Thursday, January 30, 2020

मूकनायक क्यों नहीं बन पाया भारत का प्रमुख समाचार पत्र

मूकनायक क्यों नहीं बन पाया भारत का प्रमुख समाचार पत्र

31 जनवरी 1920 को प्रथम प्रकाशन मूकनायक के 31 जनवरी 2020 को होंगे 100 वर्ष 

जब तक प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया में समस्त वर्गों की समान भागीदारी नहीं होगी, समाचारों के माध्यम से सूचना का एकपक्षीय, आग्रहपूर्ण और असंतुलित प्रसार जारी रहेगा। इस असंतुलित प्रसार के प्रतिरोध में ही बाबा साहेब आंबेडकर जी ने शोषित पीड़ित वर्गों के अपने खुद के प्रकाशन केंद्र या मीडिया की आवश्यकता को अनिवार्य बताया था। वे मानते थे कि शोषित-पीड़ितों के साथ होने वाले अन्याय-अत्याचार के खिलाफ पत्रकारिता ही संघर्ष कर सकती है। मूकनायक डॉ भीमराव बाबा साहेब आम्बेडकर जी द्वारा स्थापित पहला मराठी पाक्षिक पत्र था। इसका प्रकाशन 31 जनवरी, 1920 को हुआ। मूकनायक यानी मूक लोगों का नायक। यह सभी प्रकार से मूक-पीड़ितों की ही आवाज थी, जिसमें उनकी पीड़ाएं बोलती थीं। इस पत्र ने शोषित वर्गों में एक नयी चेतना का संचार किया तथा उन्हें अपने अधिकारों के लिए जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। इस समाचार पत्र के शीर्षभाग पर संत तुकाराम के वचन थे। यह पत्र शोषित व पीड़ित वर्गों में में एक चेतना की लहर दौड़ाने के अपने उद्देश्य में कामयाब रहा था। मूकनायक की आरंभिक दर्जन भर संपादकीय टिप्पणियां बाबा साहब आम्बेडकर जी ने स्वयं लिखी थी। संपादकीय टिप्पणियों को मिलाकर बाबा साहेब आम्बेडकर जी के कुल 40 लेख मूकनायक में प्रकाशित हुये। मूकनायक का आर्थिक अभावों के चलते इसका प्रकाशन अप्रैल 1923 में बंद हो गया। उसके चार साल बाद 3 अप्रैल 1927 को बाबा साहेब आम्बेडकर जी ने दूसरा मराठी पाक्षिक बहिष्कृत भारत निकाला। 
विशेष संपादकीय 
संपादक विवेक डेहरिया 
डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर जी ने 31 जनवरी, 1920 को मूकनायक नामक पत्रिका को शुरू किया था । इस पत्रिका के अग्रलेखों में अंबेडकर जी ने तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को निर्भीकता से उजागर किया। यह पत्रिका उन मूक लोगों की आवाज बनकर उभरी जो सदियों से अन्याय और शोषण चुपचाप 
सहन कर रहे थे। हालांकि इस पत्रिका के प्रकाशन में शाहू जी महाराज ने भी सहयोग किया था, यह पत्रिका महाराज के राज्य में कोल्हापुर में ही प्रकाशित होती थी। चूंकि महाराज अंबेडकर की विद्वता से परिचित थे जिस वजह से वो उनसे विशेष स्नेह भी रखते थे। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जी का मानना था कि शोषित-पीड़ितों को जागरूक बनाने और उन्हें संगठित करने के लिए उनका अपना स्वयं का मीडिया अति आवश्यक है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 31 जनवरी 1920 को मराठी पाक्षिक मूकनायक का प्रकाशन प्रारंभ किया था। मूकनायक यानी मूक लोगों का नायक। मूकनायक के प्रवेशांक की संपादकीय में आंबेडकर ने इसके प्रकाशन के औचित्य के बारे में लिखा था, बहिष्कृत लोगों पर हो रहे और भविष्य में होने वाले अन्याय के उपाय सोचकर उनकी भावी उन्नति व उनके मार्ग के सच्चे स्वरूप की चर्चा करने के लिए वर्तमान पत्रों में जगह नहीं। 

