Sunday, February 9, 2020

भुमकाल आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिलाकर सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में स्वतन्त्रता आंदोलन की जगाया अलख

भुमकाल आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिलाकर सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में स्वतन्त्रता आंदोलन की जगाया अलख 

भुमकाल आंदोलन के कारण ही अंग्रेजों को आरक्षित वन प्रस्ताव रद्द करना पड़ा

बस्तर के भुमकाल आंदोलन के जननायक वीर शहीद गुंडाधुर-डॉ सूर्या बाली ''सूरज'' धुर्वे

कोयापुनेमी संस्कृति से मानव को उसके प्रकृति के साथ समंजस्य रख कर जीवन जीने की सीख मिलती है। पूरा जनजातीय कोइतूर समाज इसी कोयापुनेमी संस्कृति का अनुपालन आज तक करते हुए अपना जीवन यापन कर रहा है। मानव जीवन प्रकृति से जन्म लेता है और प्रकृति से भरण पोषण प्राप्त करता है और अंत में प्रकृति में ही विलीन हो जाता है। इसलिए समस्त कोइतूर समाज प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता है और उसे अपना ईष्ट मानकर उसकी सुरक्षा करता है। उसी परंपरा को आज भी बहुत सी कोइतूर जन जातियाँ पालन करते हुए जल, जंगल और जमीन की लड़ाइयाँ लड़ती रही हैं।

विशेष संपादकीय 
डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे, 
अंतर्राष्ट्रीय कोया पुनेमी चिंतनकार,
समाज सेवी 
अपने जल जंगल और जमीन की सुरक्षा और अधिकार के लिए ये कोइतूर जनजातियाँ बाहरी आक्रमणकारियों के सामने सीना तानकर खड़ी हो जाती थीं और अपनी प्रकृति की सुरक्षा करती थी क्यूंकि इनका जीवन इसी प्रकृति पर आश्रित होता था। आप किसी भी जनजातीय आंदोलन को देख लें उन सभी की जड़ में यही जल जंगल और जमीन की लड़ाई ही मिलेगी। सदियों से जन जातीय समुदाय अपने जीवन यापन के लिए जंगलों पर ही आश्रित रहा है और अंग्रेजों के आगमन से बस्तर में जंगलों पर नियंत्रण को लेकर खींचतान शुरू हो गयी थी। अंग्रेजों ने आम जनजातीय लोगों को उनके जंगल के अधिकार को सीमित कर दिया था। जंगल में शिकार करना, जंगली उत्पाद को इकट्ठा करना और जंगल काटकर खेती, महुए की शराब बनाना इत्यादि करने पर पाबंदी लगा दिया था। जिससे कोइतूर लोगों को जीवन यापन करना मुश्किल होने लगा था और उसी समय अकाल पड़ने के कारण यह स्थिति और भी कठिन हो गयी। जंगलों से बिस्थापन किए जाने के कारण सभी जन जातियाँ आंदोलित हो गयी थीं। ऐसे में मरता क्या न करता वाली कहावत चरितार्थ हो गयी। 

इसे ही भूमकाल आंदोलन का नाम दिया गया

पूरब में असम से लेकर पश्चिम में गुजरात तक पूरे जनजातीय क्षेत्रों में कोइतूर जन जातियों ने कई आंदोलन किए और अपने जल जंगल जमीन की लड़ाइयाँ लड़ीं। एक ऐसा ही आंदोलन बस्तर का भूमकाल आंदोलन था जिसके सबसे मुखर और क्रांतिकारी नायक थे वीर गुंडाधुर। सभी कोइतूर जन जातियों ने हथियार उठा लिए और अपने अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी हो गयी और इसी समय राजा और अंग्रेज के खिलाफ गुण्डाधुर ने मोर्चा खोल दिया। उन्होने अलग-अलग जनजातियों से नेता चुने और उन्हे प्रशिक्षित किया और एक संगठन के रूप में खड़ा किया। इससे पूरे बस्तर के कोइतूर एक साथ हो गए और अंग्रेजों के सामने एक दीवार के रूप में खड़े हो गए। इसे ही भूमकाल आंदोलन का नाम दिया गया इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में डेब्रिधुर, सोनू माझी, मुंडी कलार, मुसमी हड़मा, धानु धाकड़, बुधरु और बुटुल थे जो गुण्डाधुर के विश्वसनीय थे। इन्होंने गांव-गांव जा कर लोगो को संगठित किया (दहरे, 2018)। 

