Monday, April 20, 2020

पारंपरिक ग्रामसभा और गांव बनाना का नियम इतना सख्त की कोई भी लॉकडाउन नहीं तोड़ सकता

पारंपरिक ग्रामसभा और गांव बनाना का नियम इतना सख्त की कोई भी लॉकडाउन नहीं तोड़ सकता

लेखक-
आर एन ध्रुव
प्रांताध्यक्ष, अजजा शासकीय सेवक विकास संघ
छत्तीसगढ़
जनजाति बाहुल्य गांव में कोई अनिष्ट या कोई महामारी आ जाए तो पारंपरिक ग्राम सभा के माध्यम से तत्काल उस गांव को लाकडाउन कर दिया जाता था और भी किया जाता है। जिसे बोलचाल की भाषा में गांव
बनाना कहते हैं। पूरे विश्व में कोरोना वायरस के संक्रमण ने यह सिखा दिया की हमें पुन: ग्रामीण व्यवस्था की ओर वापस आने की जरूरत है। आज पूरी दुनिया के विकसित महानगरों एवं बड़े-बड़े शहरों में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए लाकडाउन कराने में शासन -प्रशासन को पूरी ताकत लगाना पड़ रहा है।

मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ को गांवों का प्रदेश बताया 

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा प्रदेश की जनता को संबोधन में गांवों का उल्लेख करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है और ग्रामीण स्व-स्फूर्त अपने  दिनचर्या के कार्यों को छोड़कर लाकडाउन एवं फिजिकल डिस्टेंस का पालन करते हुए अनुशासित ढंग से साफ सफाई का विशेष ध्यान रखे हैं। जिसके कारण छत्तीसगढ़ में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में हम सफल हुए। इतने लंबे अवधि तक लाकडाउन में मुख्यमंत्री का भाषण ग्रामीणों के हौसले को संबल प्रदान करता है।

पारंपरिक ग्राम सभा के माध्यम से तत्काल उस गांव को लाक डाउन कर दिया जाता है

गांव के लिए लाकडाउन कोई नया नहीं है एवं गांव में अनुशासन अचानक एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि ग्रामीण इसके लिए पहले से ही तैयार थे। वास्तव में गांव की जो व्यवस्था है। वह इस तरह की महामारी आने पर उसका मुकाबला करने में सक्षम है। ग्रामीण व्यवस्था खासतौर से जनजाति बाहुल्य ग्राम व्यवस्था को जानने वाले लोग यह बात को अच्छी तरीके से जानते हैं कि जब भी गांव में कोई अनिष्ट या कोई महामारी आ जाए तो पारंपरिक ग्राम सभा के माध्यम से तत्काल उस गांव को लाक डाउन कर दिया जाता है। जिसे बोलचाल की भाषा में गांव बनाना कहते हैं। ना जाने कितने वर्षों से यह व्यवस्था गांव में चली आ रही है।

पारंपरिक ग्राम सभा का नियम है सख्त 

पारंपरिक ग्राम सभा का नियम इतना सख्त है कि गांव में बंद का मतलब गांव का एक भी व्यक्ति गांव से बाहर नहीं जाएगा और न हीं कोई गांव में आएगा। इस हेतु गांव में एक दिन पहले मुनादी कर दी जाती है। घरों के अत्यावश्यक  सेवा कार्य जैसे पीने का पानी  एक दिन पहले संग्रह करके रख लेते हैं। आप जंगलों/ गांव के खेतों की मेड़ पर नहीं जा सकते । यहां तक कि गांव में यदि कोई पालतू मवेशी बीमार हो  रहा है, मर रहे हैं तो भी गांव को बनाने के लिए लॉक डाउन हो जाता है।

