यूनेप द्वारा अत्यावश्यक पर्यावरणीय सहायता के लिये संयुक्त राष्ट्र केंद्र (जेनेवा) तथा अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण तकनीक केंद्र (ओसाका) की स्थापना की गयी।
        पृथ्वी सम्मेलनो में यूनेप की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एवंप्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजन कर विश्व के नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ-साथ राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को सचेत व प्रेरित करना था क्योंकि मनुष्य जिनका सृजन नहीं कर सकता उन्हे बरबाद करने का उसे कोई हक व अधिकार नही है।
      उक्त सम्मेलन मे तत्कालीन प्रधानमंत्री ''श्रीमति इंदिरा गांधी ने पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव'' विषय पर व्याख्यान दिये थे। अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पर्यावरण सुरक्षा की दिशा मे यह भारत का प्रारंभिक कदम माना जाता है। इसके पश्चात से प्रतिवर्ष 5 जून को संपूर्ण विश्व पर्यावरण दिवस मनाता आ रहा हैं । 

विश्व पर्यावरण सम्मेलन 1972 की घोषणायें

          सम्मेलन मे विकास और पर्यारण के के आपसी संबंधो को स्पष्टकरने का किया गया तथा मानव पर्यावरण विकसित तथा विकासशील सभी देशों से सहयोग की अपेक्षा की गयी और मानव पर्यावरण को दो भागो मे विभक्त किया गया है।
           घोषणा का प्रथम भाग-मानव पर्यावरण की सामान्य एवं मानव के बारे मे सात सत्य, 1-मनुष्य अपने भौतिक आश्रय, बौद्धिक नैतिक सामाजिक और अध्यात्मिक विकास का अवसर प्रदान करने वाले पर्यावरण का सृष्टा या निमार्ता और ढालने वाला स्वयं वह दोनो ही है, 2-मानव पर्यावरण का संरक्षण और सुधार एक प्रमुख मुद्दा है जो विश्व भर में लोगो के कल्याण और आर्थिक विकास को प्रभावित करता है। यह पूरे विश्व के लोगो की तात्कालिक इच्छा है और सभी सरकारों का कर्तव्य है कि मानव पर्यावरण का संरक्षण व सुधार किया जाये।

पर्यावरणीय समस्यायें अल्प विकास के है कारण 

            3- मनुष्य को लगातार अपने अनुभवों से निष्कर्ष निकालना है और लगातार अन्वेषण अनुसंधान निर्माण और प्रगति करते रहना है। यदि इसका उपयोग बुद्धिमानी पूर्वक किया जाय तो सभी लोंगो को विकास का लाभ और जीवनशैली की गुणवत्ता मे वृद्धि करने का अवसर मिल सकता है, 4- विकासशील देशों मे अधिकांशत: पर्यावरणीय समस्यायें अल्प विकास के कारण है।
         लाखो लोग अच्छे मानव अस्तित्व के लिये जरूरी न्यूनतम स्तर से बहुत नीचे पर्याप्त भोजन और वस्त्र आवास और शिक्षा स्वास्थ्य और आरोग्य से वंचित जीवन यापन कर रहे हैं । इसलिये विकासशील देशों को अपनी वरीयताओं और पर्यावरण के बचाव और सुधार को ध्यान मे रखकर विकास का प्रयास करना चाहिये, 5-         जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि पर्यावरण संरक्षण के लिये सतत समस्यायें उत्पन्न करती है और इसलिये इन समस्याओं से निपटने के लिये यथोचित प्रयास नीतियां और उपायों को अंगीकृत किया जाना चाहिये, 6-तटस्थता के माध्यम से हम पृथ्वी के पर्यावरण को बहुत बड़ी और अपूर्णीय क्षति पहुंचा सकते हैं। जिस पर हमारा जीवन और कल्याण आधारित है ।

