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क्या ज्यादा पैसे देने वालों की खबर लगती है गोंडवाना समय पर ?

राष्ट्रीय पत्रकारिता पर 
आपबीती, अनुभव लेख
विवेक डेहरिया
संपादक 
दैनिक गोंडवाना समय
लेख प्रारंभ से लेकर अंत तक कड़वा सच से भरा हुआ है जिन्हें बुरा लगे उन्हें प्रकृति शक्ति हमेशा सुरक्षित, स्वस्थ्य व प्रसन्न रखे यही प्रकृति शक्ति से मेरी प्रार्थना है और बुरा मानने वालों से मैं पहले ही क्षमा मांग लेता हूं। हिन्दी राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर गोंडवाना समय संपादक विवेक डेहरिया को काफी लोगों ने बधाई दिया तो सोचा कि क्यों न पत्रकारिता के 12 वर्षों और स्वयं के अखबार के 8 वर्षों यानि 20 वर्षों का अनुभव आज मैं लिखूं ताकि पत्रकारिता करना कितना आसान है और अखबार को छपवाकर पाठकों के हाथों तक पहुंचाने के बीच कितना व किस तरह का संघर्ष है।
                इसके साथ ही पत्रकारिता करने वाले और मेहनत करने वाले अखबार के संपादक के लिये ये सफर किस तरह संघर्षशील है इसके बाद भी इसे लाखों-करोड़ों रूपये कमा लिये या कमाई का जरिया बताने वालों की कमी नहीं है, सभी को एक ही तराजू में रखकर तौलने वाले, बिकाऊ मीडिया दो शब्दों से संघर्ष ईमानदारी, योग्यता, मेहनत को तार-तार कर देते है। खैर अभिव्यक्ति की आजादी के आगे बोलने वाले और उसी को लिखने वालों को कौन रोक सकता है। 
       मैंने 12 वर्षों की पत्रकारिता में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर भोपाल समेत और भी अखबारों में पत्रकारिता करने का अवसर मिला। इस दौरान दैनिक भास्कर लीडिंग अखबार में मुख्य पृष्ठ पर लगातार चार दिनों तक वाईनेम खबर भी प्रकाशित हुई इस तरह के समाचारों को दैनिक भास्कर भोपाल के अखबार में मुख्य पृष्ठ में मेरी खबरों को स्थान मिला।
             दैनिक भास्कर अखबार की सिवनी शहर के 7 प्रमुख रोड जैसे नागपूर रोड, जबलपुर रोड, अमरवाड़ा रोड, बालाघाट रोड, कटंगी रोड, मंडला रोड, छिंदवाड़ा रोड की आखिरी छोर तक व शहर के प्रमुख वार्डों में किराये की साईकिल में वितरण करने के लिये मैंने साईकिल किराये पर लेकर कभी 2 रूपये से ज्यादा किराया नहीं दिया, क्योंकि प्रतिघंटा साईकिल का किराया 2 रूपये लगता था और जहां से साईकिल किराये पर उठाता था वहां के रजिस्टर में यदि सुरक्षित होगा तो आज भी मेरा नाम मिल सकता है।
           अत्याचार, शोषण, अन्याय, के खिलाफ कलम के लिये स्वयं का अखबार निकालने का सोचा तो पत्रकारिता के दौरान ही गोंडवाना आंदोलन के कार्यक्रमों को कवरेज करते करते हुये गोंडवाना के मिशन को समझा जो प्रकृति व मानवतावादी विचारयुक्त पाया। 
गोंडवाना आंदोलन के दौरान समझ आया कि प्रकृति के प्रति इनका प्रेम क्यों है और क्यों जरूरी है। यही सोचकर गोंडवाना आंदोलन के मिशन से जुड़ भी गया, राजनैतिक पृष्ठभूमि में भी मीडिया प्रभारी के रूप में काम किया लेकिन कुछ विशेष पदाधिकारियों के द्वारा मेहनत को नकारने वालों की यहां भी कमी नहीं थी मतलब हत्सोसाहन के रूप में परिणाम मिलता रहा हां गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन के महानायक ने कभी दरकिनार नहीं किया मुझे व मेरे परिवार को आज भी वे नाम से और काम से जानते है यही मेरे लिये सबसे बड़ा ईनाम है और गोंडवाना के कारण ही आज मेरी पहचान है और नाम सरकार, शासन-प्रशासन में हो या राजनैतिक क्षेत्र में हो या कोई भी क्षेत्र हो गुमनाम नहीं हूं मैं भले ही चेहरा कम ही जानते है। 