आम की टहनी पर लाल मिर्च को बांधकर देते बगावत का संदेश 

गुंडाधुर ने अंग्रेजों से विरोध का बड़ा नायाब तरीका अपनाया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था उसे डारा-मिरी कहा गया। वे लोगों को डारा-मिरी का उपयोग करके अंग्रेजों का विरोध करने का संदेश देते थे, जिसमें आम की टहनी पर लाल मिर्च को बांध दिया जाता था और वह दारा मिरी एक जगह से दूसरे जगह बगावत के संदेश के रूप में भेजी जाती थी। गुंडाधुर का जन्म एक गरीब कोइतूर परिवार में हुआ था जो धुरवा जन जाति के अंतर्गत आती है। इनके माता पिता भी जंगलों पर आधारित फसलों और उत्पादों पर आश्रित थे। इनके गाँव का नाम नेतनार था जो बस्तर संभाग के अंतर्गत आता था। गुंडाधुर का बचपन का वास्तविक नाम बागा धुरवा था(मंगल कुंजाम, 2018)। नेतनार गाँव के  इस जोशीले बागा धुरवा को क्रांति के लिए तैयार करने का श्रेय बस्तर  के राजा कालेन्द्र सिंह  को जाता है जिंहोने भुमकाल आंदोलन की पटकथा लिखी थी और वीर गुंडाधुर उसी पटकथा के नायक के रूप में उभरे(संकेत दहरे, 2018) । 1910 के विप्लव या भूमकाल आंदोलन के नायक गुंडाधुर को इंद्रावती नदी तट पर कमान सौंपी गई। उन्होने बस्तर की सभी जन जातियों को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध आंदोलन करने के लिए संगठित किया। गुंडाधुर के द्वारा शुरू किया गया मिर्ची आंदोलन काफी प्रशिद्ध हुआ था। खिलाफत के गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान के लिए आम की टहनी से लाल मिर्च बांध कर भेजा जाता था(दैनिक भास्कर समाचार, 2015)।

राजे महाराजे उन अंग्रेजों के अधीन रहकर जनता का शोषण कर रहे थे

इस भुमकाल के नायक गुंडाधुर को जानने से पहले हमें इस भुमकाल आंदोलन के जनक राजा कालेन्द्र सिंह के बारे में जानना होगा तभी भुमकाल आंदोलन को समझा जा सकेगा । भुमकाल आंदोलन केवल बस्तर के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई नहीं थी बल्कि एक ऐसा विद्रोह था जिसने ब्रिटिश सरकार की जड़ें हिला दी थीं और यही लड़ाई सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में स्वतन्त्रता आंदोलन की नई अलख जगा दी थी। बीसवीं सदी के आरंभ में मध्य भारत में अंग्रेज अपना पाँव पसार चुके थे और सभी राजे महाराजे उन अंग्रेजों के अधीन रहकर जनता का शोषण कर रहे थे। वर्ष (1908) में काकतीय वंश के राजा रूद्रप्रतापदेव बस्तर के राजा थे, जो राजा भैरम देव के पुत्र थे। बस्तर का  शासन भले ही राजा के हाथ में था लेकिन अंग्रेजों ने अपने पिट्ठू दीवान बैजनाथ पंडा के द्वारा बस्तर राज्य की सारी प्रशासनिक शक्तियाँ अपने पास केंद्रित कर रखी थीं। धीरे-धीरे दीवान ने जंगल के संसाधनों का गलत तरीके से दोहन करना शुरू कर दिया और जनजातियों के जंगल अधिकारों को सीमित कर दिया। 

