Saturday, August 8, 2020

यदि देशज समुदाय संपूर्ण विकास का जनक है तो-देशज समुदाय से महान वैज्ञानिक क्यों नहीं?

 यदि देशज समुदाय संपूर्ण विकास का जनक है तो-देशज समुदाय से महान वैज्ञानिक क्यों नहीं?

सच तो यह है कि किसी राष्ट्र की वैज्ञानिक व तकनीकी शोध देशज ज्ञान के बिना असंभव है

लोकतांत्रिक देश में आज भी देशज समुदाय उपनिवेशवादी तथा परायेपन की शोषणकारी जिंदगी जीने को मजबूर है

विश्व देशज दिवस वर्तमान परिदृश्य-एक अवलोकन

लेखक-सम्मल सिंह मरकाम
वनग्राम-जंगलीखेड़ा, गढ़ी, बैहर,
जिला-बालाघाट म प्र


संपूर्ण विश्व के देश समुदाय के लिए गर्व का विषय है कि 9 अगस्त 2020 हर्ष उल्लास के साथ वैश्विक महामारी कोरोना संकट के नियमों एवं निदेर्शों के पालन के साथ मनाया जा रहा है। आज ही के दिन 9 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र संघ के यूएन वर्किंग ग्रुप आफ इंडीजीनस पापुलेशन की प्रथम बैठक 1982 में जेनेवा में हुई थी एवं 23 दिसंबर 1994 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने अपने संकल्प क्रमांक 49/214 के माध्यम से घोषणा की कि-9 अगस्त प्रत्येक वर्ष ''इंटरनेशनल डे आफ वर्ल्ड इंडीजीनस पीपुल्स'' के रूप में प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में मनाया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा अनुसार समूचे विश्व में वर्ष 2020 हेतु निर्धारित ''विषय-कोविड-19 एवं देशजजनों का विपरीत परिस्थितियों से त्वरित प्रतिपूर्ति करने की क्षमता'' (कोविड-19 एंडइंडीजीनस पीपुल्स रैसीलेंश) है। क्योंकि प्राकृतिक आपदा से त्वरित रिकवर करने की क्षमता देशज जनों मे अत्यधिक होती है क्योंकि प्रकृति के तत्वों में प्रतिपूर्ति की क्षमता होती हैं।

खुद जियो और जीने दो का सिद्धांत गढ़ा

इस वैश्विक थीम पर यूएनओ मुख्यालय न्यूयॉर्क में देशज समुदाय के मुख्य मुद्दों एवं समस्याओं पर वर्चुअल पैनल डिस्कशन के साथ संपन्न हो रही है। जिसमें समस्त सदस्य राष्ट्र वेबिनार के माध्यम से अपनी-अपनी सहभागिता सुनिश्चित करेंगे। विकास के प्रारंभिक दौर में मानव को अपने अधिकारों का ज्ञान तथा उस समय जो बलशाली होते थे वे जाने अनजाने में दूसरों के अधिकारों का हनन करते थे। धीरे-धीरे शिक्षा और सभ्यता के विकास के साथ साथ मानव का मन मस्तिष्क भी परिष्कृत हो गया और अधिकारबोध के साथ उसमें अधिकारों को पाने की लालसा भी जाग उठी थी और तब मानव ने अपनी बुद्धि और विवेक से खुद जियो और जीने दो का सिद्धांत गढ़ा। अब वह दूसरों की खुशी में खुश होना और दूसरों के दुख में रोना सीख लिया था। आज के विकास का श्रेय संयुक्त राष्ट्र संघ ने देशज समुदाय के पारंपरिक ज्ञान व प्रकृति की गूढ़ रहस्य को जानने समझने की ऐतिहासिक धरोहर को देता है।

देशज समुदाय के सम्मुख अनेक चुनौतियां मुंह उठाए खड़ी हैं

आज की स्थिति बिल्कुल अलग है, देशज समुदाय के सम्मुख अनेक चुनौतियां मुंह उठाए खड़ी हैं। एक तरफ तो आधुनिक सभ्यता व औद्योगिक विकास के विविध आयाम हैं, तो दूसरी ओर देशज समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर परंपराएं रीति-रिवाज है। देशज समुदाय विकास में हिस्सेदारी तो अवश्य चाहता है किंतु वह जानता है कि यदि उसने अपने संस्कृति रीति रिवाज वा कोयापुनेम को भुला दिया तो उसके बुनियाद की जड़े खुद हिल जाएंगी। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नीतियां देशज समुदाय को कानूनी स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता देती हैं कि वह अपने परंपरागत पहचान को बनाए रखने हेतु नीतिगत स्तर पर इन मूल्यों का सम्मान होता नजर नहीं आ रहा है।

