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Thursday, August 8, 2019

इंडीजीनस नालेज सिस्टम, विश्व के संपूर्ण विकास की जननी है

इंडीजीनस नालेज सिस्टम, विश्व के संपूर्ण विकास की जननी है

देशज समुदाय व देशजत्व ज्वलंत मुद्दे एक अवलोकन 

विशेष संपादकीय लेख
उक्त कथन से हम देशज समुदाय (इंडीजीनस कम्युनिटी) व देशज ज्ञान तंत्र (इंडीजीनस नालेज सिस्टम) के महत्व को समझ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानक शब्द इंडीजीनस व भारत में संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में अनुसूचित जनजाति से संबोधित किये जाते है। देशज समुदाय सिर्फ प्राकृतिक हित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि मौजूदा विज्ञान युग में यह विकास के तमाम पयार्यों के जनक भी हैं।

किसी राष्ट्र की वैज्ञानिक व तकनीकी शोध देशज ज्ञान के बिना असंभव है-

वस्तुत: देश के विकास व सुरक्षा के साथ-साथ प्राकृतिक संतुलन संरक्षण व संवर्धन के लिए भी देशज ज्ञान तंत्र की महती आवश्यकता है। गौरवान्वित हैं हम कि देशज समुदाय की रूढ़ी एवं प्रथा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के स्टेट्यूट्स के अनुच्छेद 38 (1) के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय विधि के मूल व सबसे प्राचीन स्रोत हैं । सच तो यह है कि किसी राष्ट्र की वैज्ञानिक व तकनीकी शोध देशज ज्ञान के बिना असंभव है । देशज ज्ञान के विकास के बगैर कोई देश ही नहीं, विश्व के तमाम विकसित व विकासशील राष्ट्र शिखर पर पहुँचने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ।

क्योंकि देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र सदियों से उपेक्षित होता आया है-

एक ऐसे देश मे जहाँ देशज समुदाय गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, साहित्य-दर्शन, संकट व पहचान संकट जैसी समस्याओं के साथ-साथ गलोबल वार्मिंग जैसे वैश्विक विकराल समस्या से जूझ रहा हो, वहां देशज ज्ञान व देशजत्व की भूमिका और बढ़ जाती है। इस परिप्रेक्ष्य मे  विश्व मे देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र की विशेष महत्ता को समझ सकते हैं। वहीं मानवीय दायित्व भी बढ़ जाता है । भारतीय संविधान मे मूल कर्तव्यों का उल्लेख है जिसमें अनुच्छेद 51 (क) च, छ ज मे यह विस्तृत रूप मे सन्निहित हैं क्योंकि आज देशज समुदाय के समक्ष न सिर्फ विकास की चुनौतियां हैं बल्कि अनेक ऐसी समस्याएं भी हैं। जिनका समाधान देशज ज्ञान से ही संभव है परंतु देशज ज्ञान के समक्ष भी चुनौतियां ही चुनौतियां हैं क्योंकि देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र सदियों से उपेक्षित होता आया है। फिर वह दौड़ की प्रारंभिक पंक्ति मे कैसे आ सकता है ?

देशज समुदाय स्वयं की पहचान छिपाकर छद्म ज्ञान के भूल भुलैया में खोया हुआ है-

सदियों से इस उपेक्षित देशज समुदाय की समस्याओं पर अध्ययन व समीक्षा उपरांत संयुक्त राष्ट्र संघ के जनरल असेम्बली ने अपने प्रस्ताव 49/214 द्वारा 23 दिसम्बर 1994 को निर्णय लेकर 9 अगस्त को इंटरनेशनल डे आफ द वर्ल्ड इंडीजीनस पीपुल्स की घोषणा किया, क्योंकि 9 अगस्त 1982 को यू एन वर्किंग ग्रुप आन इंडीजीनस पापुलेशन की प्रथम बैठक संपन्न हुई थी व सार्वभौमिक अधिकारों की घोषणा भी की। जिसके तहत विश्व के समस्त देशज समुदायों के हक, अधिकार, रूढ़ि प्रथा, परम्परा, संवैधानिक अधिकार, मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए विशेष उपबंध किये गये । जिनकी सतत समीक्षा विश्व के प्रत्येक राष्ट्र करें, यह संयुक्त राष्ट्र संघ की मूलभावना रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानव अधिकारों की अभिवृद्धि व संरक्षण द्वारा मूलभूत स्वतंत्रताओं का सम्मान करना मुख्य उद्देश्य रहा है। देशज ज्ञान तंत्र को उत्कृष्टता पर पहुँचाकर हम देश की देशज समुदाय की तस्वीर को तो खुश रंग बना सकते हैं, वहीं संयुक्त राष्ट्र संघ के मंशानुरूप इंडीजीनस कम्युनिटी के हक अधिकारों की रक्षा कर वैश्विक स्थिति को भी सुदृढ़ बना सकते हैं । इसके लिए अभी तक दरकिनार किये जा रहे समृद्ध कोयापुनेमी परंपराओं की मजबूत नीव रखकर आधुनिक चकाचौंध की धुंध को हटाना होगा, जिसकी वजह से आज देश की देशज समुदाय स्वयं की पहचान छिपाकर छद्म ज्ञान के भूल भुलैया मे खोया हुआ है ।

