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भगोरिया हाट की सोमवार से धूम, इस बार लोकसभा चुनावों के बीच भगोरिया हाट

भगोरिया हाट की सोमवार से धूम, इस बार लोकसभा चुनावों के बीच भगोरिया हाट

भगोरिया : भीलों का अनोखा हाट-परम्परा और संस्कृति का केंद्र

समय बदला, प्रकृति बदली, परंतु नही बदली पहचान

भगौरिया हाट बाजारों की शुरूआत 18 मार्च से हो रही हे जो कि 24 मार्च तक चलेगें


विशाल चौहान, संवाददाता
अलीराजपुर। गोंडवाना समय। 

लोक संस्कृति के महापर्व भंगोरिया हाट की शुरूआत आज से होगी। सांस्कृतिक आभूषणों (तागली, कमरबंद, हाथ कड़े, रमझोल, पायल) व अलग-अलग रंगों वाली रंग-बिरंगी पोशाखें पहने युवतियां, दूसरी ओर गमछा/पगड़ी बांधे बाँसुरी पर तान सुनाते, अलहड़ मस्ती में कुर्राट देते युवक और फिर क्या बच्चे, क्या बुढ़े, क्या युवा, क्या स्त्री, क्या पुरूष हर कोई अपनी ही मस्ती में थिरकता हुआ।

स्थानीय भाषा मे भोंगर्या या भोंगर्यो कहा जाता हैं      


कपोल कल्पित सी रंग बिरंगी दुनिया की यह तस्वीर देश के आदिवासी भील समुदाय के गढ़ मध्यप्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी और खरगोन की आदिवासी भील जनजाति के एक खास हाट (बाजार) भगोरिया हाट का है जिसे स्थानीय भाषा मे भोंगर्या या भोंगर्यो कहा जाता हैं।
            उपरोक्त क्षेत्रों के अलावा गुजरात और राजस्थान की मध्यप्रदेश की राज्यवर्ती सीमा से लगे क्षेत्रों में भी भगोरिया लगता हैं. जहाँ आदिवासी भील जनजाति निवास करती है। वक्त वक्त पर भील जनजाति निवासर इस क्षेत्र में भील प्रदेश बनाने की मांग उठती रही है।

भील जनजाति कृषि पर निर्भर होती हैं


रबी की फसल की कटाई के बाद व होली के त्यौहार से ठीक एक सप्ताह पहले स्थानीय साप्ताहिक बाजार वाले दिन के अनुसार लगता हैं। इस हाट में खुशी का माहौल इसलियें भी रहता हैं क्योंकि सारे कृषि कार्य समाप्त हो जाते हैं। यहां पर उल्लेखनीय है कि भील जनजाति कृषि पर निर्भर होती हैं।
        भगोरिया हाट में रंग- गुलाल के साथ माझम-काकणी (शक्कर से बनी विशेष मिठाई), चने, जलेबी, बुंदी, बुंदी के लड्डु, अंगूर, गन्ने, शकरकंद, होली पूजन सामग्री और सेव की खूब खरीददारी होती हैं। ज्ञात हो कि देशभर में खूब खायीं जाने वाली सेव इन्हीं भीलों की देन हैं जिसे पहले 'भीलड़ी सेव' कहा जाता था।
            और पान तो इस भगोरिया हाट की पहचान ही बन चुका है। आदिवासी समुदाय फागुन माह की पूर्णिमा (होलीका दहन) से ठीक एक महीने पहले माघ माह की पूर्णिमा पर होलिका स्थापना करते है, जिसे डांडा गाढ़ना कहा जाता है। इसकी स्थापना के बाद आदिवासी समाज अगले चैत्र मास की नवमी तक विवाह (मांगलिक कार्य) नहीं करते है। 

दिलचस्प इतिहास 

भोंगर्या पर लिखी अनेकों किताबों का अध्ययन और पूर्वज बताते हैं कि भोंगर्या राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। उस समय भील राजा कसुमर (पहले भील राजा) औऱ बालून ने अपनी राजधानी भगोर (भगोर रियासत) में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन (1000ई-1015ई) के बीच करना शुरू किया था। उस वक़्त झाबुआ अंचल में महज 05 रियासतें थी।
                 धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्हीं का अनुसरण करना शुरू किया, जिससे हाट और मेलों को भोंगर्या कहना शुरू हुआ। इस बीच कुछ लोगों द्वारा यह अपवाह फैलाई जाने लगी कि भगोरिया में युवक-युवतियाँ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं. यह उत्सव आदिवासी वेलेंटाइन डे है, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नही होता, सरासर झूठ है।
                 मैं यह दावे से इसलिये कहता हूं क्योंकि स्वयं इस आदिवासी भील समुदाय का हिस्सा हूं, क्षेत्र से संबंध रखता हूं और विषय के संबंध में मैंने स्वयं ही शोध किया है. हां लेकिन यह जरूर है कि हाट में मित्रों- रिश्तेदारों को पान खिलाने का प्रचलन शुरूआत से रहा है. जो अब वक़्त के साथ गुम सा होने लगा है।
        आदिवासी भगोरिया हाट का महत्व इसलिये भी बढ़ा है क्योंकि उस वक़्त आवागमन के साधन कम हुआ करते थे तो इस हाट में होली का न्योता रिश्तेदारों को दिया जाता था क्योंकि नजदीकी भगोरिया हाट में सारे आसपास के लोग एकत्रित होते थे।
            रिश्तेदारी भी तब नजदीक ही हुआ करती थीं जिसकी वजह आवागमन के साधन न होना ही मुख्य रही है इनकी पारंपरिक वेशभूषा, आभूषणों ने आज विश्व स्तर पर अलग पहचान पाई है. और तो और विश्व भर से कई पर्यटक इस हाट को देखने आते है।
            विदेशी पर्यटकों का केंद्र बिंदु 'वालपुर, सोंडवा, चांदपुर' का भगोरिया हाट अक्सर रहता है वहीं हाट में झूलों का मुख्य आकर्षण झाबुआ के नजदीक "ढोल्यावढ़" में  रहता जहाँ एक नजर में झूलों को गिनना मुश्किल सा लगता है। इस हाट में बच्चे-बुढे, स्त्री-पुरुष साथ एकत्रित हो कर पारंपरिक भगोरिया नृत्य करते हैं, आदिवासी समाज स्त्रियों को पुरुषों के बराबर हक और आजादी देता है।
                पुरूष बाँसुरी की कर्णप्रिय तान बजाते हुये और स्त्रियां लोकगीत गाती हुई नृत्य करती है। यह लोकगीत फसलों, संस्कृति, रीति रिवाज, समाज के महापुरुषों, और प्रकृति को ले कर होते है। कई गांवों के कई सारे ढोल-मांदल और कई सारे लोग सब साथ नाचते हुए पलभर को भुल जाते है जैसे कोन अपना, कौन पराया। प्रतित तो ऐसे होता जैसे ये लोग एक दूसरे को सदियों सदियो से जानते हो। आज की शोर शराबें भरी दुनिया में भी मांदल की थाप, बाँसुरी की तान सुकून देती है।

