Friday, September 27, 2019

आदिवासियों का एकत्र होना ही बहुत बड़ी ताकत है, अधिकारों के संघर्ष के लिये आदिवासी महासंघ की है आवश्यकता

आदिवासियों का एकत्र होना ही बहुत बड़ी ताकत है, अधिकारों के संघर्ष के लिये आदिवासी महासंघ की है आवश्यकता 

गैर राजनैतिक आदिवासी समाज का महासंगठन बनाने का है प्रयास 

इसके बाद ही हमें याद आते है बाबा साहब, समाजिक संगठन और समाज के जनप्रतिनिधि 

भोपाल। गोंडवाना समय। 
आदिवासी महासंघ के गठन को लेकर हुई परिचर्चा में श्री कांतिलाल भूरिया, श्री अजय शाह, श्री मनमोहन शाह बट्टी, सेवानिवृत्त आईएएस श्री एस एस कुमरे, श्री गुलजार सिंह मरकाम, युवा विधायक डॉ हीरालाल अलावा सहित प्रदेश के आदिवासी समाज के प्रमुख जनप्रतिनिधि व समाजिक संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों की उपस्थिति में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में संपन्न हुई। जहां पर सभी ने एक स्वर में आदिवासी समुदाय की एकजुटता को आहवान किया।

सबका लक्ष्य है एक समान 

समस्त आदिवासी समाज का महासंघ बनाये जाने को लेकर आयोजित परिचर्चा में पूर्व विधायक श्री मनमोहन शाह बट्टी ने अपने संदेश में कहा कि देश हो हमारा अपना मध्य प्रदेश आदिवासी समाज के नाम पर चाहे राजनैतिक पार्टी हो, आदिवासी समाज का अधिकारी कर्मचारियों का संगठन हो, आदिवासी मातृशक्तियों का संगठन हो, आदिवासी युवाओं का संगठन हो, आदिवासी छात्रों का संगठन हो, हमको सबको एकत्र करते हुये एकता की ताकत बनाना होगा। पूर्व विधयक मनमोहन शाह बट्टी बने कहा कि आदिवासी समाज में तो हमारे जातिगत ही अलग अलग संगठन बने हुये है और सबका लक्ष्य एक समान है कि समाज को हक अधिकार मिले, विकास व प्रगति की ओर बढ़े।

वर्षों पहले जो मांगे थी वह आज भी है

उन्होंने आगे कहा कि मुझे कांतिलाल भूरिया जी सहित आदिवासी समाज के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों व समाजसेवको के साथ कार्य करने व सीखने का अवसर भी मिला है । वहीं उन्होंने कहा कि वर्षों से मैं देखते व सुनते आ रहा हू अभी भी देख रहा हूं कि आदिवासी मुख्यमंत्री की बात होती है, पांचवी व छटवी अनुसूची की बात होती है । पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी ने आगे कहा कि वर्षों पहले जो मांगे थी वह आज भी है उसमें कोई भी अंतर नहीं आया है। इसलिये हमें आदिवासी समाज का ताकतवर संगठन बनाना होगा जो आदिवासी महासंघ बने। जो हमारे समाज के जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों-कर्मचारियों की सुरक्षा कर सके, गैर राजनैतिक आदिवासी समाज का महासंगठन बनाने का प्रयास है। 

आदिवासी समाज का बजट होता है अन्य मदों पर व्यय 

आदिवासी समाज का महासंघ बनाने के लिये इसका उद्देश्य क्या हो, इस पर उन्होंने अपना संदेश दिया और कहा कि राज्य सरकार की गलत नीतियों और हमारे लिये जो कानून बने है उनका पालन हो रहा है क्या नहीं, राष्ट्रपति व राज्यपाल से मिलना है, आरक्षण का डाटा क्या है, शासकीय क्षेत्र में हमारा प्रतिशत कितना होना चाहिये, आरक्षण, आदिवासियों के लिये केंद्र व राज्य सरकार का बजट, कितना आया वह कहां खर्च हुआ, उन्होंने इस दौरान कहा कि आदिवासी समाज के विकास का बजट मेट्रो रेल में खर्च कर दिया गया है तो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी खर्च किया गया यह दुरूपयोग क्यों हो रहा है, आदिवासियों के लिये आरक्षण रोस्टर, न्यायालय में हमारे प्रकरण पर हम क्या करेंगे।

हमारे तरफ से कौन वकील खड़ा है, चर्चा नहीं करते है

सबसे अहम बात उन्होंने कहा कि जब माननीय न्यायालय से हमारे खिलाफ फैसला आता है तो उसके बाद हम सक्रिय होते है। चाहे वह वन  अधिकार अधिनियम का मामला हो या एट्रोसिटी का हो या आरक्षण के संबंध में निर्णय हुआ । इसके बाद ही हमें बाबा साहब, समाजिक संगठन, समाज के जनप्रतिनिधि याद आने लगता है, पहले हम क्यों तैयार नहीं होते है इस पर महासंघ को विशेष रूप से काम करना होगा। हम कानून के जानकारों से कभी चर्चा क्यों नहीं करते है कि हमारे तरफ से कौन वकील खड़ा है, चर्चा नहीं करते है।