देशज भाषाओं को वैधानिकता का दर्जा तक नहीं दिला सके-

देश में देशज समुदाय विकास पथ पर पिछड़ा है ही, देशज भाषाओं को वैधानिकता का दर्जा तक नहीं दिला सके हैं, वैश्विक शक्ति बनना तो बहुत दूर है। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिवर्ष के थीम अनुसार वर्ष 9 अगस्त 2019 को संपूर्ण विश्व मे देशज जनो के भाषा के रूप में हर्षोल्लास से मना रहा है। यूएनओ में प्रस्तुत रिपोर्ट (2016) के अनुसार विश्व की लगभग 2680 देशज भाषायें विलुप्ति के कगार पर हैं। अत: यूएनओ ने 2019 को इंटरनेशनल ईयर आफ द इंडीजीनस लेंग्वेज के रूप मे प्रारूपित किया । जिसका मूल उद्देश्य देशज जनो के समृद्धशाली भाषाओ को संरक्षण व विलुप्त होने वाले देशज भाषाओं का संवर्धन करना है व उसके प्रति जागरूकता लाना है ।

देशज ज्ञान ने संयुक्त राष्ट्र संघ को अपना लोहा मनवाया है

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज भारत में देशज समुदाय पर अध्ययनों एवं शोध कार्य की परंपरा निरंतर बढ़ रही है। देशज ज्ञान को बढ़ावा व सम्मान देकर हमने असाधारण उपलब्धियां भी हासिल की हैं। देशज ज्ञान के माध्यम से विज्ञान के नवीन अविष्कार ही नहीं हो रहे हैं बल्कि समृद्धशाली देशज ज्ञान ने संयुक्त राष्ट्र संघ को अपना लोहा मनवाया है। जिसका परिणाम यह है कि आज संयुक्त राष्ट्र संघ देशज के देशज ज्ञान तंत्र को संपूर्ण विकास का जनक मानता है, व गर्व से सम्मानित भी करता है ।

तो-देशज समुदाय से महान वैज्ञानिक क्यों नहीं ?

भारत मे देशज जनसंख्या, जनगणना 2011 के अनुसार कुल जनसंख्या का 8.6 % है और 30 राज्यों मे बाहुलता के साथ निवासरत हैं, देश मे गोंड व भील सबसे बड़े इंडीजीनस कम्युनिटी हैं। आज देशज समुदाय व देशज ज्ञान की मौजूदा हालात को लेकर अनसुलझे अनगिनत सुलगते सवाल हैं। यदि देशज समुदाय संपूर्ण विकास का जनक है तो-देशज समुदाय से महानवैज्ञानिक क्यों नहीं ? , भारत के बहुमुखी विकास के बाद भी हम पिछड़े क्यों हैं? देशज ज्ञान तंत्र आज देश मे सशक्त उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं करा पा रहा है ?

