Wednesday, October 27, 2021

आज हम और आप सभी, गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन के सजग सिपाही बने हैं तो यह गोंडवाना रत्न दादा हीरासिंह मरकाम जी की ही देन हैं

आज हम और आप सभी, गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन के सजग सिपाही बने हैं तो यह गोंडवाना रत्न दादा हीरासिंह मरकाम जी की ही देन हैं

प्रतिवर्ष 28 अक्टूबर को गोंडवाना पुनरुत्थान दिवस के रूप में मनाया जाएगा


लेखक/विचारक/संकलनकर्ता
''गोंड धुर्वे अनिल सिंह'' 

महान युग की शुरूआत हमेशा एक मानव के महान संघर्ष से होती हैं और यही महान संघर्ष उसे महामानव की संज्ञा देती हैं।


ठीक उसी प्रकार गोंडवाना युग का प्रारंभ गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम जी के करकमलों व गहन चिंतनो से हुई हैं। देश के जनजातियों एवं जनसमुदाय के लिए प्रत्येक क्षेत्र में विकल्प का द्वार खोलकर, पूरे समुदाय का उत्थान करके, हम सभी को सही दिशा मार्गदर्शन देकर पेनवासी हो गए। 

जनजाति समुदाय व गोंडवाना के लोगों के पुनरुत्थान के लिए संघर्ष पूरे जीवन काल में किया 


गोंडवाना आंदोलन ऐतिहासिक हैं, जो गोंडवाना भू-भाग में जीवों के अस्तित्व में आने के साथ ही शुरू हैं। वहीं 21 वीं सदी में प्रस्फुटित, लहलहाती, गोंडवाना आंदोलन आज से नही बल्कि देश की आजादी के पूर्व से चला आ रहा विशाल आंदोलन हैं और यह गोंडवाना आंदोलन, गोंडवाना भू-भाग के सम्मान में समस्त गोंडवानावासियों का हैं। गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन के प्रणेता/जनक गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम जी के द्वारा पूरे देश में सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, व्यवसायिक, साहित्यिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, वैज्ञानिक जैसे समस्त दृष्टिकोण से जनजाति समुदाय व गोंडवाना के लोगों के पुनरुत्थान के लिए संघर्ष पूरे जीवन काल में किया गया। 

आदिवासियों के स्वाभिमानी नारों में समाजविरोधी चुनौती दिखाई देती है

आज हम और आप सभी, गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन के सजग सिपाही बने हैं तो यह गोंडवाना रत्न दादा हीरासिंह मरकाम जी की देन हैं। देशवासियों के उल्लास, उमंग, जद्दोजहद और प्रयोग से भारत में 15 अगस्त 1947 में आजादी मिली और 26 जनवरी 1950 में संविधान मिला। उम्मीद जगी कि समाज के सबसे कमजोर तबकों दलित और आदिवासी के साथ हो चुके अन्याय की भरपाई करते अन्याय रोका जाएगा लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा। यह त्रासदायक खबर हैं कि आज के शिक्षित आदिवासी युवा तक यह नहीं जान पाये कि संविधान बनाने में आदिवासी अधिकारों को लेकर बहुत बड़ा धोखा हुआ हैं।
            आदिवासी समाज को सबसे बड़ा भरोसा पंडित जवाहरलाल नेहरू पर था। नेहरू ने यह जिम्मेदारी बाबा साहब अम्बेडकर को सौंपी। बाबा साहब ने दलित उत्थान को अपने निजी अनुभवों की तल्खी का इजहार करते लगातार ध्यान में रखा। गांधी के विश्वासपात्र ठक्कर बापा को संविधान सभा में गैरआदिवासी होने पर भी आदिवासी अधिकार तय करने की उपसमिति का अध्यक्ष बनाया। ठक्कर बापा ने सबसे उद्दाम, मौलिक, बेलौस और प्रखर आदिवासी सदस्य जयपाल सिंह मुंडा के मौलिक, साहसी और शोधपरक सुझावों का लगातार विरोध किया। संवैधानिक ज्ञान में निष्णात आलिम फाजिल कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी जयपाल सिंह के तर्कों को ठिकाने लगाने में शहरी भद्र वाला आचरण किया।
            कई और थे जिन्हें आदिवासियों के स्वाभिमानी नारों में समाजविरोधी चुनौती दिखाई देती है। जयपाल सिंह का बुनियादी तर्क आज भी संशय, ऊहापोह और नामुराद भविष्य में तैर रहा है। वे तय नहीं करा पाए कि नागर सभ्यता की पैदाइश के काफी पहले से आदिवासी जंगलों और संलग्न इलाकों में अपना पुश्तैनी हक लेकर जीवनयापन करते रहे हैं। संविधान लागू होने पर वह रिश्ता धीरे धीरे खत्म किया जाता रहा है। 

