Sunday, September 27, 2020

युवाओं के आदर्श भगत सिंह के विचार और युवाओं से उनकी क्रांतिकारी उम्मीदें

युवाओं के आदर्श भगत सिंह के विचार और युवाओं से उनकी क्रांतिकारी उम्मीदें

सबको शिक्षा, सबको काम, सबको मिले मेहनत का दाम, जिंदा रहे सबका स्वाभिमान

व्यक्तिगत फायदे की नीति से हटकर सामुहिक जनमानस के फायदे पर कार्य करना होगा


लेखक-स्वतंत्र विचारक
डा. दिग्विजय मरावी

देश के सबसे युवा क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्मदिन 28 सितंबर को आता है, जो सिर्फ फिरंगियों से आजादी के लिए नही लड़े बल्कि वो उन सबसे आजादी के लिए लड़ाई लडेÞ जो लोगो का शोषण करते हैं। समता मूलक समाज निर्माण की क्रांतिकारी विचार के साथ युवा भगत सिंह सदैव पूंजीवाद के खिलाफ रहे, उन्हें किसी व्यक्ति द्वारा, किसी दूसरे व्यक्ति का शोषण बिल्कुल भी पसंद नहीं था और उनकी आजादी की बात भी उन्होने कहा। एक विवेकशील युवा, इंसानियत के सच्चे प्रहरी, क्रांतिकारी विचार और मानव जाति में आर्थिक, समाजिक, शैक्षणिक, समानता जैसे महान उद्देश्यों के साथ भगत सिंह आजादी के आंदोलन में सरीक हुए। 

जो सिर्फ-सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए

हम उनसे मिले नहीं पर आज भी उनके विचार विद्यार्थियों और युवाओं के साथ जीवंत रूप मे हैं और सबको संदेश देते है कि सरकार यदि जनता के हित में कार्य ना करे तो ऐसी सरकार को उखाड़ फैंकना होगा। उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ देश की हालातो को बेहतर बनाने के लिए राजनीति से परहेज को भी उन्होंने गलत ठहराया। वे अपने जुलाई 1928 में लिखे, लेख ''विद्यार्थी और राजनीति'' में लिखते हैं '' यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ-सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए। 

जो राष्ट्र के जीवंत अंगो को धीरे-धीरे नष्ट करता

इन सबके साथ ही शहीदे आजम भगत सिंह धर्म की राजनीति के भी प्रखर विरोधी थे, उनका कहना था कि ''धर्म जब राजनीति के साथ घुलमिल जाता है तो वह एक घातक विष बन जाता है जो राष्ट्र के जीवंत अंगो को धीरे-धीरे नष्ट करता है, भाई को भाई से लड़ाता है, जनता के हौसले पस्त करता है, उसकी दृष्टि को धुंधला बनाता  है, असली दुश्मन को पहचान पाना मुश्किल कर देता है, जनता की जुझारू मन: स्थिति को कमजोर करता है और इस तरह राष्ट्र को सम्राज्यवादी साजिशों की आक्रमणकारी योजनाओं का लाचार शिकार बना देता है।''

सबको काम मिलेगा, मेहनत व हुनर को उचित दाम मिलेगा

भगत सिंह समतामूलक समाज के पक्षधर थे पूंजीवाद और निजीकरण के खिलाफत में उन्होंने कई बार अपने वक्तव्य में इसका जिक्र किया था वो अक्सर बोला करते थे यदि उनको सरकार बनाने का मौका मिला तो किसी के पास प्राइवेट प्रॉपटी नहीं होगी। सबको काम मिलेगा, मेहनत व हुनर सबको उचित दाम मिलेगा। भगत सिंह हर उस विचारधारा के खिलाफ थे जो मानवता के खिलाफ थी। उनका कहना था हम वर्तमान ढांचे के समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं। मनुष्य के हाथों मनुष्य और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र का शोषण असंभव बनाकर, सभी के लिए सब क्षेत्रों मेें पूरी आजादी विश्वसनीय बनाना चाहते है। 

इसके लिए क्रांति का आगाज कर दें

जनता विरोधी हर सरकारी नीति का विरोध ही नहीं अपितु ऐसी सरकार को ही बदलने की बात के पक्षधर थे। एक भाषण में उन्होंने कहा था अगर कोई सरकार जनता को उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का यह अधिकार हीं नहीं बल्कि आवश्यक कर्तव्य बन जाता है कि ऐसी सरकार को बदल दे या समाप्त कर दें, इसके लिए क्रांति का आगाज कर दें। उनके विचार थे अगर आम लोगों में वर्ग चेतना का विकास किया जाए यानी अगर मजदूर और किसानो को समझाया जाए कि उनके असली दुश्मन पूँजीवाद हैं न कि दूसरे धर्म के गरीब, तो इस समस्या का हल निकल सकता है। वे कहते हैं कि रूस की तरह रंग, धर्म, नस्ल और राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर मजदूरों और किसानो को सत्ता हाथ में लेने के प्रयास करने चाहिए, भगत सिंह के ये विचार लेनिन और मार्क्स के विचारो से काफी समानता रखते है। 