बल्कि आज तो उनका अस्तित्व ही संकट में है 

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में देशज समुदाय अपनी विविध सांस्कृतिक, संस्कृतियों एवं कलाओं के साथ अपनी इंडीजीनस नॉलेज, अपनी विशिष्ट पहचान और अलग अस्तित्व बनाए हुए हैं, जिसे हम नकार नहीं सकते हैं। फिर भी चिंतनीय विषय है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आज भी देशज समुदाय उपनिवेशवादी तथा पराएपन की शोषणकारी जिंदगी जीने को मजबूर है। ऐसे दमनकारी व शोषणकारी तमाम उदाहरणों से हमारा वातावरण भरा है। जो न केवल उनकी संस्कृति, पहचान या कोई अपने लिए खतरा है बल्कि आज तो उनका अस्तित्व ही संकट में है।

विस्थापन ज्वलंत समस्या, संघर्ष है जारी 

देशज समुदाय का मूल संघर्ष जीवन-यापन के संसाधनों जैसे जल, जंगल, जमीन व सांस्कृतिक पहचान की बेदखली के विरोध में है। उदाहरणार्थ मध्य प्रदेश राज्य व अन्य राज्यों में बड़े स्तर पर बांधों का निर्माण हुआ, उससे भारी मात्रा में हो रहे विस्थापन, राष्ट्रीय उद्यानों राष्ट्रीय अभ्यारण की स्थापना व विस्तार से विस्थापन, व कारीडोर निर्माण से लाखों की तादाद में विस्थापन ज्वलंत समस्या के रूप में हमारे समक्ष मुंह फैलाए खड़ी है। विशेष रुप से देशज समुदाय का विस्थापन आज एक बड़ी समस्या है, जिसका तुरंत समाधान संभव ही नहीं है। स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात भी इस बेदखली का शिकार ज्यादातर देशज समुदाय ही हुआ है, इसलिए संघर्ष की चेतना भी आज देश समुदाय में दिखाई पड़ती है। वर्तमान हालातों को देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि देशज समुदाय कल भी अपने जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष कर रहा था आज भी संघर्ष कर रहा है और स्थिति यही बनी रही तो भविष्य में भी संघर्ष करती रहेगी।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 16 दिसंबर 1966 को अंगीकार किया 

आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा एक महत्वपूर्ण प्रसंविदा है। जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने 16 दिसंबर 1966 को अंगीकार किया। इस प्रसंविदा में उल्लेखित सभी अधिकार रंग, जाति, धर्म, भाषा, देश, लिंग, राज्य जैसे किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना मानव मात्र को प्राप्त हुआ है। इस प्रसंविदा के भाग-तीन में -कार्य का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, परिवार के संरक्षण व सहायता का अधिकार, पर्याप्त जीवन का आधार, शिक्षा का अधिकार, सांस्कृतिक अधिकार, प्रदान किए गए हैं। वर्ष 1966 का पेसा एक्ट व 2006 में पारंपरिक वन अधिकार अधिनियम व अन्य गैर संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान भी किया गया है।

भारत में देशज समुदाय के मानवाधिकार

अंतरराष्ट्रीय संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की 175 देशों में मानव अधिकार की स्थिति का जायजा लेने वाली एक संवेदनशील रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है कि- यहां देशज समुदाय के मानव अधिकार से जुड़ी समस्याओं में इजाफा हुआ है। देशज समुदाय की आज की ज्वलंत समस्याएं हैं 1-प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की समाप्ति, 2- देशज शिक्षा का अभाव, 3- विस्थापन एवं पुनर्वास की समस्याएं, 4- स्वास्थ्य एवं कुपोषण की समस्या, 5- पहचान का संकट, 6- रीति-रिवाज धर्म भाषा सांस्कृतिक पतन का होना, 7- पर संस्कृति ग्रहण की समस्या, 8-अवैध उत्खनन की समस्या, 9 देशज साहित्य व दर्शन का हासिये में करना, 10- सशख्त देशज नेतृत्व का अभाव।

