Friday, June 7, 2019

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्नों से विस्मृत एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बादल भोई

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्नों से विस्मृत एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बादल भोई

मुख्यमंत्री कमल नाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा में आज तक नहीं मिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा 

भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में लाखों देशवाशियों का खून पसीना बहा है लेकिन इतिहास लिखने वालों ने जाति धर्म के चश्में से उन्हीं लोगों को शहीद माना जिनसे उनके और उनके जाति संप्रदाय के लोगों का भला होना था। लाखों ऐसे लोग जो इस देश को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी उन्हे हमारी सरकारें और शासन ने यूं ही भुला दिया यहाँ तक की इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नों में उनका जिक्र तक नहीं किया लेकिन समाज अपने भीतर ऐसे वीरों की यादें सँजोएँ के हमेशा रखता है। ऐसे ही एक वीर और महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे बादल भोई जिन्हे वो सम्मान और नाम नहीं मिला जिसके वो हकदार थे जबकि उसी स्तर का बलिदान देने वाले तांत्या टोपे, भगत सिंह, रानी लक्ष्मी बाई, चंद्रशेखर आजाद इत्यादि को बच्चा बच्चा जानता है। 

छिंदवाड़ा/सिवनी। गोंडवाना समय। 
डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे एवं मोनिका उईके
बादल भोई छिंदवाड़ा जिले के एक महान गोंड स्वतंत्रता सेनानी और एक महान क्रांतिकारी जनजातीय नेता थे । छिंदवाड़ा भोपाल राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित परासिया कस्बे से लगभग 17 किलोमीटर दूर बादल भोई का जन्म डुंगरिया ग्राम पंचायत के तीतरा गाँव मे हुआ था। उनका जन्म एक जमींदार गोंड परिवार में हुआ था जिसका गोत्र परानी है जो गोंडों की देव व्यवस्था के अनुसार सात देव के अंतर्गत आता है। भोई उनका जातिगत उपनाम नहीं था बल्कि सम्मानजनक उपाधि थी जिसका मतलब जमींदार या मालगुजार या सम्पन्न व्यक्ति होता है। उनके माता का नाम श्रीमती विमला परानी और पिता का नाम श्री कल्याण परानी था। उनके 4 बच्चे हुए जिनमें से दो लड़कियां अकबरसा और इमरत भोई थी और 2 लड़के बलदेव परानी और रविशंकर परानी  हैं। उनकी जन्म की तिथि नहीं मालूम है लेकिन उपलब्ध अभिलेखों में उनकी जन्म 1845 में बताया जाता है। मध्य प्रदेश में बादल भोई की तरह की भीमा भोई और हुल्ली भोई भी महान संग्राम सेनानी हुए हैं।

और वे अंग्रेजों को यहाँ से भगाने के यत्न करने लगे

बादल भोई की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी लेकिन उनमें नेतृत्व क्षमता कूट-कूट कर भरी थी। उनका लोगों को प्रभावित करने का अंदाज बहुत ही अलग था । लोगों पर उनकी बातचीत और उनके व्यक्तित्व का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता था । जिससे लोग उनके एक इशारे पर मर मिटने के लिए तैयार हो जाते थे। अपनी इसी नेतृत्व क्षमता के कारण बादल भोई परासिया क्षेत्र के हजारों जनजातीय लोगों को एकत्रित करके अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने सफल हुए थे। उनके समय में छिंदवाड़ा जिला बेश कीमती लकड़ियों और कोयले के लिए बहुत ही प्रसिद्ध था । जिसके कारण अंग्रेजों ने इस प्रकृतिक सम्पदा के दोहन के लिए स्थानीय लोगों को मजदूर के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया और उन्हे तरह तरह की कष्ट और वेदना दी जाती थी । जनजातीय मजदूरों के प्रति नकारात्मक रवैये और उन पर हो रहे अत्याचारों से बादल भोई बहुत दुखी हुए और वे अंग्रेजों को यहाँ से भगाने के यत्न करने लगे।

छिंदवाड़ा में कलेक्टर बंगले का घेराव किया और सरकारी खजाना लूट लिया था

महात्मा गांधी जब तीसरी बार मध्य प्रदेश की यात्रा पर 6 जनवरी 1921 को आए तो वे छिंदवाड़ा गए और वहाँ पर बादल भोई सहित हजारों जनजातीय और अन्य लोगों से मुलाकात किया था। बादल भोई पहले से ही सामाजिक मुद्दों को उठाते रहे थे और लोगों के हितों के लिए काम करते थे लेकिन गांधी जी से मुलाकात के बाद देशभक्ति की भावना जागी और स्वतन्त्रता संग्राम में जी जान से कूद पड़े। उनके नेतृत्व में हजारों जनजातीय लोगों ने वर्ष 1923 में छिंदवाड़ा में कलेक्टर बंगले का घेराव किया और सरकारी खजाना लूट लिया था। अनियंत्रित भीड़ को तीतर बितर करने के लिए पुलिस द्वारा लाठियाँ चलाई गयी जिनमें सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हुए और बादल भोई सहित सैकड़ों लोगों को स्थानीय जिला करगार में कैद कर दिया गया । व्यक्तिगत मुचलके और लिखित आश्वासन  के बाद बादल भोई और उनके साथी टोन को इस बात पर रिहा किया गया की वे भविष्य में कोई भी आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ नहीं करेंगे।