देश के युवा उनके आदर्शों पर चलकर एक समतामूलक समाज जरूर बनाएगें

भगत सिंह को जब फांसी दी गई थी तब उनके मन में विचार आया होगा कि अग्रेंज उनको तो फांसी से शहादत तो ले लेंगे परंतु उनके विचारों को कभी नहीं मार सकते, उनको यह उम्मीद भी रही होगी कि देश के युवा उनके आदर्शों पर चलकर एक समतामूलक समाज जरूर बनाएगें, उसके लिए संघर्ष करेगें, पूंजीवाद को परास्त कर समानता स्थापित करेगें परंतु आज युवा ना ही पूंजीवाद के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहा है और ना ही निजीकरण का विरोध जो भगत सिंह के विचारों और उम्मीदो के साथ नाइंसाफी है और इसके लिए जिम्मेदार है आप हम सब और हर युवा जो पार्टीवाद, व्यक्तिवाद, जातिवाद और धर्मवाद से ग्रसित होकर सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज नही उठा रहा।

पूंजीवाद, निजीकरण से कभी आर्थिक, राजनैतिक, समानता की कल्पना नहीं की जा सकती           

1928 किरती के सम्पादकीय कॉलम के लेख में लिखा एक वक्तव्य आज के युवा और शिक्षा को एक संदेश दे रही है जो भगत सिंह के विचार थे, उनका कहना था। जिन लोगो को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगें वो हमें खुद ही समझ लेने चाहिए। हम ये मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है और उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनमें सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा मे शामिल नहीं होना चाहिए? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को निकम्मी समझते है जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए। सही मायनो में देखा जाए तो पूंजीवाद, निजीकरण को ओर बढ़ते सरकार के हर कदम को रोकने के लिए संघर्ष करना प्रत्येक राष्ट्रभक्त का कर्तव्य अधिकार और नैतिक जिम्मेदारी है। 

जाति, धर्म, राजनैतिक दल, मंदिर, मस्जिद से भी ऊपर होता है देश, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश का संविधान। हमारा देश भी एक लोकतांत्रिक देश है जहां अनेको संस्थाएं एवं उपक्रम सार्वजनिक अर्थात सरकारी है, सरकारी अर्थात सभी सार्वजनिक उपक्रमों, संस्थाओं मे देश के सभी नागरिकों का हक है। ये संस्थाए देश के नागरिकों के सुविधाएं एवं बेहतर जीवन शैली की लिए बनी है, जहां आम आदमी के लिए दैनिक जीवन से लेकर आवश्यक कार्य होते हैं साथ ही बेरोजगारों को रोजगार मिलता है, जिससे उनके परिवारों को एक बेहतर जीवन तथा व्यक्ति को देश निर्माण में अपना योगदान देने का अवसर मिलता है परंतु वर्तमान दौर में सरकार पूंजीवाद और निजीकरण की ओर अंधभक्त बनकर आगे बढ़ रही है जो देश के लोकतंत्र और लोगो के भविष्य को अंधकार की ओर ले जा रही है।

सामान्य शब्दो मे कहा जाए तो देश के सार्वजनिक संस्थाओं का निजीकरण आम आदमी के मेहनत की कमाई के टैक्स में डाका है, सिर्फ इतना ही नहीं आपके वर्तमान और भविष्य के रोजगार के सपनो पर भी डाका डालने के समान है, पूंजीवाद, निजीकरण से कभी आर्थिक, राजनैतिक, समानता की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि पूंजीवाद से संसाधनों पर किसी व्यक्ति विशेष या उद्योगघरानो का नियंत्रण हो जाएगा। जिससे आम आदमी पर दबाव बनेगा और निर्णय सिर्फ उद्योगपतियो द्वारा लिया जाएगा। 