हमेें भाषण नहीं देना है हमें कुछ करना है

उन्होंने आगे कहा कि जल, जंगल, जमीन की लड़ाई हमेशा से ही चलते आ रही थी लेकिन अब हम सबको मिलजुलकर एकता के साथ में लड़ना होगा । आदिवासी महासंघ में प्रत्येक क्षेत्र, समस्या, विषय का कोरम अलग होना चाहिये। वहीं पूर्व विधायक मनमोहन शाह बट्टी ने कहा हमेें भाषण नहीं देना है हमें कुछ करना है, हमे नेताओं में नहीं समाज में जाना है। इसके साथ ही उन्होंने आगामी समय में होने वाले 17 नवंबर को बड़ा कार्यक्रम के संबंध में चर्चा करने की बात कहा । 

तो ज्यादा अच्छे काम करने पर उन्हें कर दिया जाता है निलंबित 

हम हमारे आदिवासी समाज के विधायक, सांसद, मंत्री को काम नहीं कर रहे है यह प्रश्न उठाते है लेकिन हमने उसका क्या सपोर्ट किया इस संबंध में नहीं बताते है। आदिवासी समाज का विधायक, सांसद, मंत्री, जनप्रतिनिधि अच्छा काम करने लगता है तो सरकार उनके पीछे पड़ जाती है। इतना ही नहीं आदिवासी समाज के अधिकारी भी यदि अच्छे काम करते है तो ज्यादा अच्छे काम करने पर उन्हें निलंबित कर दिया जाता है या फंसा दिया जाता है। हमें आदिवासी समाज की जायज, वास्तविक अधिकारों की लड़ाई करने के लिये संघर्ष करने के लिये बड़े संगठन की आवश्यकता है और यह आदिवासी महासंघ के माध्यम से पूरा हो सकती है । 

आदिवासी संगठनों को एकजुटता के साथ संघर्ष करने की है आवश्यकता 

आदिवासी महासंघ के गठन पर हुई परिचर्चा में मनावर विधायक व जयस के राष्ट्रीय संरक्षण डॉ हीरालाल अलावा ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी महासंघ के गठन को लेकर परिचर्चा की पहल सराहनीय प्रयास है और आज आवश्यकता समस्त आदिवासी समुदाय व संगठनों को एकजुटता के साथ संघर्ष करने की है। 
आदिवासियों को जंगल से उजाड़ने का षडयंत्र, आरक्षण को समाप्त करने का षडयंत्र है, खनिज संसाधन को लूटने का षडयंत्र किया जा रहा है। इसलिये देश के समस्त आदिवासी समाज के संगठनों को मिलकर संघर्ष करने का समय है। देश में आज 5 ट्रिलियन अर्थशव्यव्था की बात जोर-शोर से की जा रही है। इस दौरान विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने एम्स में डॉक्टर के रूप में सेवा देने के दौरान चेतन भगत लेखक के द्वारा लिखे गये संदेश का भी उल्लेख किया ।

हमको हमारा अपना वकील तय करना होगा 

विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने कहा कि देश के लाखों आदिवासियों के लिये निर्णय के लिये 26 नवंबर की तारिख निर्धारित है। लगभग देश में 12 लाख आदिवासी परिवार और लगभग 1 करोड़ आदिवासियों को निर्णय का इंतजार है। आदिवासियों के खिलाफ में निर्णय के आने से पूजीपतियों को जंगल में छिपे हुये संपदा का उत्खनन करने आसानी से अवसर मिल जायेगा। इसलिये हमें 26 नवंबर के पहले आदिवासी समुदाय की ओर से देश के समस्त आदिवासी समाजिक संगठनों व जनप्रतिनिधियों को मिलकर हमको हमारा अपना वकील तय करना होगा । वहीं विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने कहा कि प्रत्येक राज्य सरकार तो अपनी ओर से वकील तय करेगी ये अलग बात है लेकिन हमें अपनी तरफ से अपना वकील रखना होगा। उन्होंने आगे कहा कि यदि जंगल से बाहर निकालने का आदेश अवैध अतिक्रमणकारी का निर्णय आ गया तो फिर हम कुछ नहीं कर पायेंगे। विधायक ने आगे यह भी कहा कि देश में अडानी, अंबानी, टाटा, बिरला की सरकारे है और हम राजनीति नहीं समझ पा रहे है। हम एक दूसरे को पीछे धकेलने में लगे हुये है और अपनो के ही पैर खींचने में लगे हुये है।

तो आदिवासी की पहचान अपने आप समाप्त हो जायेगी

विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने कहा कि देश में समान आचार संहिता कानून को लेकर भी चर्चा हो रही है जबकि आदिवासियों को अलग पहचान मिली है यदि ऐसा हुआ तो आदिवासी की पहचान अपने आप समाप्त हो जायेगी। आगे उन्होंने कहा कि पांचवी व छटवी व अनुसूचि अपने आप समाप्त हो जायेगा और हम जिस बात के लिये गर्व महसूस करते है कि हमारी संस्कृति है, हमारी भाषा है, हमारी रीति-रिवाज है, हमारी परंपरा है वह समाप्त हो जायेगी।

