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खंडवा संसदीय उपचुनाव में भाजपा-कांग्रेस को है उम्मीदवार की तलाश तो विकल्प के रूप में जयस से है उम्मीद

खंडवा संसदीय उपचुनाव में भाजपा-कांग्रेस को है उम्मीदवार की तलाश तो विकल्प के रूप में जयस से है उम्मीद  


खंडवा। गोंडवाना समय।

मध्यप्रदेश की राजनीति की यदि हम बात करें तो प्रदेश में जहाँ भाजपा-कांग्रेस का आदिवासी नेतृत्व बुढ़ापे की ओर अग्रसर हैं वहीं जय आदिवासी युवा शक्ति नवयुवकों की फौज तैयार कर रहा है जिसमें आदिवासी समाज के शिक्षित ही नहीं प्रशिक्षित युवा तन, मन, धन से जयश में जोश के साथ आगे कदम बढ़ा रहा है। प्रदेश में जनजाति समाज ही नहीं अन्य वर्गों के जनहित की समस्याओं को लेकर जयश उनकी आवाज बनकर सरकार तक पहुंचाने में सशक्त माध्यम बनता जा रहा है।

कांग्रेस बना सकती है ओबीसी को अपना उम्मीदवार 

वहीं यदि हम प्रदेश की सियाशत को लेकर बात करें तो आगामी समय में चाहे खंडवा उपचुनाव हो या जोबट उपचुनाव हो, उसमें अब कोई भी पार्टी आदिवासी युवाओ को नकारने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रही है। कांग्रेस खंडवा से किसी आदिवासी युवा चेहरे को चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति पर काम कर रही है क्योंकि 8 में से 4 विधानसभा बागली, पंधाना, नेपानगर, भीकनगांव आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है तो वही मन्धाता, बड़वाह, बुरहानपुर में भी आदिवासी मतदाताओं की संख्या अत्याधिक है। रॉबिन हुड टंट्या मामा का जन्म भी भीकनगांव के पास बड़दा गाँव मे हुआ था। खंडवा विधानसभा सीट अनुसूचित जाति हेतु आरक्षित है किसी पिछड़े वर्ग के युवा को भी उतार सकती है जिसका आदिवासी वर्ग में अच्छी पैठ हो। 

भाजपा उम्मीदवार बनाने फूंक-फंूककर रखी कदम 

वही भाजपा अर्चना चिटनीस, कुंवर विजय शाह जैसे बुजुर्ग नेताओ के भरोसे दम भर रही है। कुंवर विजय शाह हैं तो राजगोंड लेकिन वह अधिकांशतय: आदिवासियों का कम जमींदारों का अधिक प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। वह पारम्परिक ग्राम सभा, पैसा एक्ट, 5 वी अनुसूची पर कभी मुखर नहीं रहे, मकड़ाई स्थित उनके महल में राम मंदिर है जहाँ हिन्दू देवी देवता पूजे जाते है, जबकि आदिवासी वर्ग शम्भू पेन को मानता है। वहीं कुंवर विजय शाह की माँ नेपाल की राजकुमारी थी, उनका पालन पोषण एक राजकुमार की तरह हुआ है उन्होंने कभी संघर्ष का स्वाद चखा ही नहीं है। वही आदिवासी वर्ग आज पलायन, कुपोषण, बेरोजगारी से जूझ रहा है उसे कभी बड़े-बड़े बांध कभी फारेस्ट रिजर्व के नाम पर अपने पुरखों की जमीन से हकाला जा रहा है। भाजपा प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के बाद भी खंडवा में उम्मीदवार की तलाश में फूंक-फंूककर कदम रखने का प्रयास कर रही है। 

जयस बन रहा आदिवासियों की मुखर आवाज

वही दूसरी ओर मध्य प्रदेश की राजनीति में जयस आदिवासियों के संघर्ष में सहभागिता निभाते हुये अग्रिम पंक्ति में नजर आ रहा है। जयस आदिवासी समाज के साथ साथ जनहित के मुद्दों, किसान-मजदूरों की आवाज भी उठाने में कहीं पीछे नजर नहीं आ रहा है, कहा जाये तो आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई जयस लड़ता नजर आ रहा है। हालांकि जयस एक समाजिक संगठन है परंतु वह बीते सत्ता शासन व वर्तमान की राजनीतिक व्यवस्थाओं को देखकर राजनैतिक दिशा में भी अपना कदम बढ़ाने की ओर अग्रसर है। जयस में युवा नेतृत्व की कमी नहीं है, बीते  महिनों व वर्षों में जनसमस्याआें को लेकर सड़क उतरकर बुलंदी के साथ मुखर आवाज उठाने में जयस महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके बाद भी यह कहा नहीं जा सकता है कि जयस चुनावी मैदान में उतरेगा या नहीं क्योंकि जयस एक सामाजिक संगठन के रूप में कार्य कर रहा है। इसलिये जयस के चुनावी मैदान में संगठन के किसी उम्मीदवार के आगामी उपचुनाव में उतारने के लिये संशय बना हुआ है। 

खंडवा संसदीय क्षेत्र में 8 लाख 25 हजार से अधिक है आदिवासी मतदाता  

खंडवा लोकसभा सीट परआदिवासी मतदाताओं की संख्या में बाहुल्य स्थिति में नजर आती है। खंडवा संसदीय सीट में आदिवासियों का बाहुल्य होने से आदिवासियों की हक अधिकार की आवाज उठाने वाले संगठनों की ओर संसदीय क्षेत्र का मतदाता आशा भरी नजरों से विकल्प के रूप में भी देख रहा है। वहीं हम आपको बता दे कि खंडवा संसदीय क्षेत्र में आदिवासी मतदाताओं की संख्या लगभग 2 लाख 90 हजार से अधिक की संख्या में है। जिसमें 1. पंधाना विधानसभा में लगभग 1 लाख 70 हजार, 2. नेपानगर  विधानसभा 1 लाख 70 हजार, 3. भीकनगांव विधानसभा क्षेत्र  में लगभग 1 लाख 55 हजार, 4. बागली विधानसभा क्षेत्र में लगभग 1 लाख 5 हजार, 5. मन्धाता विधानसभा क्षेत्र में लगभग 75 हजार, 6. खंडवा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 55 हजार आदिवासी और 60 हजार दलित मतदाता है, इसी तरह 7. बड़वाह विधानसभा क्षेत्र में लगभग 65 हजार, 8. बुरहानपुर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 30 हजार की संख्या आदिवासी  मतदाता की हो सकती है।  

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