आदिवासी संस्कृति को सरकारी नीतियों और इनको चलाने वालों की नियतों ने ही बर्बाद कर दिया

बीसवीं सदी के आखिरी दशक से अंतर्राष्ट्रीय पूंजीखोर और भारतीय कॉरपोरेटिए ज्यादा से ज्यादा सरकारी संपत्ति की लूट करते अरबपति, खरबपति बनने आर्थिक बराबरी की लोकतंत्र की मूल भावना और न्याय को नेस्तनाबूद कर अट्टहास करने लगे। राजनीतिक व्यवस्था के घाव में प्रशासनिक भ्रष्टाचार का मवाद भरा है। आदिवासी संस्कृति को सरकारी नीतियों और इनको चलाने वालों की नियतों ने ही बर्बाद कर दिया। नौकरशाहों ने मध्ययुग के सामंती आचरण को मात दी।
            बुद्धिजीवी तटस्थ, उदासीन, अल्पसूचित और कायर बने रहे। मध्य भारत को टापू समझा गया, देश की धड़कन नहीं। जंगलों को बलात्कार की शैली में लूटा गया। आदिवासी बहनों को कामुकता की वस्तु समझा गया। जंगल की शांति को श्मशान की शांति में तब्दील करने कुचक्र हुए। वनों में कृषि भूमि और कृषि भूमि में वनों की ऐसी त्रैराषिक गणित बनाई गई कि आदिवासी की देह से वस्त्र, आत्मा से अस्तित्व और नाम से पहचान पेड़ों की छाल की तरह उतरते रहे। जो सेठिए अंग्रेजों के समय आदिवासी इलाकों में नहीं आ पाए, आजाद भारत में उनकी तोंदें जंगलों में ज्यादा फूलती रहीं। जुल्म मध्य भारत सहित देश के आदिवासी इलाकों में होता रहा। 

आदिवासी इलाके तो धर्मशाला, सराय या होटल बने ग्राहकों के स्वागत के लिए हैं

मध्य भारत की अनुसूचित इलाकों की कुदरती दौलत आदिवासियों से जबरिया छीन ली गई है। आदिवासी इलाके तो धर्मशाला, सराय या होटल बने ग्राहकों के स्वागत के लिए हैं। अय्याश अमीर और पर्यटक मौज मस्ती और लूट लपेट करने आते हैं। पूरे माहौल में कचरा, मुफलिसी, गंदगी, अभिशाप बिखेरकर लौट जाते हैं। आदिवासियों से चौकीदारी, सफाईगिरी और गुलामी करने की उम्मीदें की जाती हैं।
            वे यह सब करने के लिए सरकारों द्वारा अभिशप्त भी बना दिए गए हैं। यही आदिवासी जीवन का सच है। प्रमुख खनिज, गौण खनिज, जंगली उत्पाद, पानी, धरती, पेड़ पौधे, पशु पक्षी तो दूर आदिवासी की अस्मत और अस्मिता तक कानूनों ने गिरवी रख ली है। सरकारी मुलाजिम और पुलिस ने जंगलों में जाना शुरू किया। उनकी निगाहें आदिवासियों की बहू बेटी, बकरियां, खेत खलिहान और जो कुछ भी उनके साथ दिखे को लूटने की बराबर रही हैं। गांधी के लाख विरोध के बावजूद सरकारी सिस्टम में करुणा और सहानुभूति की कोई जगह नहीं रही। लोकतंत्र आखिर तंत्र लोक में तब्दील हो गया है।