आम जनता के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे

राजा कालेन्द्र सिंह, राजा रुद्र प्रताप सिंह के सगे चाचा और राजा भैरम देव के छोटे भाई थे । राज्य में अपनी सीमित भूमिका देखते हुए उन्होने राजा के खिलाफ बगावत की  नींव रखी जिसमें राजा रुद्र प्रताप की सौतेली माँ सुवर्णा कुँवर ने भी साथ दिया। वर्ष 1909 में इंद्रावती नदी के किनारे जंगल में इन दोनों ने बागा धुरवा नामक युवक द्वारा स्थानीय जनजातियों को सशस्त्र आंदोलन के लिए इकट्ठा किया। इस सभा में लगभग सभी कोइतूर जनजतियों के नेता अपने साथ अपने पारंपरिक अस्त्र शस्त्र लेकर आए हुए थे। इस आंदोलन का नेतृत्व  बीर बागा धुरवा ने किया था । बस्तर में कोइतूर जन जातियों ने अपने जल जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए बस्तर के राजा और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर दिया था । लगभग तीन माह लंबे चले इस आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिला कर रख दी थी और बस्तर के राजा के नाक में दम कर रखा था। इस आंदोलन के नायक गुंडाधुर नें अंग्रेजों के साथ साथ स्थानीय राजा, सेठ साहूकार, सूदखोरों और बाहरी लोगों के खिलाफ बगावती तेवर अपना लिए थे और आम जनता के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। 

इस आंदोलन के बाद ही बागा धुरवा को अंग्रेज मेजर जर्नल ने गुंडाधुर नाम दिया

भुमकाल आंदोलन विद्रोह का पहला बड़ा हमला 2 फरवरी 1910 को बस्तर के पुसवाल बाजार पर हुआ जहां बाहरी व्यापारियों की जमकर पिटाई हुई। उसके तीन दिन बाद ही यानि 5 फरवरी को पूरा बाजार ही लूट कर आम जनता में बँटवा दिया गया (दहरे, 2018)  जिसके कारण सेठ साहूकारों सहित अंग्रेजों में भी दहशत फैल गयी। ब्रिटिश सरकार द्वारा वीर बागा धुरवा और स्थानीय जनजातीय नेताओं के दमन के लिए मेजर जनरल गियर के नेतृत्व में 500 अंग्रेज सैनिकों को बस्तर भेजा गया। जन जातियों और अंग्रेज सैनिकों के बीच में भयंकर संघर्ष हुआ, जिसमें 5 लोगों की जाने गईं लेकिन भुमकाल आंदोलन से जुड़े लोगों का जोश और जज्बा बिलकुल कम नहीं हुआ (शुभम थवइत, 2017)। इस आंदोलन के बाद ही बागा धुरवा को अंग्रेज मेजर जर्नल ने गुंडाधुर नाम दिया और उसके बाद से बागा धुरवा गुंडाधुर के नाम से विश्व विख्यात हो गया। 