वक्त के साथ बदलाव  

समय की मांग परिर्वतन है और यही प्रकृति का नियम है, यहां भी वक़्त के साथ बदलाव नजर आते है। पारंपरिक हाट मे अब हथेलियों में बांसुरी कम और मोबाइल फोन ज्यादा नजर आते हैं। आवागमन के साधन बहुत है। सबका समूह बनाकर चलकर जाना अब कम हो रहा हैं।
            और बैलगाड़ी की जगह तूफान गाड़ियों और बसों, मोटर साइकिल ने ले ली है। परंतु यह सत्य है कि अगर कुछ नही बदला हैं! तो वह है आदिवासी लोगो की भगौरिया हाट की परंपरा, उनका उत्साह और उमंग। अंतत: आसान शब्दों में कहूं तो यह "खुशियों का हाट होता है, जहाँ कोई रकम खर्च किये बिना ताउम्र याद रह जाये ऐसी खुशियां खरीदी जाती हैं।

पुलिस को खासे इंतजाम सुरक्षा के लिये करना पड़ते है

भगौरिया हाट बाजार राजनैतिक दलों के लिये भी खास महत्व रखते है। राजनैतिक दल इन हाट बाजारों में पंरम्परागत ढोल मांदलों की थाप पर गैरे, अर्थात रैलियों का आयोजन करते है। जिस पार्टी के पास जितने ज्यादा ढोल उसकी उस क्षेत्र में उतनी ज्यादा पकड मजबूत मानी जाती है।
                इसलिये राजनैतिक पाटीर्यां आदिवासी जनों के लिए खाने-पिने का इंतजाम करती है। तडवी, पटेल, सरपंचों का साफा बंधवाकर सम्मान करती है। इस बार लोकसभा चुनावों के बिच भगौरिया हाट 18 मार्च से 24 मार्च तक आ रहे है जिसके चलते इन हाट बाजारों में बहुत ज्यादा चुनावी प्रचार भी इन रेलियों के माध्यम से देखने को मिलेगा।
        भगौरिया हाट बाजार जहां एक और उत्साह एवं उमंग का त्यौहार है। वहीं कई मर्तबा इन हाट बाजारों में व्यवधान भी पैदा हो जाते है, जब इन भगौरिया हाट बाजारों में दो आपसी गुट रंजिश के चलते आमने सामने आ जाते है। जिसे देखते हुए पुलिस को खासे इंतजाम सुरक्षा के लिये करना पड़ते है।

भगौरिया हाट बाजारों में खूब मस्ती, उत्साह एवं उमंग देखने को मिलेगा 

इस साल भगौरिया हाट बाजारों की शुरूआत 18 मार्च से हो रही हे जो कि 24 मार्च तक चलेगें। झाबुआ और आलिराजपुर जिले में कब कहां किस दिन भगौरिया हाट बाजार भरेगें वो इस प्रकार से है। 18 मार्च सोमवार : आलिराजपुर, भाभरा, पेटलावद, बडा गुडा, रंभापुर, मोहनकोट और कुंदनपुर।
            19 मार्च मंगलवार : बखतगढ, आंबुआ, अंधारवाड, पिटोल, खरडू बडी, थांदला, तारखेडी बरवेट। 20 मार्च बुधवार : बरझर, खटाली, बोरी, उमरकोट, माछलिया, करवड, बोडायता, कल्याणपुरा, मदारानी, ढेकल। 21 मार्च गुरूवार : फुलमाल, सोंडवा, जोबट, पारा, हरिनगर, सारंगी, समोई, चैनपुरा। 22 मार्च शुक्रवार : वालपुर, कठिवाडा, उदयगढ ,भगौर, बेकल्दा, मांडली, कालीदेवी।
                23 मार्च शनिवार : नानपुर, उमराली, राणापुर, मेघनगर, बामनिया, झकनावदा, बलेडी। 24 मार्च रविवार : छकतला, कुलवट, सोरवा, आमखूंट, झाबुआ, झिरन, ढोलियावाड, रायपुरिया, काकनवानी और कनवाडा। भगौरिया हाट बाजारों में खूब मस्ती, उत्साह एवं उमंग देखने को मिलेगा। अगर आपने भगौरिया हाट नहीं देखा है तो इस बार झाबुआ और आलिराजपुर अवश्य पहूंचे। फोटो :- अजय भाबर, पत्रकार व लोकगायक



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