ये है प्रावधान 

उपरोक्त के संरक्षण व विकास के परिपेक्ष में भारत में निवासरत देशज समुदाय हेतु भारतीय संविधान मूल रूप से विभिन्न अनुच्छेदों में देशज समुदाय के विकास व सुरक्षा के महत्वपूर्ण बिंदुओं को लेकर प्रावधान विहित किए गए हैं, यथा-अनुच्छेद-14-18, 15(4), 16, 19(1), 19(5), 46, 51(क) में मूल कर्तव्य, 164(विशेष कल्याण मंत्री का प्रावधान), 244, 244(1) (पांचवी अनुसूची) 244(2), (छटवीं अनुसूची) 275, 330, 332, 337, 338, 342, 366(25), 371 (क) नागालैण्ड, 371 (ख) असम, 371 (ग) मणिपुर, 371 (च) सिक्किम , 371 (छ) मिजोरम राज्य के लिए उपरोक्त महत्वपूर्ण अनुच्छेद व प्रावधान है। जिसके तहत देशज समुदाय की रूढी एवं प्रथा, अधिकार, सांस्कृतिक साहित्यिक दार्शनिक अध्यात्मिक भाषिक आर्थिक संवैधानिक, देशजत्व मूल्यों के संरक्षण व संवर्धन किये जाते हैं, 1989 अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1996 का पेसा एक्ट, 2006 में पारंपरिक वन अधिकार अधिनियम व अन्य गैर संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान किया गया है।

कोया पुनेम प्रकृति के संरक्षण संतुलन व संवर्धन के सिद्धांतों पर आधारित है

वर्तमान परिदृश्य में समाज का एक वर्ग आज भी हाशिए में है, निहितार्थ उस वर्ग से है, जो प्रकृति संबंधित ज्ञान रखता है पर सदियों से अभाव व भयाक्रांत होकर जी रहा है। जिससे वह वर्तमान परिभाषित विकास की दौड़ में पीछे रह जाता है। परखने व चिंतन का विषय है कि भूमि के साथ संबंध देशज समुदायों की संबद्धता का वह मुख्य बिंदु है जो कानून व संविधान के साथ जोड़ता है। देशज समुदाय न्यायालयों में ऐसी जीत दर्ज कर निर्णय को ऐतिहासिक बनाया है। प्रकृति की आव-वो-हवा, उन्मुक्त गगन के तले यह देशज समुदाय समूचे प्रकरण से जुड़ा जाता है, परिणाम स्वरूप देशज समुदाय की चिंता केवल जीवन यापन का आवास तक सीमित नहीं होती, अपितु परिस्थितिकी पर्यावरण संरक्षण, पुनर्सर्जन एवं ज्ञान व्यवस्था भी इस चिंता का हिस्सा होता है। चिंता का विषय इसलिए होता है क्योंकि देश समुदाय में अंतर्निहित कोया पुनेम प्रकृति के संरक्षण संतुलन व संवर्धन के सिद्धांतों पर आधारित है और यह आज मानवीय उपेक्षाओं के कारण नष्ट होने के कगार पर है।

इंडीजीनस नालेज सिस्टम विश्व के संपूर्ण विकास की जननी है

इंडीजीनस नालेज सिस्टम विश्व के संपूर्ण विकास की जननी है, इस गहराई को आत्मसात व चिंतन कर हम देशज समुदाय (इंडीजीनस कम्युनिटी) व देशज ज्ञान तंत्र (इंडीजीनस नालेज सिस्टम)  के महत्व को समझ सकते हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानक शब्द ''इंडीजीनस'' व भारत मे संवैधानिक परिप्रेक्ष्य मे अनुसूचित जनजाति से संबोधित किये जाते है। देशज समुदाय सिर्फ प्राकृतिक हित मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बल्कि मौजूदा विज्ञान युग मे यह विकास के तमाम पयार्यों के जनक भी हैं।
         वस्तुत: देश के विकास व सुरक्षा के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन संरक्षण व संवर्धन के लिए भी देशज ज्ञान तंत्र की महती आवश्यकता है। गौरवान्वित हैं हम कि देशज समुदाय की रूढ़ी एवं प्रथा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के स्टेट्यूट्स के अनुच्छेद 38 (1) के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि के मूल व सबसे प्राचीन स्रोत हैं। सच तो यह है कि किसी राष्ट्र की वैज्ञानिक व तकनीकी शोध देशज ज्ञान के बिना असंभव है। देशज ज्ञान के विकास के बगैर कोई देश ही नहीं, विश्व के तमाम विकसित व विकासशील राष्ट्र शिखर पर पहुँचने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।