आए दिन अंग्रेजों के प्रतिष्ठानों और उनके समर्थको पर हमले करने लगे

कुछ दिनों के उपरांत ही मेजर जनरल गियर का सामना एक बार फिर से गुंडाधर और उनके साथियों से हुआ। इस खूनी संघर्ष में सैकड़ों जनजातियों की जाने गईं लेकिन गुंडाधुर अपनी बहादुरी से अंग्रेज जनरल को घेरने में सफल हुए और मेजर जर्नल गियर को समर्पण करने पर मजबूर कर दिया। कुछ दिनों बाद एक बार फिर 22 फरवरी को गुंडाधुर ने अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन किया और मार्च निकाला जिसमें गुंडाधुर के 15 मुख्य क्रांतिकारी नेता गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन गुंडाधुर एक बार पुन: बच निकालने में सफल हुए। गुंडाधुर का विश्वास जीतने और उन्हे काबू करने के लिए अंग्रेज जनरल गियर नें एक सार्वजनिक घोषणा किया कि अब बस्तर की जनजातियों पर कोई अत्याचार नहीं होगा और उनको उनके अधिकार मिलेंगे लेकिन ये सब छलावा और धोखा निकला। इससे गुंडाधुर और उनके साथी और भी उग्र हो गए और आए दिन अंग्रेजों के प्रतिष्ठानों और उनके समर्थको पर हमले करने लगे। इस तरह दो महीने के अंदर ही गुंडाधुर और उनके साथियों ने अंग्रेजों पर 2 दर्जन से ज्यादा हमले किया और अंग्रेजी सेना का काफी नुकसान किया। अंग्रेजी सेना के अधिकारी मेजर जनरल गियर को छुपकर भागना पड़ा और किसी तरह अपनी जान बचानी पड़ी।  राजा, अंग्रेज, दीवान और अंग्रेजी सैनिक गुण्डाधुर के नाम से कांपने लगे और इस तरह से मध्य भारत में किसी जनजातीय नेता ने पहली बार अंग्रेजों की रणनीतियों को तार-तार किया था और उन्हे पीछे खदेड़ कर बस्तर पर अपना परचम लहराया था (दहरे, 2018)। 

लाख कोशिशों के बाद भी  गुंडा धुर कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये

ब्रिटिश शासन को इस आंदोलन को काबू करने में तीन महीने का समय लगा। लाख कोशिशों के बाद भी  गुंडा धुर कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। भुमकाल आंदोलन के कारण ही अंग्रेजों को आरक्षित वन प्रस्ताव रद्द करना पड़ा और बाद में उसके प्रस्तावित क्षेत्र को घटा कर आधा करना पड़ा। अंग्रेजों पर हो रहे लगातार हमलों और आम लोगों से मिलने वाले जन समर्थन ने गुंडाधुर को काफी चर्चित कर दिया था। 24 मार्च 2010 को इंद्रावती नदी के किनारे जंगल में उन्होने अपने समर्थको को बुलाया और आगे की रणनीति बनाने के लिए एक आम सभा की घोषणा की । इस सभा की सूचना किसी ने अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंचा दिया (शुक्ल, 1991)। 

एक पुराने नीम के पेड़ से लटकलर फांसी की सजा दी गयी

अंग्रेजी हुकुमत इस बार गुंडाधुर और उनके क्रांतिकारी साथियों को दबोचने का मौका नहीं छोड़ना चाहते थी, इसलिए उन्होने उनके बीच में किसी गद्दार को ढूँढना  शुरू किया और उसे धन और पद का लाच देकर अपने पाले में मिला लिया। जैसा कि जनजातियों के साथ शुरू से ही होता आया  है कि उनके अपने बीच के लोगों के कारण ही उन्हे मुंह की खानी पड़ती है और इस बार भी कमोवेश वैसा ही हुआ । गुंडाधुर के टीम का एक सामान्य सदस्य  सोनू मांझी ने अंग्रेजों का साथ दिया। सोनू मांझी ने अंग्रेजों के कहने पर गुंडाधुर की आम सभा में जनजातियों को खूब मदिरा पिलाई जिससे सभी लोग नशे में हो गए । इस मौके का फायदा उठाते हुए अंग्रेजी सेना ने धावा बोल दिया और गुंडाधुर के कई विश्वस्त साथियों और सलाहकारों को कैदी बना लिया लेकिन इस बार भी वीर गुंडाधुर अपने साथ ढिबरी धुर के साथ बच निकलने में सफल रहे। इस हमले में कैद किए गए कोइतूरों को जगदलपुर के गोल बाजार में स्थित एक पुराने नीम के पेड़ से लटकलर फांसी की सजा दी गयी(शुभम थवइत, 2017) ।  