चिंतनकार निष्पक्षता से अपना चिंतन व शोधपत्र प्रस्तुत करे 

7-इस पर्यावरण उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु नागरिको एवं समुदायों उद्यमों और संस्थाओ के सभी स्तर पर सामान्य प्रयास साम्यिक भागीदारी निभाने की उत्तरदायित्व को स्वीकार करना चाहिये, पर्यावरण संरक्षण के उपरोक्त सत्यो को देशज समुदाय की सांस्कृतिक साहित्यिक सामाजिक दार्शनिक और जीवन यापन शैली के प्रत्येक चरणों मे देखा जा सकता है और यही तभी संभव है जब दृष्टता व चिंतनकार निष्पक्षता से अपना चिंतन व शोधपत्र प्रस्तुत करे ।

मानव पर्यावरण संरक्षण सिद्धांत 

               स्टाकहोम घोषणा के दूसरे भाग मे पर्यावरण संरक्षण और सुधार तथा एतर्थ वैश्विक सहयोग संबंधी 26 सिद्धांत स्थापित किये गये। ये सिद्धांत रूढ़ीगत अंतर्राष्ट्रीय विधि सिद्धांतो के स्थापना से लेकर विकसित राष्ट्रों के दायित्व एवं विकासशील देशों के विशेषाधिकार एवं व्यक्ति, संस्था, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सरकारों एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनो के सहयोग की अपेक्षा तक निर्धारित करते हैं।
             सुधी पाठको की जानकारी के लिये कुल 26 सिद्धांतो मे कुछ विशेष महत्वपूर्ण सिद्धांतो का विस्तार रखा जा रहा है। सिद्धांत-2, यह उपयुक्त है कि सतर्कता पूर्ण आयोजन तथा व्यवस्था द्वारा प्रकृति के प्राकृतिक स्रोतो, जिनमें, हवा-पानी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु विशेष् ारूप से प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के नमूने सम्मिलित है को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रखा जाना चाहिये।

पर्यावरण सुरक्षा के लिये देशज मॉडल से बेहतर कोई तंत्र नहीं हो सकता 

           
          पर्यावरण संरक्षण के लिये सिद्धांतो मे समाहित अंशो को चिंतन करने पर कोयापुनेम का प्रतिरूप व्यवस्था दृष्टिगोचर होता है क्योंकि पर्यावरणीय शिक्षा, संतुलन, सुरक्षा व संवर्धन के लिये देशज मॉडल से बेहतर कोई तंत्र नहीं हो सकती है, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वीकार किया है व ऐसी व्यवस्थाओ के जनको के देशज ज्ञानतंत्र को सम्मान भी देता है ।
इसी क्रम में नव सिद्धांतो (8-14, 20 और 23) में घोषित किया गया है कि पर्यावरणीय नीतियों को विकासशील के विकास में वृद्धि करना चाहिये। पर्यावरणीय नीतियां विकास योजनाओं से संबंधित होना चाहिये। पर्यावरणीय मानक हमेशा विकासशील देशो के लिये उचित नहीं हो सकते हैं।

स्टाकहोम सम्मेलन के विशेष निर्णय/ संकल्प/ सिफारिशें

1- नाभिकीय सशस्त्र परीक्षण निंदा प्रस्ताव ।
2- विश्व पर्यावरण दिवस घोषित करने का प्रभाव ।
3- कार्य योजनायें,पृथ्वी प्रहरी, पर्यावरण प्रबंध अवलम्बन।
4- मानव पर्यावरण पर घोषणा का अंगीकार।
5- नवीन अंतर्राष्ट्रीय मशीनरी का सृजन ।
6- मानव पर्यावरण पर राष्ट्र का दूसरे सम्मेलन आहुत करने 
7- सागर मे कूड़ा करकट फेंकने पर अभिसमय हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ से अपेक्षा संबंधी सिफारिश ।

