आदिवासी की जमीन बिक्री की अनुमति अवैध करार, हाईकार्ट ने 67 साल पुराना सौदा रद्द किया
67 वर्ष पुराने आदिवासी की जमीन बेचने के मामले में हाई कोर्ट का अहम फैसला
फर्जी दस्तावेजों के जरिए आदिवासी की जमीन को सामान्य में कन्वर्ट करने का है मामला
आदिवासियों को वापस मिलेगी जमीन
रांची/झारखंड। गोंडवाना समय।
झारखंड हाईकोर्ट ने आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री और उसके हस्तांतरण के नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने लगभग 67 साल पुराने एक जमीन सौदे को की खरीदी बिक्री को अवैध करार दिया है। हाई कोर्ट ने माना कि आदिवासी जमीन को कानून (सीएनटी एक्ट) के खिलाफ जाकर गैर-आदिवासी को बेचना अवैध है, चाहे वह कितने भी साल पुराना क्यों न हो।
67 साल पुराना है मामला
रांची और आसपास के क्षेत्रों में 1950-60 के दशक (लगभग 67 साल पहले) में हुए जमीन हस्तांतरणों की जांच के बाद यह फैसला आया है। हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जमीन पर घर बना लेने या कब्जा कर लेने से अवैध हस्तांतरण वैध नहीं हो जाता। वहीं अवैध रूप से बेची गई जमीन को वापस मूल आदिवासियों को लौटाने का आदेश दिया जा रहा है।
अनुमति दी गई थी वह कानून के अनुरूप नहीं थी
रांची हाईकोर्ट ने बूटी की 2.90 एकड़ जमीन को लेकर चल रहे बहुचर्चित विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने 67 वर्ष पुराने जमीन सौदे की बुनियाद को अवैध ठहराते हुये मुंजाल परिवार की दो रिट याचिकाएं खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने कहा है कि छोटा नागपूर काश्तकारी सीएनटी अधिनियम का मकसद आदिवाीस की जमीन की सुरक्षा करना है। सुनवाई के दौरान अदालत में 1959 के उस आवेदन की जांच की जिसके आधार पर तात्कालीन उपायुक्त ने जमीन बिक्री की अनुमति दी थी।
अदालत ने साफ कहा कि 1959 में जमीन बिक्री की जो अनुमति दी गई थी वह कानून के अनुरूप नहीं थी इसलिये उसी आधार पर खड़ा किया बाद का पूरा दावा भी टिक नहीं सकता है।
अधिकारी की अनुमति का अभाव
कलेक्टर या उपयुक्त की अनुमति के बिना आदिवासी जमीन का विक्रय शून्य माना गया है। झारखंड में आदिवासी जमीन से संबंधित प्रमुख कानूनी मामले के तहत सीएनटी एक्ट का कड़ाई से पालन के तहत झारखंड में विशेषकर सीएनटी एक्ट के तहत आदिवासी जमीन के हस्तांतरण पर कड़ी रोक है।
ईडी द्वारा जांच की जा रही
रांची में आदिवासी जमीन को फर्जी दस्तावेजों के जरिए सामान्य जमीन में बदलकर बेचने के मामले में ईडी द्वारा जांच की जा रही है। रांची के सुखदेवनगर में 47 डिसमिल आदिवासी जमीन पर बने मकानों पर बुलडोजर कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई थी, जो कि 60-70 साल पुराने विवाद से जुड़ा था।
बरघाट में आदिवासी की जमीन में भूमाफिया ने किया बड़ी सफाई से खेला
बरघाट मुख्यालय में भी आदिवासी की जमीन को खरीदने के लिये मनोज आहूजा गैर आदिवासी भूमाफिया ने सिवनी अपर कलेक्टर कार्यालय से अनुमति लेने के मामले में बड़ी सफाई से खेला किया है। बरघाट का भूमाफिया ने फौती चढ़वाने में भी नाम कटवाकर राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर खेला किया है।
आदिवासी के देव स्थल को खुर्द बुर्द करने में भी खेला किया है। बरघाट में आदिवासी की जमीनों के सौदागर भूमाफिया को आखिर प्रशासन का संरक्षण क्यों मिला हुआ है। आदिवासी की जमीन को सामान्य वर्ग में कन्वर्ट नियम विरूद्ध तरीके से कैसे हो गई।
उप पंजीयक बरघाट सहित अपर कलेक्टर कार्यालय सिवनी सहित शासन प्रशासन क्यों भूमाफिया को बढ़ावा दे रहे है। भूमाफिया के इस खेला के उजागर होने के बाद कई सफेदपोश चेहरे भी बेनकाब होने की संभावना है।