प्राचीन पेड़ खत्म हो गया या पेड़ सूख रहा है तब भी ग्रामीण चिंतित हो जाते हैं

जनजातियों को पर्यावरण से इतना लगाव की गांव का कोई प्राचीन पेड़ खत्म हो गया या पेड़ सूख रहा है तब भी ग्रामीण चिंतित हो जाते हैं। कानाफूसी शुरू हो जाता है। आज लाकडाउन का पालन कराने के लिए शासन प्रशासन जो कार्य कर रही है। वह कार्य वर्षों से गांव में भी बड़ी सख्ती से होता है। यदि कहीं कोई धोखे से भी गांव का नियम तोड़ने का प्रयास किया गया तो पारंपरिक ग्राम सभा तत्काल उनके खिलाफ कार्रवाई करती है। यही कारण है कि आज शासन- प्रशासन के आह्वान पर जो लाकडाउन पूरे देश में हुआ, उसमें गांव वाले स्व-स्फूर्त  सभी काम छोड़कर इसका हिस्सा बने।

शहरी कल्चर के कारण अनुशासन की कमी है

वहीं यदि हम दूसरी तरफ महानगरों एवं बड़े-बड़े शहरों की बात करें तो उसमें शहरी कल्चर के कारण अनुशासन की कमी है। शहरों में कभी-कभार किसी मुद्दे को लेकर कोई राजनीतिक पार्टी या कोई सामाजिक संगठन द्वारा  शहर बंद, छत्तीसगढ़ बंद या भारत बंद करती है। जिसमें अनुशासन के कोई मायने नहीं रखते हैं।  इसलिए शासन प्रशासन को शहर को लाक डाउन कराने में थोड़ा ज्यादा मेहनत करना पड़ा  है।

पत्थलगढ़ी में 365 दिन की व्यवस्था है 

आप सभी जानते ही होंगे कुछ वर्ष पूर्व पत्थलगढ़ी के नाम पर कई आदिवासियों के खिलाफ कार्यवाही हुई थी। पत्थलगढ़ी वास्तव में गांव की सीमा निर्धारित करने वाला एक मामूली पत्थर नहीं है बल्कि  गांव के 365 दिन की पूरी व्यवस्था है। जिसमें गांव बनाने से लेकर, कब गांव में फसल  बोने की शुरूआत किया जाना है। कब फसल की कटाई होना है। अलग अलग मौसम में आने वाले फसलों एवं वनोपजों की कैसे दोहन करना है। यह सब पारंपरिक ग्राम सभा फैसला करती है।

गांव में लाक डाउन का पालन के लिए बेरियर लगा के रखे है 

बाहर से आने वाले लोगों की जानकारी, आने का प्रयोजन और यदि उस बाहरी व्यक्ति का उस गांव में आना उचित नहीं है, तो गांव के सीमा से ही उन्हें बाहर कर दिया जाता है। ऐसी  समृद्ध व्यवस्था के कारण आज लाक डाउन में गांवों में अभूतपूर्व सफलता मिली। अभी आप गांवों में देख रहे होंगे की कई गांव में पूरा गांव के गांव लाक डाउन का पालन के लिए बेरियर लगा के रखे है।

सहकारिता की व्यवस्था केवल ग्रामीण जनजातियों के पास है 

आधुनिक सभ्य समाज शहरी कल्चर में लोग अपने अपने में मस्त हैं, पास- पड़ोस को नहीं जानते। ऐसे में ग्रामीण व्यवस्था से हम सबको सीख लेने की जरूरत है। मसलन गांव के प्राचीन न्याय व्यवस्था-जिसमें बहुत सारे छोटे-मोटे विवाद का निराकरण गांव स्तर पर ही हो जाता है, व्यापार वाद से दूर गांव में सहकारिता व्यवस्था-प्राचीन गांव का सहकारिता व्यवस्था अपने आप में उत्कृष्ट है।
         आपको बताना चाहूंगा की मान लीजिए मेरे घर कोई मेहमान आ गया और यदि मुझे भोजन में उन्हें मुर्गा खिलाना है और मेरे घर में जो मुर्गे हैं वह छोटे-छोटे हैं, तो मैं बाजार मुर्गा खरीदने नहीं जाऊंगा, बल्कि अपने पड़ोसी के घर से जो बड़े मुर्गा है उसे निशुल्क ले लूंगा और जब मेरे घर का मुर्गा बड़ा होगा तो उन्हें वापस कर दूंगा ऐसा सहकारिता की व्यवस्था केवल ग्रामीण जनजातियों के पास है। ऐसी व्यवस्था दुनिया में कहीं नहीं है।