अपने गांव-घर-परिवार को त्याग कर निकल पडेÞ थे दादा हीरा सिंह मरकाम जी 

ऐसे दौर में पेनवासी दादा हीरा सिंह मरकाम जी ने गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन क्रांति के माध्यम से मध्य भारत के मूलनिवासियों को जागरूक करने के उद्देश्य से ''रोटी बचाओ, बेटी बचाओ, संस्कृति बचाओ'' का नारा जन-जन तक गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए अपने गांव-घर-परिवार को त्याग कर निकल पड़े।
        दादा मरकाम जी का ''रोटी बचाओ'' से आशय था जल-जंगल-जमीन बचाओ जो मूलनिवासियों के सम्मानजनक आजीविका के स्त्रोत हैं, ''बेटी बचाओ'' से आशय था अपनी आन-बान-शान-मान-सम्मान-स्वाभिमान बचाओ जो मूलनिवासियों का सांस्कृतिक आभूषण हैं और संस्कृति बचाओ का आशय था गोंडवाना की धर्म, भाषा, संस्कृति, जीवनमूल्यों को बचाओ जो मूलनिवासियों की विशेषता है। जिसके दम पर हमें भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति/ जनजाति का दर्जा प्राप्त हैं।

13 जनवरी 1991 के दिन ''गोंडवाना गणतंत्र पार्टी'' नाम राजनैतिक दल समर्पित करते हैं

गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम जी मरकाम जी के दिन-रात अथक मानसिक-शारीरिक और बौद्धिक परिश्रम से जब मूलनिवासियों में धीरे-धीरे चेतना का प्रसार होने लगता हैं और लोग संगठित होने लगते हैं तो दादा हीरा सिंह मरकाम जी ''अधिकार हमारे जीने के-लड़कर लेंगे सीने से'', '' जल-जंगल और जमीन-यह हो गोंडवाना के आधीन'', ''जिसका होगा राजा-उसका बजेगा बाजा'' नारों के साथ गोंडवाना के मूलनिवासियों को 13 जनवरी 1991 के दिन गोंडवाना गणतंत्र पार्टी नाम राजनैतिक दल समर्पित करते हैं।

अनुसूचित इलाकों की कुदरती दौलत आदिवासियों से जबरन छीनने का दुश्चक्र प्रांरभ हुआ

देश के द्वारा विकास के लिए अपनाएं एलपीजी मॉडल (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण मॉडल) से जनजातीय क्षेत्रों के जल-जंगल-जमीन-जन-जानवर राष्ट्रीय लूट, हिंसा और जुल्म का अड्डा बन गये। खनिजों और वनसम्पदाओं पर कॉरपोरेटी गिद्ध दृष्टि गड़ गई। अनुसूचित इलाकों की कुदरती दौलत आदिवासियों से जबरन छीनने का दुश्चक्र प्रांरभ हुआ।
        आदिवासी इलाके धर्मशाला,सराय या होटल बन गये ग्राहकों के स्वागत के लिए। अय्याश अमीर और पर्यटक मौज मस्ती और लूट-खसोट करने के लिए आदिवासी क्षेत्रों में जाने लगे। आदिवासियों से चौकीदारी, सफाईगिरी और गुलामी करने की उम्मीद की जाने लगी। वे यह सब करने के लिए अभिशप्त बना दिए गए। प्रमुख खनिज, गौण खनिज, जंगली उत्पाद, पानी, धरती, पेड़-पौधे,पशु पक्षी तो दूर आदिवासियों की अस्मत और अस्मिता तक को पूंजीवादी ताकतों ने सत्ता व सरकार के माध्यम से गिरवी रख ली।
             नये-नये खदानों, पावर प्लांटों, वन्य जीव अभ्यारण्यों के नाम से सरकारी/कॉरपोरेटी मुलाजिमों,पुलिसों ने जंगलों में जाना शुरू कर दिया। उनकी निगाहें आदिवासियों की बहू-बेटी, बकरियां, खेत-खलिहान और जो कुछ भी था उसे लूटने की रही। सरकारों में दम ही नहीं कि इसे रोक पाये।