पर्यावरण संरक्षण संबंधी नागरिकों के मूल कर्तव्य

         
 सत्र 1976 मेंस्टाकहोम घोषणा 1972 की घोषणाओ से प्रेरित होकर भारतीय संविधान के बयालिसवें संशोधन अधिनियम द्वारा मूल कर्तव्यों मे 51-क (छ) के रूप मे पर्यावरण संबंधी नागरिकों का मूल कर्तव्य जोड़ा गया। संविधान के अनुच्छेद 51-क (छ) उपबंधित करता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी, और वन्य जीव हैं रक्षा करें और उनका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के विरूद्ध दया भाव रखें।
           यह भी है कि पर्यावरण संरक्षण का मूल कर्तव्य विधिक शब्दावली मे प्रवर्तनीय नहीं है, जिस तरह भाग तीन मे वर्णित मूल अधिकार हैं। इसकी प्रकृति हूबहू राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के समान है परंतु माननीय न्यायलयों ने सृजनात्मक व्याख्या के माध्यम से मूल कर्तव्यों की सार्थकता को प्रतिस्थापित किया है। 

अनुच्छेद 51 क नागरिको के मूल कर्तव्य को दशार्ता है

         माननीय न्यायालयो के कुछ विशेष प्रकरणों का जिक्र किया जाना प्रासंगिक होगा। एल के कुलवाल बनाम राजस्थान राज्य के प्रकरण मे माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने अभिमत व्यक्त किया कि-साधारण तौर पर हम कह सकते है कि अनुच्छेद 51 क नागरिको के मूल कर्तव्य को दशार्ता है परंतु यह वास्तव में यह अधिकार देता है कि वह यह देखे कि राज्य अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन कर रहा है अथवा नही और बंधनकारी तथा प्राथमिक कर्तव्य देश के विधि अनुसार पूरे किये जा रहें हैं या नही । यदि राज्य अपने कर्तव्यों का पालन नही कर रहा है तो नागरिक न्यायालय के माध्यम से राज्य को अपना कर्तव्य पालन के लिये बाध्य करवा सकता है ।

पहले कोयापुनेम को वैधानिक दर्जा मिले

            विशेष उल्लेखनीय है कि माननीय न्यायालय ने अधिकार और कर्तव्य की अन्योन्याश्रिता को स्पष्ट करते हुए कहा कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ अस्तित्व मे रहते हैं। कर्तव्य के बिना कोई अधिकार नही हो सकता है और किसी अधिकार के बिना कोई कर्तव्य नही हो सकता है।
          उपरोक्त स्पष्टीकरण को हम देशज समुदाय की कोयापुनेम कोड की मांग के परिप्रेक्ष्य मे देखे तो देशज समुदाय की कोयापुनेम कोड की मांग के साथ-साथ कोयापुनेम व उसके तत्वो को आत्मसात करना व जीना भी जरूरी है । या यह भी हो सकता है कि पहले कोयापुनेम को वैधानिक दर्जा मिले तदोपरांत समस्त आवश्यक तत्वों को जीना शुरू करे ।

पर्यावरण संरक्षण के दिशा मे एक कारगर कदम होता

            प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षण की महत्ता को स्वीकार करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने एम सी मेहता बनाम भारत संघ मे केंद्र सरकार को पर्यावरण संबंधी प्रावधानो को प्रभावकारी बनाने हेतु 5 बिंदुओ सहित निर्देश जारी किये।
        जिसका क्रियान्वयन यदि समूचे राष्ट्र मे हो जाता है तो देशज समुदाय की विशाल कोयापुनेम व्यवस्था गोटुलीय शिक्षा का प्रसार व शिक्षण संबंधी कार्य राष्ट्रव्यापी स्तर पर होता और पर्यावरण संरक्षण के दिशा मे एक कारगर कदम होता क्योकि उपरोक्त व्यवस्था न होने के बाद भी संवैधानिक मूल कर्तव्यो के प्रावधानानुसार देशज समुदाय वन, झील, नदियो, तथा वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा संतुलन व संवर्धन संबंधी कार्य प्राचीनकाल से करता आया है ।