नंदिनी सुंदर ने ''गुंडा धुर की तलाश में'' एक किताब प्रकाशित किया 

बस्तर के इस कोइतूर वीर नायक पर नंदिनी सुंदर ने ''गुंडा धुर की तलाश में'' एक सुंदर शोधपूर्ण किताब पेंग्विन बुक्स इंडिया द्वारा प्रकाशित किया है। जिसमें वे बताती है कि जब वे गुंडा धुर के बारे में पूछते गाँव-गाँव घूम रही थीं तब उन्हें उनके सवालों के बहुत कम जवाब मिले। वे आगे कहती हैं कि लगता है सरकार के जनजातीय विभाग ने इस महान नायक के बारे में अपने नागरिकों को कोई जानकारी नहीं दी है। वे गुंडा शब्द पर भी अपनी राय देते हुए लिखती हैं कि भारत के कोशकारों ने भी अंग्रेजों की तरह ही गुंडा का अर्थ बदमाश के रूप में प्रयोग किया है। अब भारतीय कोशकारों की जिम्मेदारी है कि अंग्रेजों द्वारा प्रयुक्त बदमाश के अर्थ में गुंडा शब्द को डिक्शनरी से बाहर करके, वीर स्वतंत्रता सेनानी के अर्थ में उसे प्रचलित करें। बदमाश के अर्थ में गुंडा शब्द एक कोइतूर स्वतंत्रता सेनानी का अपमान है(नंदनी सुंदर, 2009)।

बस्तर की धरती आज भी अपने इस वीर पुत्र का कर रही इंतजार 

अलनार की इस लड़ाई के दौरान ही जनजातियों  ने अपने जननायक गुंडाधूर को युद्ध क्षेत्र से हटा दिया, जिससे वह जीवित रह सके और भविष्य में पुन: विद्रोह का संगठन कर सके। ऐतिहासिक सबूत मिलते हैं कि 1912 के आसपास फिर लोगों को सांकेतिक भाषा में संघर्ष के लिए तैयार करने की कोशिश की गई थी। वर्ष 1910 के इस भुमकाल आंदोलन के बाद गुण्डाधुर न तो मारे गए न ही पकड़े गए, अंग्रेजी फाइल यह कह कर बंद कर दी गयी कि कोई बताने में समर्थ नही है कि गुंडाघुर कौंन और कहां है। बस्तर की धरती आज भी अपने इस वीर पुत्र का इंतजार कर रही है और उसकी वीरता के किस्से आने वाली पीढ़ियों को सुना रही है (शुभम  तिवारी, 2019)। 
कुछ के अनुसार पुचल परजा और कुछ के अनुसार कालेन्द्र सिंह ही गुंडाधुर थे। बस्तर का यह जननायक अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण इतिहास में सदैव महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता रहेगा।  छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में गुंडाधुर के नाम पर शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र खोला जा चुका है वहीं खेलों के लिए गुंडाधुर के नाम का पुरस्कार जहां राज्य सरकार ने घोषित किया है वहीं नगर निगम ने नगर में गुंडाधुर पार्क बनवाया है। जगदलपुर सहित छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों में धुरवा समाज द्वारा हर साल फरवरी में भूमकाल दिवस भी मनाया जाने लगा है(दैनिक भास्कर, 2013)। गुंडाधुर की बहादुरी के किस्से आज भी कोइतूर पटाओं और लोक संस्कृति में सुनने को मिलते हैं(मंगल कुंजाम, 2018)। आज भी छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों और गुंडाधुर के बीच हुए युद्ध को भतरानाट के मध्य से प्रस्तुत किया जाता है जिसे लोग बड़े गर्व से देखते हैं(नई दुनिया, 2014)। चाहे जो भी हो भुमकाल आंदोलन के इस महा नायक को आज के दिन हम अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं और उनकी वीरता और शौर्य के लिए नमन करते हैं। 10 फरवरी 2020 को,  भुमकाल आंदोलन का 110 वें  स्मारक दिवस पर हम गुंडाधुर को स्वतंत्रता आंदोलन में दिये गए योगदान के लिए याद करते हुए सेवा जोहार करते हैं।

विशेष संपादकीय 
डॉ सूर्या बाली सूरज धुर्वे, 
अंतर्राष्ट्रीय कोया पुनेमी चिंतनकार,
समाज सेवी

1 comment:

  1. वीर गुंडाधूर को शत -शत नमन

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