''गोंडवाना में आ, गैंती-फावड़ा उठा, गोंडवाना में समृद्धि ला और खुद की सरकार बना''

आजाद देश में अपने ही जल-जंगल-जमीन-जन-जानवरों से विस्थापित सत्ता के खिलाफ आक्रोशित मूलनिवासी युवाओं को दादा मरकाम जी ने ऐसे भयावह दौर में संवैधानिक तरीके से अपनी लड़ाई को जारी रखने के लिए ''संघर्ष के साथ निर्माण'' की सीख दी और नारा दिया ''गोंडवाना में आ, गैंती-फावड़ा उठा, गोंडवाना में समृद्धि ला और खुद की सरकार बना।''

गोंडवाना के लोगों जीओ और हजारों, लाखों को जीवन दो

गोंडवाना समग्र विकास आंदोलन क्रांति के माध्यम से पेनवासी दादा हीरा सिंह मरकाम जी ने अपने द्वारा लिखित किताब ''गोंडवाना के लोगों जीओ और हजारों, लाखों को जीवन दो'' से देश के मूलनिवासियों के बहुमुखी विकास के लिए अपने कार्यकतार्ओं, पदाधिकारियों और समर्थकों को जीएस 7 का फामूर्ला दिया। यहां जी से तात्पर्य गोंडवाना से हैं।

जीएस 7 का फामूर्ला दिया

जीएस 1-स्वास्थ्य, जीएस 2-शिक्षा (रोजगार मूलक एवं गुणवत्ता युक्त और नैतिकता पूर्ण शिक्षा) जीएस 3-संस्कृति (प्रकृति संस्कृति-परिपूरक सहयोग) जीएस 4-स्वावलंबन (कृषि, पशुधन एवं वन संपदा ही जीवोत्थान का आधार है। किसान व गांव को स्वावलंबी बनाना, समस्या मुक्त,ऋण मुक्त व रोजगार युक्त बनाना हैं। अनुशासित गोंडवाना संगठन के समस्त सदस्यों को समय-सीमा के भीतर रोजगारवान बनाना है।) जीएस 5-सामुदायिकता (सामुदायिक जीवन दर्शन, सामाजिक संपदा और सामाजिक उत्तरदायित्व निर्वहन के आधार पर सामाजिक संस्थाओं द्वारा ही षष्ठी, विवाह और मृत्यु संस्कार को पूरा करना, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा को भी सामूहिक सेवा में निहित करना) जीएस 6-सुरक्षा-गोंडवाना की शांति व सुरक्षा व्यवस्था हेतु स्थायी गोंडवाना विकास एवं शांति सेना बनाना। प्रकृति,जल, जंगल, जमीन व वायु और ध्वनि प्रदूषण को रोकना। जीएस 7-सत्ता (पारदर्शी, निष्पक्ष, प्रशासन व्यवस्था संचालन करना)