कोयापुनेम पर निहित है प्रकृति के संरक्षण, संतुलन व संवर्धन के सिद्धान्त 

जबकि देशज समुदाय की दृष्टि से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। जिसकी सार्थकता यहाँ के महान देशज व्यक्तित्व भी हैं, जिन्होंने कोयापुनेम को अध्ययन कर जता दिया है कि प्रकृति के संरक्षण संतुलन व संवर्धन के सिद्धान्त कोयापुनेम पर निहित है । इसी सिध्दान्त की आवश्यकता आज संपूर्ण विश्व को है क्योंकि कोयापुनेम सिर्फ मानव तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त जीव जंतु, निर्जीव व प्राकृतिक घटना चक्र की अवधारणा भी कोयापुनेम मे समाहित है ।

बल्कि सुलगते ज्वलंत सवालों के जवाब हमें देने होंगे व तलाशने होंगे

ऐसे प्रकृति सम्मत व्यवस्था जिनके माध्यम से लकीर से हटकर की गई दुर्लभ शोध व दर्शन को संपूर्ण विश्व को शांत बैठकर देखते रहने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है व सिरे से आत्मसात करना पड़ रहा है। क्या देशज समुदाय को अब भी चुपचाप रहना चाहिए जो आधुनिक शोध व नये-नये आविष्कारों के मूल जनक हैं ? नहीं बिलकुल नहीं बल्कि सुलगते ज्वलंत सवालों के जवाब हमें देने होंगे व तलाशने होंगे । मस्तिष्क मे जमी धूल हटानी होगी व देशजत्व को अध्ययन ही नहीं, जीना भी होगा ।

अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित कर गोटुल की पवित्र छवि को  कर रहे धूमिल 

वस्तुत: आज देश मे देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र के पिछड़ेपन व सीमित होने के अनेक कारण हैं। जिन पर समय के रहते दृष्टिपात किया जाना आवश्यक है। जैसे कि प्रथमत: हमारी शिक्षा व्यवस्था है। कहने को तो यह है कि भारत का उच्च शिक्षा तंत्र संपूर्ण विश्व में तृतीय स्थान हासिल किया हुआ है। हमारा स्थान अमेरिका व चीन जैसे विकसित राष्ट्रों के बाद आता है, इसके बावजूद शैक्षणिक पाठ्यक्रम में देशज ज्ञान तंत्र को अपना हक व स्थान हासिल नहीं हुआ है और न ही शिक्षा व्यवस्था में भलीभांति जुड़ पाया है। देशज समुदाय की विडंबना यह है कि गोटुल संस्थान तो आज भी वर्तमान शिक्षा के पहुँच से दूर है क्योंकि समकालीन विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित कर गोटुल की पवित्र छवि को धूमिल किया हुआ है । गोटुल के मान सम्मान को अवनत दिशा मे प्रवाहित किया है । इस अवमूल्यन से देशज समुदाय बहुत आहत है । वहीं समय-समय पर कई ऐसे कृत्य विघटन कारी शक्तियों द्वारा कर दी जाती है जिससे देशज समुदाय की भावनायें निरंतर आहत होती रहती है ।

शोषणकारी शक्तियों से देशज समुदाय के उपरोक्त अधिकारों पर मंडरा रहा खतरा 

भारतीय संविधान में देशज समुदाय के हितार्थ-क्रमश: अनुच्छेद-13 (3) क, 15 (4), 16 (4) 16 (4 क), 16 (4 ख), 19, 23, 24, 29, 29 (1), 46,  164 (1), 243 (घ), 330, 332, 334, 338 (क), 342,पांचवी अनुसूची244 (1),छटवी अनुसूची 244 (2) राज्य विशेष के प्रावधान- 371 (क) नागालैण्ड, 371 (ख) असम, 371 (ग) मणिपुर, 371 (च) सिक्किम, 371 (छ) मिजोरम राज्य के लिए उपरोक्त महत्वपूर्ण अनुच्छेद व प्रावधान है, जिसके तहत देशज समुदाय की रूढ़ी एवं प्रथा, अधिकार, सांस्कृतिक, साहित्यिक, दार्शनिक, अध्यात्मिक, भाषिक, आर्थिक, संवैधानिक, देशजत्व मूल्यों के संरक्षण व संवर्धन किये जाते हैं परंतु वर्तमान परिदृश्य भयाक्रांत युक्त है। शोषणकारी शक्तियों से देशज समुदाय के उपरोक्त अधिकारों पर भी खतरा मंडरा रहा है । देश मे देशज समुदाय व देशजत्व की स्थिति न सिर्फ दयनीय है बल्कि चिंतनीय भी है । इस संक्रमण काल में देशज नेतृत्व व युवा पीढ़ी को गहरी नींद से जागना ही होगा ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-30 में अपनी भाषा में अध्ययन अध्यापन की सुविधा होगी का है उल्लेख 