अंबेडकर जी द्वारा लिखी गई संपादकीय आज भी दिखा रहा आईना 

स्वयं आंबेडकर द्वारा लिखी मूकनायक के 14 अगस्त 1920 के अंक की संपादकीय में जाति में बंटे भारतीय समाज को आईना दिखाने में आज भी सक्षम है। केवल मीडिया ही नहीं, सभी क्षेत्रों में शोषित-पीड़ितों-निर्धन वर्गों के योग्य व्यक्तियों की हिस्सेदारी सुनिश्चित किए जाने के प्रबल पक्षधर थे। बाबा साहेब आंबेडकर जी 28 फरवरी 1920 को प्रकाशित मूकनायक के तीसरे अंक में बाबा साहेब आंबेडकर जी ने यह स्वराज्य नहीं, हमारे ऊपर राज्य है, शीर्षक संपादकीय में साफ-साफ कहा था कि स्वराज्य मिले तो उसमें शोषित-पीड़ित वर्गों का भी हिस्सा हो। स्वराज्य पर बाबा साहेब आंबेडकर जी का चिंतन लंबे समय तक चला। मूकनायक की आरंभिक दर्जन भर संपादकीय टिप्पणियां बाबा साहेब आंबेडकर जी ने स्वयं लिखी थी। संपादकीय टिप्पणियों को मिलाकर बाबा साहेब आंबेडकर जी के कुल 40 लेख मूकनायक में प्रकाशित हुये जिनमें मुख्यत: जातिगत गैर बराबरी के खिलाफ आवाज बुलंद की गई है। वहीं मूकनायक आर्थिक अभाव के कारण उसका प्रकाशन अप्रैल 1923 में बंद हो गया। उसके चार साल बाद 3 अप्रैल 1927 को आंबेडकर ने दूसरा मराठी पाक्षिक बहिष्कृत भारत निकाला। वह 1929 तक निकलता रहा। बाबा साहेब अंबेडकर जी ने उस समय कहा था कि आज की स्थिति पथरीली बंजर जैसी स्थिति में है। इसमें कोई भी अंकुर नहीं फूटेगा इसलिए मन को सुसंस्कृत करने के लिए पठन-पाठन शैक्षणिक आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाना चाहिये। बाबा साहेब आंबेडकर जी ने आरक्षण का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया था ताकि इन वर्गों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। 20 मई 1927 को प्रकाशित बहिष्कृत भारत के चौथे अंक की संपादकीय में बाबा साहेब ने जो लिखा उसके मुताबिक पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए सरकारी नौकरियों में उसे प्रथम स्थान मिलना चाहिए। 

क्या सीख देती है बाबा साहेब आंबेडकर जी की पत्रकारिता 

बहिष्कृत भारत के बाद 1928 में बाबा साहेब अंबेडकर जी ने समाज में समता लाने के उद्देश्य से समता नामक पाक्षिक पत्र निकाला। बाद में उसका नाम जनता कर दिया गया और अंतत: 1954 में पाक्षिक समता का नाम बदलकर प्रबुद्ध भारत कर दिया गया। प्रबुद्ध भारत आरंभ से आखिर तक साप्ताहिक रहा। हर अंक में पत्रिका के शीर्ष की दूसरी पंक्ति में लिखा होता था-डा. आंबेडकर द्वारा प्रस्थापित। साप्ताहिक शब्द के नीचे बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि छपा रहता था। मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता और प्रबुद्ध भारत में प्रकाशित आंबेडकर की तलस्पर्शी संपादकीय टिप्पणियां भारत की समाज व्यवस्था से कलम का संघर्ष के रूप में देखी जानी चाहिए। बाबा साहेब आंबेडकर जी किसी विषय पर तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह नहीं लिखते थे, अपितु हर बहस में हस्तक्षेप करते हुए यथास्थिति बदलने का प्रयास करते थे। बाबा साहेब आंबेडकर जी की पत्रकारिता हमें यही सिखाती है कि जाति, वर्ण, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग आदि शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रति समाज को आगाह कर उसे इन सारे पूर्वाग्रहों और मनोग्रंथियों से मुक्त करने की कोशिश ईमानदारी से की जानी चाहिए। शोषित पीड़ित मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास भी किया जाना चाहिए। 

सही कहा था, मुझे मेरे समाज के बुद्धिजीवि ही धोखा देंगे

अब हम बात करें बाबा साहेब अंबेडकर जी के संविधान-सिद्धांतों पर चलने वाले संगठनों की या उनके द्वारा संविधान में प्रदत्त आरक्षण के आधार पर सरकारी सेवा, जनसेवा कहें या सत्ता सेवा या अन्य क्षेत्रों में लाभ लेने वाले संविधान व सिद्धांतों के ज्ञाता व बुद्धिमानों की तो उन्होंने लाभ पहले भी लिया और आज भी ले रहे है लेकिन यदि प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में ही बाबा साहेब अंबेडकर जी के द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र मूकनायक हो या अन्य समाचार पत्र भारत में प्रमुख स्थान नहीं बना पाया या हम कहें कि वह गुमनामी के दौर में गुम हो गया है। जबकि भारत में आज अनेक समाचार पत्र ऐसे है जो भारत में अपना वजूद बनाये हुये है प्रमुख समाचार पत्रों का प्रकाशन भारत की क्षेत्रिय भाषाओं के आधार पर प्रकाशित हो रहे है जिनकी पाठकों की संख्या करोड़ों में है लेकिन आरक्षण का लाभ लेने वाले हजारों की संख्या में सामाजिक संगठन और राजनैतिक सत्ता कुर्सी का सुख भोगने वाले बुद्धिमानों के रहते हुये समाचार पत्रों के रूप में मूकनायक भारत का नायक नहीं बन पाया क्योंकि बाबा साहेब अंबेडकर जी ने सही ही कहा था कि मुझे मेरे समाज के बुद्धिजीवि ही धोखा देंगे। 
विशेष संपादकीय 
संपादक विवेक डेहरिया 
9303842292


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