पर्यावरण संबंधी राज्य के नीति निर्देशक तत्व

           1976 मे संविधान बयालीसवें संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 48-क जोड़ा गया । अनुच्छेद 48-क का प्रावधान है कि ह्ल राज्य देश के पर्यावरण संरक्षण तथा उसमे सुधार करने का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा ह्ल यद्यपि कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वो की तरह पर्यावरण संबंधी नीति निर्देशक तत्व प्रवर्तनीयनही है फिर भी देश की शासन व्यवस्था मे मूल है और राज्य का यह कर्तव्य होगा कि विधि निर्माण कर वह अपनायें।
    इसके पश्चात 19 नवम्बर 1986 मे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ । दीर्घ पर्यावरणीय मुद्दे जैसे भोजन की बरबादी और नुकसान, जंगलो की कटाई, मानव जीवन में स्वास्थ्य और हरित पर्यावरण के महत्व, ग्लोबल वार्मिंग इत्यादि से बचाव और भविष्य में आने वाले खतरों से आगाह करने एवं पर्यावरण के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी को याद दिलाने के लिये हर वर्ष पर्यावरण दिवस मनाने की शुरूआत हुई । प्रति वषार्नुसार इस वर्ष 2020 मे पर्यावरण दिवस की थीम ''जैव विविधता'' है ।

जैव विविधता में कोयापुनेम की भूमिका व पर्यावरण 

         
           उसी का परिणाम है कि पर्यावरण संपन्नता की दृष्टि से विश्व के अन्य समुदायों की तुलना मे देशज समुदाय की स्थिति आज भी सुदृढ़ है। स्नेह और सम्मान की जड़े बहुत गहरी हैं, इसका प्राकलन इसी से लगाया जा सकता है। धरती को आज भी पेजिया दाई से संबोधत करते हैं और प्रकृति के समरूप व्यवहार रखने वाले समस्त मातृशक्तियों विशेष स्थान दिया जाता है ।
देशज समुदाय प्राचीनकाल से पर्यावरण संरक्षक की भूमिका निभाता आ रहा है। प्रकृति को धन से ज्यादा तवज्जो दी है। यही कारण है कि कालांतर मे विज्ञान के बहुतायत सिद्धांत प्रकृति व पर्यावरण के आवश्यक तत्वो से भरा पड़ा है। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारा जो सम्मान भाव है वह कोयापुनेम दर्शन से प्राप्त होता है ।

कोयापुनेम के प्रणेता पहांदी पारी कुपार लिंगो व पुरखाओं ने समझ लिया था

           प्रकृति न हो तो जीवन की कल्पना शून्य है और इस मर्म को कोयापुनेम के प्रणेता पहांदी पारी कुपार लिंगो व पुरखाओं ने समझ लिया था कि मानव को बचाए रखने के लिये प्रकृति को बचाए रखना जरूरी है और टोटम व्यवस्था के तहत प्रकृति के संरक्षण, संतुलन एवं संवर्धन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान है। कोयापुनेम के सबसे सूक्ष्म व आवश्यक तत्व रूढ़ी और प्रथा को जीवंत रखा।
          यही रूढ़ी और प्रथा अंतर्राष्ट्रीय विधि के मूल स्रोत हैं (अंतर्राष्ट्रीय विधि एवं मानव अधिकार संस्करण 2017)। अत: बहुत ऊंचाइयों और आधुनिकता को पाकर भी हम अपने कोयापुनेम और अंतर्राष्ट्रीय विधि के स्रोत बने रूढ़ी और प्रथा को दर किनारे नहीं कर सकते हैं ।
         क्योकि यह प्रकृति सम्मत होकर अजर व अमिट व्यवस्था है। क्षणिक रूप से संभव हो कि किसी बात के होते हुए तवज्जो न मिली हो पर यह भी है कि हर कण-कण मे कोयापुनेम का अंश है, वही सभी समुदायो के क्रिया कलापो व जीवन यापन की विधियो मे कोयापुनेम स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख
सम्मल सिंह मरकाम
वनग्राम जंगलीखेड़ा, जिला-बालाघाट, म.प्र.

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