गोंडवाना आवासीय शाला त्यागी कृषि विद्यालय की नींव रखी


दादा हीरा सिंह मरकाम जी का कहना रहा कि ''मूलनिवासी समाज शिक्षा, सम्पदा और सत्ता पे आर्यों के आगमन के बाद से वंचित रहा है इसलिए तथाकथित सभ्य कहलाने वाली समाज इन्हें पिछड़ा कहती हैं और आज भी यह समाज सही शिक्षा, सम्पदा और सत्ता से वंचित हैं।'' इन्हीं विचारों को आधार मानकर दादा हीरा सिंह मरकाम जी ने छत्तीसगढ़ राज्य के मुंगेली जिले के लोरमी विकासखंड के ग्राम बोड़तरा कला में आर्थिक कमजोरी के चलते अपनी पढ़ाई को छोड़ देने वाले छात्र-छात्राओ के लिए गोंडवाना आवासीय शाला त्यागी कृषि विद्यालय की नींव रखी।

दादा हीरा सिंह मरकाम जी के इस संदेश से समझे सफलता का रहस्य 

पहला सुख निरोगी काया,
दूजो सुख घर में हो माया,
तीजो सुख सुलक्षणा-सुलक्षण मातृ-पितृ शक्ति,
चौथा सुख सपूत हो आज्ञाकारी,
पांचवां सुख देश में हो आशा,
छठवां सुख सत्ता हो पासा,
सातवां सुख संतोषी जीवन,
धन्य धन्य गोंडवाना दर्शन।
गोंडवाना पुनरुत्थान दिवस

अपना जीवन, गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन को समर्पित करते हैं

आइए हम सब मिलकर उनके पहली पुण्यतिथि के अवसर पर संकल्प लेते हैं कि जिस प्रकार दादा हीरा सिंह मरकाम जी ने गोंडवाना और गोंडवाना के लोगों के उत्थान में पूरा जीवन समर्पित कर दिया, उसी प्रकार हम भी दादा हीरा सिंह मरकाम जी के बताये नक्शे-कदम पर अपना जीवन, गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन को समर्पित करते हैं। 

पेनवासी दादा हीरा सिंह मरकाम जी के चरणों को सेवा जोहार करते हैं

गोंडवाना के उत्थान के लिए दादा जी के पुण्यतिथि को गोंडवाना पुनरुत्थान दिवस के स्वरूप देकर पेनवासी दादा हीरा सिंह मरकाम जी के चरणों को सेवा जोहार करते हैं। अब से गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन के जनक गोंडवाना रत्न दादा हीरासिंह मरकाम जी के पुण्यतिथि 28 अक्टूबर को गोंडवाना पुनरुत्थान दिवस के रूप में मनाया जाएगा, जो कि इस गोंडवाना भू-भाग के जनसमुदाय के लिए प्रेरणा स्रोत व आदर्श हैं, क्योकि वे अपना संपूर्ण जीवन काल को गोंडवाना आंदोलन हेतु समर्पित किए।

समग्र ऊर्जा का एकीकरण कर दादा हीरा सिंह मरकाम जी के सपनों को पूरा करेंगे

गोंडवाना के लोगों, अन्नदाताओं, सभी मातृशक्तियों, जोश से लबरेज युवाओं, बुजुर्गों, वरिष्ठजनों, पथ प्रदर्शकगणों, आइये, जिस समर्पणभाव से दादा हीरा सिंह मरकाम जी ने देश व समाज की एक-एक विषयों व समस्याओं पर बारीकियो से चिंतन-मनन किया व समाधान व निराकरण के लिए सभी क्षेत्रो में एक सशख्त प्लेटफार्म बनाकर हमें दिया, गोंडवाना के पुनरूत्थान में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। इसे हम गोंडवानावासी मिटने नही देंगे, बल्कि दुगुने उत्साह से गोंडवाना की दशा और दिशा पर चिंतन करेंगे और समग्र ऊर्जा का एकीकरण कर दादा हीरा सिंह मरकाम जी के सपनों को पूरा करेंगे।


लेखक/विचारक/संकलनकर्ता
''गोंड धुर्वे अनिल सिंह'' 

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