सरकार के सभी तंत्रों व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विभिन्न योजनाओं व प्रावधानों के तहत कई छात्र छात्राएँ देशज समुदाय पर गहन अध्ययन व शोधकर समाजशास्त्री, मानवशास्त्री व वैज्ञानिक बन भी जायें तो वह नौकरी मात्र तक केन्द्रित होकर रह जाता है। नौकरी से इतर देशज ज्ञान तंत्र व देशजत्व के क्षेत्र में आगे निकलने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। वहीं अन्य समुदाय स्वयं के बारे मे अध्ययन करना व अस्तित्व को बनाए रखने के लिए ज्यादा संघर्ष करते नजर आते हैं । दूसरी तरफ भारतीय संविधान के अनुच्छेद-30 मे अपनी भाषा में अध्ययन अध्यापन की सुविधा होगी का उल्लेख है लेकिन देशज समुदाय के लिए सरकारी स्कूलों मे न तो देशज ज्ञान तंत्र को बढ़ावा देने हेतु प्रेरक माहौल है न ही देशज समुदाय की भाषा में अध्ययन, अध्यापन के तंत्र जीवित है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ के थीम पर यहाँ प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करता है ।

परंतु देशज समुदाय की स्थिति बहुत ज्यादा उपेक्षित व है बदहाल

विकास की इस दौड़ मे धावक बनकर तैयार है परंतु देशज समुदाय की स्थिति बहुत ज्यादा उपेक्षित व बदहाल है। कहीं-कहीं तो भूख प्यास में सिर्फ आज भी पारंपरिक कंदमूल, फल-फूल खाकर जीवन-यापन के लिए विवश हैं, उन्हें एक जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है। सरकारी तंत्र की रूचि में भी ठंडापन देखने को मिलता है । जबकि सर्व विदित है। किसी भी राष्ट्र की मुख्य धरोहर उसकी संस्कृति, विश्वास परंपरा, सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य, देशज ज्ञान तंत्र व परम्परा होती है। जो किसी राष्ट्र को विकसित व विकासशील राष्ट्र का दर्जा दिलाने के लिए आवश्यक मापदंड में शामिल हैं ।

देशज ज्ञान तंत्र का अध्ययन अनिवार्य किया जावे

देश की देशज समुदाय की सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य, पाश्चात्य मूल्यों से अनेक संदर्भो मे भिन्न है, क्यूंकि आडंबरों से दूर संपूर्ण समुदाय व देशजत्व, कोयापुनेमी व प्रकृति प्रधान है, व प्रकृति के सानिध्य मे फलता-फूलता है। आज की आवश्यकता इस बात की है कि देशज ज्ञान तंत्र के नये आयामों को ध्यान मे रखकर तदानुसार पाठ्यक्रम में बदलाव करते रहें।  देशज ज्ञान तंत्र का अध्ययन अनिवार्य किया जावे, ताकि देशजत्व का अस्तित्व बना रहे। वहीं नये-नये शोध कार्यों व कोयापुनेम के अध्ययन हेतु युवा पीढ़ी में उत्साह व जिज्ञासा पैदा करते रहना है व युवा पीढ़ी को जिज्ञासु भी होना चाहिए।

कोयापुनेम का अस्तित्व व अस्मिता को नयी उड़ान मिल सकेगी

देशज समुदाय व देशज ज्ञान तंत्र हेतु संपूर्ण विश्व में एक नये युग का प्रादुर्भाव हो रहा है, जहाँ अप्राकृतिक, अमर्यादित, व आडंबरों पर प्रश्न उठ रहे हैं। देशज समुदाय अब अपने सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक दार्शनिक धार्मिक व भाषिक सभी समस्याओं के निराकरण हेतु कोयतोड़ियन तकनीकी का प्रयोग कर नये-नये राह तलाश कर रही है व देशज ज्ञान तंत्र की नित नयी समझ विकसित कर रही है। यह भार आज युवाओं के कंधों में है जिससे देशज समुदाय की देशज ज्ञान तंत्र, कोयापुनेम का अस्तित्व व अस्मिता को नयी उड़ान मिल सकेगी।
आलेख- सम्मल सिंह मरकाम,
वनग्राम-जंगलीखेड़ा, गढ़ी, जिला बालाघाट म.प्र.

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