कैसे शुरू हुआ गोंडवाना समय के प्रकाशन का सफर

पत्रकारिता करते करते सोचा कि क्यूं न अन्याय, अत्याचार, शोषण की आवाज को हूबहू उतारने के लिये और समस्याओं को कटौती युक्त स्थान की वजाय, फुल पेज में छापने के लिये स्वयं का समाचार पत्र होना जरूरी है और आपने देखा होगा कि गोंडवाना समय समाचार पत्र में कभी भी आपको शेष पेज क्रमांक पर लिखा हुआ कभी नहीं दिखेगा पूरी खबर एक ही स्थान पर होती है चाहे पूरा पेज ही क्यों न भरना पड़े।
             यही विचार आया और गोंडवाना समय का वर्ष 2011 में साप्ताहिक समाचार पत्र के लिये पंजीयन कराया और उसका आरएनआई पंजीयन वर्ष 2012 में संघर्षमय परीश्रम के बाद आ पाया जिसे पक्का पंजीयन कहा जाता है। 

साप्ताहिक समाचार का भी रहा संघर्षमय सफर


गोंडवाना समय के प्रथम अंक वर्ष 2011 का 1 नंबर पेज और 4 पेज

साप्ताहिक समाचार पत्र के पंजीयन के बाद उसे कंपोज कर, प्रकाशन करना, छपवाना उतना आसान नहीं था, कई प्रिंटिंग प्रेस बदला, और छपवा भी लिया तो उसे वितरित कर पाना उससे ज्यादा कहीं कठिन था। मुझे याद है मैं स्वयं सिवनी जिले में दुपहियावाहन में पेपर लेकर गांव-गांव जाता था और रास्ते में सामुहिक रूप से मिलने वाले लोगों के बीच में वितरित करता था, कुछ नाम सुनकर खुश हो जाते थे तो कुछ नकारात्मक जवाब भी देते थे।

गोंडवाना समय द्वितीय अंक वर्ष 2011 का 1 नंबर पेज पर देखे खबर 


           
गिरते पानी, कड़ी धूप, कड़कड़ाती ठण्ड, दिन हो या रात का समय नहीं देखा गांव-गांव स्वयं पहुंचाने का प्रयास किया। चूंकि समाचार पत्र और पत्रकारिता का महत्व गोंडवाना आंदोलन से जुड़े हुये लोगों ने समझ ही नहीं पाया इसलिये संवाददाता भी बनने को तैयार नहीं होते थे कुछ तैयार हुये तो अखबार चला नहीं पाये और न पेपर का बिल भी भुगतान कर पाये नुकसान मुझे ही सहना पड़ा।
            इसके बाद भी गोंडवाना समय का साप्ताहिक प्रकाशन कम बंद नहीं किया संघर्ष करते-करते कुछ अच्छे भी लोग मिले जिन्होंने उत्साह बढ़ाया, हौंसला भी बढ़ाया और सहयोग भी किया पर उनकी संख्या अंगूली में गिनने लायक ही रही। इसके बाद जब मैंने देखा कि जो पीड़ित या शोषित होता है और यह समस्या सबसे ज्यादा जनजाति समुदाय के साथ दिखाई देती थी लेकिन समाचार पत्र सप्ताह में एक बार छपता था तब तक सरकार, शासन-प्रशासन व पाठकों तक बात पहुंचाने में देर हो जाती थी और समस्या इतनी होती थी कि 4 पेज में जगह ही नहीं रह पाती थी किस समस्या को पहले उठाऊं और किसे नहीं यह समस्या बन जाती थी। यही सोचकर विचार आया कि क्यों न इसे दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशन किया जाये लेकिन साप्ताहिक समाचार पत्र का ही खर्च निकालना मुश्किल था तो दैनिक कैसे निकालते लेकिन मेरे साथ कंधा से कंधा मिलाकर साथ देने वाले और साप्ताहिक समाचार पत्र में सबसे ज्यादा आर्थिक मदद करने वाले मेरे साथी में मुझे हिम्मत दिया और कहा कि दैनिक अखबार निकालों और मैंने शुरूआत कर दिया।
             गोंडवाना समय अखबार के छपाई के लिये प्रिंटिंग मशीन को खरीदने में मेरे साथी के परिवार का सबसे बड़ा योगदान है। जिसकी बदौलत गोंडवाना समय को छपवाने के लिये भटकना नहीं पड़ता है। इसमे साथी का नाम नहीं लिखुंगा पर जो जानते है उन्हें मालूम है। 

