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एकता के लिए समानता को आवश्यक मानते थे संत रविदास-भंते बुद्धपाल

एकता के लिए समानता को आवश्यक मानते थे संत रविदास-भंते बुद्धपाल          

सिवनी। गोंडवाना समय। 

हजारों ऊंच नीच जातियों और अनेक सम्प्रदायों की आपसी फूट और नफरत के कारण देश गुलामी के दौर में जकड़ चुका था तब संत रविदास जी ने देश की एकता के लिए समानता को आवश्यक बताया।


क्योंकि समानता में एकता और एकता में शक्ति होती है।          

बेबाक बैनरों ने नगरवासियों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया 


उक्ताशय के विचार गत दिवस बौद्ध विद्वान भंते बुद्धपाल ने मंगलीपेठ अम्बेडकर वार्ड के रविदास मंदिर में संत रविदास जी की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर व्यक्त किये।
        

इसके पूर्व संत रविदास जयंती समारोह के प्रारंभ में मंगलीपेठ सिवनी से एक आकर्षक शोभायात्रा निकाली गई।

जिसमें देश और समाज की बबार्दी के लिए जिम्मेदार भेदभाव और पाखण्ड की असलियत को पोस्टर और बैनरों के माध्यम से दशार्या गया था। इन बेबाक बैनरों ने नगरवासियों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया। 

रविदास जी ने वही कहा जो गौतम बुद्ध ने कहा था 


संत रविदास जी की प्रतिमा का अनावरण करते हुए भंते बुद्धपाल ने आगे बताया कि संत रविदास जी ने तथागत गौतम बुद्ध की शिक्षाओं अपनी सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। आचार्य रजनीश अर्थात ओशो ने साफ शब्दों में कहा है कि रविदास जी ने वही कहा जो गौतम बुद्ध ने कहा था। इस तरह वे 14 वी शताब्दी के बोद्धिसत्व थे। 

शिक्षा शेरनी का दूध है


इस अवसर पर मजदूर किसान नेता डी डी वासनिक ने बोद्धिसत्व रविदास जी की वाणी को अपनाने पर जोर दिया। पी जी कालेज के सहायक प्रध्यापक टी के सागर ने संत रविदास जी वचनों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आज दलित शोषित वर्ग को जो भी सुविधाएं मिल रही हैं वह बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की मेहरबानी है। प्रध्यापक वर्मा ने बताया कि शिक्षा शेरनी का दूध है। केवल अच्छी शिक्षा से ही पिछड़े वर्गों का उत्थान होगा। सहायक प्रध्यापक सतनामी ने नशाखोरी से दूर रह कर विकास की ओर अग्रसर होने की बात कही। 

कार्यक्रम का संचालन रघुवीर अहरवाल ने किया


कार्यक्रम का संचालन रघुवीर अहरवाल ने किया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में माखनलाल अहरवाल, अरविंद बाघ्या, ज्ञानीलाल अहरवाल, अर्पित राउत, मनीष अहरवाल, गोपाल बाघ्या, संतोष बाघ्या, सतीश  बाघ्या, विशाल महोबिया, विनीत बाघ्या, संतोष अहरवाल, महेश बाघ्या और बड़ी संख्या में महिलाओं का उल्लेखनीय योगदान रहा।  

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