उदाहरण के लिए विद्यालयों अस्पतालो को निजी हाथों मे दे दिया गया तो गरीब, दलित, पिछड़ो और आदिवासियों से पढ़ाई छिन जाएगा। मध्यम और गरीब परिवार जो सामान्य वर्ग से भी है उनका भी पढ़ने का अधिकार छिन जाएगा। देश की आजादी के मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हम सब युवाओ के आदर्श शहीद भगत सिंह भी पूंजीवाद के खिलाफ थे। सच कहें तो हम पूंजीवाद से लड़कर ही आजाद हुए थे परंतु 70 वर्षो मे ऐसा क्या हुआ कि सभी सार्वजनिक उपक्रमो को सरकार निजी हाथो मे देना चाहती है और संसाधनो को व्यक्ति विशेष को सौंपकर देश को कुछ चंद अमीरों के इशारों पर चलाना चाहती ही, ये देश के अंदर उपस्थित लाखो करोड़ो प्रतिभावो का अपमान है और जो आने वाले निकट भविष्य में शासकीय नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे है। परंतु चिंतनीय ये भी है कि महज 70-80 वर्षों पहले भगत सिंह जैसे युवा जिस पूंजीवाद, सम्राज्यवाद के खिलाफ क्रांति की ज्वाला में जान की बाजी लगाकर शहीद हो गए उसी देश के वर्तमान के युवा भगत सिह के वंशज पूंजीवाद, निजीकरण का विरोध तक नहीं कर रहे। एक तरफ सरकारी कंपनियों को करोड़ो के कर्ज मे डूबा हुआ दिखा दिया जाता तो दूसरी ओर उद्योगपतियो के हजारो करोड़ो का कर्ज माफ कर दिया जाता है। जबकि सरकार कि जिम्मेदारी और प्राथमिकता होनी चाहिए कि सार्वजनिक अर्थात बीएसएनएल जैसै सरकारी कंपनियों को प्रोत्साहित और सहयोग करे क्योंकि ये कंपनियां आपकि मेरी और सभी भारतीयों की है।

भगत सिंह ने क्रांति के अंदर क्रांति का सपना देखा              

भगत सिंह का संंघर्ष केवल राजनैतिक आजादी तक ही सीमित नहीं थी, उनका मानना था कि देश में सामाजिक, आर्थिक क्रांति का होना भी बेहद जरूरी है क्योंकि ब्रिटिशों के जाने के बाद जब भारत में जो सत्ता बनेगी वो भी जनता का वही शोषण करेगी जो अंग्रेजों ने किया तो इस लिहाज से भगत सिंह ने क्रांति के अंदर क्रांति का सपना देखा। अंग्रेजों के खिलाफ जो लड़ाई चल रही थी, उसमें भी उन्होंने बाकी लोगों से अलग रास्ता अपनाया और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले खेमे में भी संघर्ष किया। भगत सिंह को यदि देश के युवा सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते है तो युवाओं को भगत सिंह के विचारों को आत्मसात करना होगा क्योंकि भगत सिंह को हमेशा  एक उग्र क्रांतिकारी दिखाया गया है, जो गलत है उन्होंने कहा भी था, बम-बारूद से क्रांति नही आती क्रांति विचारों से आती है। इसके साथ ही क्रांति के वो पक्षधर थे परंतु एक विवेकशील क्रांति के, जहां तक हो सके किसी का अहित ना हो। अत: हमें उनके विचारों को अपनाकर ही कार्य करना होगा। राष्ट्र में समानता के लिए पूंजीवाद से लेकर सरकार की हर नीतियों का विरोध करना होगा जो निजीकरण के रास्ते संसाधनों पर किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह विशेष को अधिकार देना चाहती है। उन राजनैतिक विचारधारा की खिलाफत करनी होगी जो धर्म के नाम पर लड़ाकर सत्ता और संसाधनों पर कब्जा करना चाहती है।

राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों पर वफादार बनें

युवाओ को कम से कम इतना जागरूक तो जरूर बनना होगा कि वो अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों पर वफादार बनें। संविधान के रक्षा के लिए क्रांति करने से पीछे ना हटें। व्यक्तिगत फायदे की नीति से हटकर सामुहिक जनमानस के फायदे पर कार्य करना होगा। आम आदमी तक ये संदेश पहुचाना होगा कि एक सुई से लेकर सोना तक के खरीदारी में आपने जो टैक्स दिया है और स्वयं के आय में जो आयकर भरा है उन सबका सरकार दुरूपयोग ना कर सके यानि जनता के टैक्स के पैसो का उपयोग चंद उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के फायदे के लिए खर्चे में ना लिया जाए बल्कि जनता के बुनियादी अधिकारो के आपूर्ति एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमो को बेहतर बनाने के लिए उपयोग मे लिया जाए। 


लेखक-स्वतंत्र विचारक
डा. दिग्विजय मरावी

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