अनाज बैंक, गांव में मदद कैशलेश योजना के लिये उदाहरण 

यहां तक खेती किसानी में भी यदि कोई किसान किसी कारणवश  खेती किसानी में पिछड़ रहा है, तो पूरा गांव उनकी मदद करता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जो केशलेस की बात करते हैं। वह सहकारिता के माध्यम से जनजाति वर्गों में विशेषकर व ग्रामीण अंचलों के इन ग्रामीणों में दिखता है। ग्रामीण अनाज बैंक के माध्यम से गांव के जरूरतमंद लोगों को समय पर अनाज उपलब्ध कराने हेतु पूरे 365 दिन के लिए अनाज की व्यवस्था रहती थी। आजकल  एक रुपये में चावल मिलने के कारण गांव में धीरे धीरे यह प्रथा समाप्ति की ओर है, हालांकि आज भी अनेक जनजाति बाहुल्य अंचलों में 1 मुठ्ठी चावल से महाकल्याण की योजना के तहत अनाज बैंक संचालित हो रही है। जहां पर प्रतिदिन गांव के प्रत्येक घरों पर महिलायें भोजन बनाते समय 1 मुठ्ठी चाव अलग निकलकर अनाज बैंक के लिये रख देती है जिसे गांव के अनाज बैंक में जमा करा दिया जाता है। इसके साथ ही ग्रामीण वैद्य चिकित्सा, सुरक्षा व्यवस्था, आदि प्रमुख हैं।

हमें पुन: ग्रामीण व्यवस्था की ओर वापस आने की जरूरत है

पूरे दुनिया में खनिज संसाधन, जल, जंगल, पहाड़ एवं अनाज उत्पादन इन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों में और खासतौर पर जनजाति बाहुल्य क्षेत्र में हैं। शुद्ध हवा,  शुद्ध पानी, शुद्ध अनाज, पर्यावरण को संरक्षित करके जनजाति समुदाय ही रखा हुआ हैं। आज हमें इस व्यवस्था को और बेहतर सुदृढ़ ढंग से संरक्षण एवं संवर्धन करने की जरूरत है। आज पूरे विश्व में कोरोना वायरस के संक्रमण ने यह सिखा दिया की हमें पुन: ग्रामीण व्यवस्था की ओर वापस आने की जरूरत है।

पलायन को शत- प्रतिशत रोका जा सकता है

आज हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने हेतु खेती किसानी के साथ गांव में छोटे-छोटे  कुटीर उद्योगों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। जिससे ग्रामीण छोटे-छोटे जरूरतों के लिए शहरों की ओर मुंह ताकते ना रहे। अभी लॉक डाउन में बहुत सारे लोग पलायन के कारण अलग-अलग शहरों में फंस गए जिसके लिए भोजन आदि की व्यवस्था तो हो गया लेकिन भविष्य में राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार के लिए लोगों का गांव से रोजी रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने से रोकना एक बड़ी चुनौती है। चूंकि सरकार के पास गांव के पूरे आंकड़े रहते हैं।  इसलिए यदि सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति रही तो इन ग्रामीणों को  गांव में ही  रोजगार के अवसर प्रदान कर पलायन को शत- प्रतिशत रोका जा सकता है।
लेखक-
आर एन ध्रुव
प्रांताध्यक्ष, अजजा शासकीय सेवक विकास संघ
छत्तीसगढ़

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