वन व खनिज संपदा बचाने रेल रोको आंदोलन का नेतृत्व किया 

आजादी के जुनून में डूबे बादल भोई को कहाँ चैन था । एक बार फिर से अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया और विरोध स्वरूप रेल रोको आंदोलन का नेतृत्व किया। वे इस बात के घोर विरोधी थे कि छिंदवाड़ा की अमूल्य वन सम्पदा और खनिज यहाँ से बाहर जाये इसलिए उन्होने बहुमूल्य लकड़ियों, कोयले और अन्य संशाधनों से भरी ट्रेन को रोका था। उनका मानना था कि जिले की संपत्ति पर पहला हक उस जिले के लोगों का है और उसे जिले के बाहर न भेजा जाये और जिले लोगों की बेहतरी के लिए उपयोग में लायी जाये।

गुफा से करते थे अंग्रेजी हुकुमत की मुखालफत

काफी दिन अंग्रेजों के आँख का काँटा बने बादल भोई को ढूढ़ने के लिए अंग्रेजों ने कई प्रयास किए लेकिन वे परसिया से कुछ दूर बनी गुफा में छिप जाते थे और वहीं से आंदोलन को दिशा निर्देश देते थे और अंग्रेजों कि हर गतविधियों कि मुखालफत करते थे। वर्ष 1865 के भारतीय वन अधिनियम ने भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद को बढ़ाया और भारत में वनों पर अंग्रेजी हुकूमत का दावा पुष्ट किया। इसके बाद 1878 के नए वन अधिनियम ने भारत के जंगलों में रहने वाले जनजातीय समुदायों द्वारा सदियों पुराने पारंपरिक उपयोग को समाप्त कर दिया। इस तरह से अगं्रेजी उपनिवेशवाद ने वनों पर अपना सम्पूर्ण अधिकार जमा लिया और इस कानून ने सागौन की लकड़ी को सरकारी संपत्ति भी बना दिया। इस कानून का विरोध करने के लिए बादल भोई ने एक बार फिर एक बड़ा आंदोलन किया।

जेल में हुआ अत्याचार, भोजन में जहर देकर जीवन किया समाप्त 

21 अगस्त 1930 को उन्होने छिंदवारा से लगभग 45 किलोमीटर दूर रामकोना नानक स्थान पर वन अधिकार कानून का उलंघन किया और जबरन लोगों के साथ जंगल में घुसकर वहाँ के जंगल उत्पाद को लेकर निकले लेकिन इसी बीच अंग्रेजों ने उन्हे गिरफ्तार कर  किया। बादल भोई को उनके अन्य साथियों से अलग चांदा सेंट्रल जेल, चंद्रपुर, महाराष्ट्र में भेज दिया गया। जहां पर उनपर बहुत ज्यादा अत्याचार और उत्पीड़न किया गया फिर भी उन्हे अपने लोगों के बारे में कुछ भी नाही बताया। अंग्रेजी हुकूमत उनके कारण परेशान हो चुकी थी और बादल भोई की लोकप्रियता दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही थी। फिर जेल बंदी के दौरान ही 1940 में उन्हे खाने में जहर देकर मार डाला गया।

परिवार बदहाली का जी रहा जीवन न मिल रही सरकारी मदद 

देश के स्वतंत्र संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले ऐसे माहन स्वतन्त्रता सेनानी को राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नही मिली। देश में उच्च जाति के लोगों को महज जेल में भेजे जाने के कारण भी स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर दिया गया लेकिन इतना बड़ा काम करने वाले और अंग्रेजों की जान के दुश्मन बन चुके ऐसे महान सेनानी को कहीं स्थान तक नहीं मिला।
आज उनका परिवार बदहाली का जीवन जी रहा है और आज तक उनके वंशजों को कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली है। कहने को तो कई राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं ने उनके नाम का उपयोग अपनी अपनी राजनीति चमकाने और वोट बटोरने के लिए किया लेकिन कभी भी ईमानदारी से उनके लिए या उनके परिवार के लिए कुछ नहीं किया। जातिवाद को बढ़ावा देने वाले इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने उन्हे कभी स्वतन्त्रता सेनानी का दर्जा ही नहीं दिया और उनके किए गए कार्यों को श्रेय खुद ले लिया।

संग्राहालय का रखा गया नाम 

8 सितंबर 1997 में छिंदवाड़ा के जनजातीय संगठनों और स्थानीय लोगों के दबाव के कारण प्रशासन और राज्य सरकार ने छिंदवाड़ा जिले के एकमात्र जनजातीय संग्रहालय को बादल भोई के नाम पर समर्पित किया। यह संग्रहालय मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सबसे पुराना संग्रहालय है। यह सारे जनजातीय संग्रहालयों में सबसे पुराना है। इसमें 14 कक्ष, 3 गलियारे और 2 खुले हुए गलियारे हैं। भले ही उनके नाम पर आज बहुत से संस्थाए और संगठन आज काम कर रहे हैं लेकिन उनके बारे में आज भी आम लोगों को कोई जानकारी नही है। कुछ अधिष्ठान और संस्थाएं जो बादल भोई के नाम पर आज भी अस्तित्व में हैं।
1.बादल भोई सामुदायिक भवन और गार्डेन, जबलपुर,  2. बादल भोई महाविध्यालय परसिया, छिंदवाड़ा, 3. बादल भोई आदिवासी जन उत्थान संस्था, न्यूटन चीकली छिंदवाड़ा, 4. बादल भोई जनजातीय संग्रहालय छिंदवाड़ा । अभी नए नए बने मेडिकल कॉलेज का नाम भी बादल भोई के नाम पर रखने के लिए मांगे उठ रही है। जिसमे कई जन जातीय संगठन बादल भोई मेडिकल कॉलेज के लिए सरकार और प्रशासन पर दबाव बना रहे हैं। आने वाले दिनों में भी बादल भोई जन जातीय चेतना और राष्ट्रियता के प्रतीक के तौर पर लोगों के दिलों में राज करते रहेगे और इतिहास में हमेशा अमर रहेंगे। गोंडवाना के ऐसे वीर सपूत को बहुत बहुत श्रद्धांजलि और नमन।

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