हमें मालिकाना अधिकार चाहिये, व्यक्तिगत नहीं हमें सामुहिक अधिकार चाहिये

विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने कहा कि आजादी के बाद से आदिवासियों की जमीन पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हुआ है। वहीं वनाधिकार कानून बना तो वर्ष 2006 में है लेकिन लागू होने और क्रियान्वयन आज भी किस तरह हो रहा है यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इस संबंध में विधायक हीरालाल अलावा ने दादा गुलजार सिंह मरकाम के द्वारा दिये गये उद्बोधन के संबंध में बताते हुये कहा कि उन्होंने अपने संदेश में यहां पर बताया कि वनाधिकार अधिकार पत्र को लेकर मध्य प्रदेश सरकार ने तो अवार्ड भी ले लिया लेकिन अधिकार भर बांटे, पट्टे भर बांटे है लेकिन हमें पट्टे नहीं हमें मालिकाना अधिकार चाहिये, व्यक्तिगत नहीं हमें सामुहिक अधिकार चाहिये। 

उधर वे अधिसूचित क्षेत्रों के हक अधिकार धीरे धीरे समाप्त करते गये

वन क्षेत्रों में पशुओं को बचाने के नाम पर अभ्यारण बनाये जा रहे है। अधिसूचित क्षेत्र की परिभाषा हम नहीं समझ पाये, हमारे स्वशासन की लड़ाई महामानव बिरसा मुण्डा, टंटया मामा सहित अन्य आदिवासी समाज के वीर योद्धाओं ने लड़ी लेकिन हम आरक्षण के पीछे ही भागते रहे उधर वे अधिसूचित क्षेत्रों के हक अधिकार धीरे धीरे समाप्त करते गये। अधिसूचित क्षेत्रों में नगर पालिका, नगर पंचायते आ गई, सामान्य कानून थोप दिया गया है। आदिवासी समाज को पांचवी और छटवी अनुसूची मिली तो इसके पीछे सिद्धु-कान्हू, बिरसा मुण्डा, टंटया मामा, चांद भैरव का आदोलन था लेकिन हम आरक्षण की पूंछ पकड़ कर रह गये।

पेशा कानून 1996 में बना लेकिन नियमावली आज तक नहीं बनी

विधायक डॉ हीरालाल अलावा ने कहा कि पेशा कानून 1996 में बना लेकिन नियमावली आज तक नहीं बनी, अब कौन लड़ेगा इसके लिये, कौन सरकार पर दबाव बनायेगा, चुनाव में किसी भी राजनैतिक दल में आदिवासियों के एजेंडे शािमल नहीं किये जाते है। नये अभ्याररण बन रहे है सभी अनुसूचित क्षेत्रों में, वन अधिकार अधिनियम के सामुहिक दावे मिल गये होते है तो ये सब नहीं होता। आदिवासियों की जमीनों के नीचे खनिज संपदा को लूटने के लिये षडयंत्र किया जा रहा है।

वन एप मित्र पर भी सवाल खड़े करना है,  

वन अधिकार के तहत माननीय सुप्रीम कोर्ट में 26 नवंबर को जो निर्णय आने वाला है उसमें मध्य प्रदेश के लगभग ढाई लाख परिवार भी शामिल है । वहीं उन्होंने कहा कि हमें वन एप मित्र पर भी सवाल खड़े करना है। वन अधिकार कानून में वन मित्र एप की कोई परिभाषा नहीं है, वन अधिकार कानून जिस नियम कानून के तहत बना है उस आधार पर उसका क्रियान्वयन होना चाहिये । वहीं वन एम मित्र योजना को बनाने वाले अधिकारियों पर सवाल खड़े करते हुये कहा कि वन मित्र एप के बारे में सरकार ने किसी भी आदिवासी सामाजिक संगठन के पदाधिकारियों या आदिवासी समाज के जनप्रतिनिधियों से नहीं पूछा है। इसे अपनी मर्जी से आईएएस अधिकारियों ने बना लिया है, यह सही नहीं है।

अपने अपने संगठन में रहे लेकिन आदिवासियों के मुद्दों पर एक साथ रहे 

विधायक ने कहा कि देश हो या प्रदेश हो आदिवासी समाज के प्रत्येक संगठन अपने अपने संगठन में रहे इससे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब भी आदिवासी समाज के वास्तविक व महत्वपूर्ण मुद्दों की बात आये तो संघर्ष व लड़ाई लड़ने के लिये और अपने हक अधिकारों की लड़ाई हो तो समस्त आदिवासी समाज के संगठनों के पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को मिलजुलकर एक मंच पर आने की आवश्यकता है क्योंकि आदिवासियों का एकत्र होना ही बहुत बड़ी ताकत है। मध्य प्रदेश में समस्त आदिवासी समाज के समस्त संगठनों को एक करते हुये महासंघ बनाने का प्रयास बेहद जरूरी है।

No comments:

Post a Comment

Translate