जिनका समाधान देशज ज्ञान से ही संभव है

एक ऐसे देश मे जहाँ देशज समुदाय गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी साहित्य-दर्शन संकट व पहचान संकट जैसी समस्याओं के साथ-साथ गलोबल वार्मिंग जैसे वैश्विक विकराल समस्या से जूझ रहा हो, वहां देशज ज्ञान व देशजत्व की भूमिका और बढ़ जाती है। इस परिप्रेक्ष्य में विश्व मे देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र की विशेष महत्ता को समझ सकते हैं। वहीं मानवीय दायित्व भी बढ़ जाता है। भारतीय संविधान मे मूल कर्तव्यों का उल्लेख है, जिसमें अनुच्छेद 51 (क) च, छ ज में यह विस्तृत रूप में सन्निहित हैं। क्योंकि आज देशज समुदाय के समक्ष न सिर्फ विकास की चुनौतियां हैं बल्कि अनेक ऐसी समस्याएं भी हैं, जिनका समाधान देशज ज्ञान से ही संभव है। परंतु देशज ज्ञान के समक्ष भी चुनौतियां ही चुनौतियां हैं क्योंकि देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र सदियों से उपेक्षित होता आया है। फिर देशज दौड़ की प्रारंभिक पंक्ति मे कैसे आ सकता है ? 

            जबकि देशज समुदाय की दृष्टि से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। जिसकी सार्थकता यहाँ के महान देशज व्यक्तित्व भी हैं, जिन्होंने कोयापुनेम को अध्ययन कर जता दिया है कि प्रकृति के संरक्षण संतुलन व संवर्धन के सिद्धांत कोयापुनेम पर निहित है। इसी सिद्धांत की आवश्यकता आज संपूर्ण विश्व को है क्योंकि कोया पुनेम सिर्फ मानव तक सीमित नहीं है बल्कि समस्त जीव-जंतु, निर्जीव व प्राकृतिक घटना चक्र की अवधारणा भी कोयापुनेम मे समाहित है ।

देश मे गोंड व भील सबसे बड़े इंडीजीनस कम्युनिटी हैं

भारत मे देशज जनसंख्या, जनगणना 2011 के अनुसार कुल जनसंख्या का 8,6 % है । 30 राज्यों मे बाहुलता से पाये जाते हैं, देश मे गोंड व भील सबसे बड़े इंडीजीनस कम्युनिटी हैं। आज देशज समुदाय व देशज ज्ञान की मौजूदा हालात को लेकर अनसुलझे अनगिनत सुलगते सवाल हैं। यदि देशज समुदाय संपूर्ण विकास का जनक है तो- देशज समुदाय से महान वैज्ञानिक क्यों नहीं ?, भारत के बहुमुखी विकास के बाद भी हम पिछड़े क्यों हैं ? देशज ज्ञान तंत्र आज देश मे सशक्त उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं करा पा रहा है?

उन्हे एक जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है

विकास की इस दौड़ मे धावक बनकर तैयार है परंतु देशज समुदाय की स्थिति बहुत ज्यादा उपेक्षित व बदहाल है। कहीं-कहीं तो भूख-प्यास में सिर्फ आज भी पारंपरिक कंदमूल फल-फूल खाकर जीवन यापन के लिए विवश हैं, उन्हे एक जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है। सरकारी तंत्र की रूचि मे भी ठंडापन देखने को मिलता है। जबकि सर्व विदित है किसी भी राष्ट्र की मुख्य धरोहर उसकी संस्कृति, विश्वास परंपरा, सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य, देशज ज्ञान तंत्र व परम्परा होती है। जो किसी राष्ट्र को विकसित व विकासशील राष्ट्र का दर्जा दिलाने के लिए आवश्यक मापदंड मे शामिल है।

कोयापुनेम का अस्तित्व व अस्मिता को नयी उड़ान मिल सकेगी

देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र हेतु संपूर्ण विश्व में एक नये युग का प्रादुर्भाव हो रहा है, जहाँ अप्राकृतिक, अमर्यादित, व आडंबरों पर प्रश्न उठ रहे हैं। देशज समुदाय अब अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, दार्शनिक, धार्मिक व भाषिक सभी समस्याओं के निराकरण हेतु कोयतोड़ियन तकनीकी का प्रयोग कर नये-नये राह तलाश कर रही है व देशज ज्ञान तंत्र की नित नयी समझ विकसित कर रही है। यह भार आज युवाओं के कंधों मे है। जिससे देशज समुदाय की देशज ज्ञान तंत्र, कोयापुनेम का अस्तित्व व अस्मिता को नयी उड़ान मिल सकेगी ।


No comments:

Post a Comment

Translate