14 अप्रैल 2017 से हुई दैनिक गोंडवाना समय के संघर्ष की शुरूआत अब भी सफर जारी 

प्रतिदिन बढ़ते शोषण, अन्याय, अत्याचार की आवाज को समाचार का रूप देने के लिये दैनिक गोंडवाना समय का प्रकाशन बहुत ही कारगर सिद्ध हुआ। समस्यायें दबना अब आसान नहीं था वह उजागर होकर पाठकों तक पहुंचने में देर नहीं लगती थी परंतु दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन उतना आसान नहीं था।
              कहने में तो सरल लगता है समाचार पत्र लेकिन उस बीच के संघर्ष व खर्च को कौन समझता है जो समझते है उन्हें मालूम है कि कितना मुश्किल व खर्चिला है। यदि आप 1000 ही कापी प्रकाशित करते है और यदि खुद की मशीन है तो दिन भर पहले रिपोर्टिंग कर समाचार बनाना, कंपोज करने के लिये कर्मचारी व कम्पूयटर की आवश्यकता, प्रिंटिंग मशीन में कर्मचारियों की आवश्यकता है, उसमें लगने वाली महंगी सामग्री जैसे, कागज, स्याही, प्लेट और मशीन जो किराये के मकान में है वहां का किराया और प्रिंटिग मशीन का भारी भरकम बिजली बिल का भुगतान करना बहुत मुश्किल था।
             इसके बाद उसका वितरण कराना और तहसील व दूसरे जिलों में पहुंचाना उतना आसान नहीं था। इतना जरूर था कि सिवनी शहर में लोगों के जुवान पर गोंडवाना समय का नाम रट गया और चर्चा में रहता है गोंडवाना समय का नाम। 

दैनिक गोंडवाना समय के संघर्ष के दौरान आई कुछ तकलीफे

दैनिक गोंडवाना समय का संचालन के लिये सबसे ज्यादा जरूरी एक कार्यालय का होना जरूरी था जो बहुत मुश्किल से मिला जिसे हम ढाई साल के सफर में चार बार स्थान बदल चुके है। उसके साथ ही मेहनत करने के बाद भी गोंडवाना समय समाचार पत्र प्रिंटिंग प्रेस की तीन बार लाईट कट जाना कारण बिल नहीं पटा पाना लेकिन स्वयं की प्रिटिंग मशीन होने के बाद भी गोंडवाना समय का छपना बंद नहीं हुआ।
           हालांकि जो लोग नहीं चाहते थे कि गोंडवाना समय समाचार पत्र छपे उनके चेहरे की खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। उस मुश्किल को भी इंदौर के एक सख्स के सहयोग से दूर कर लिया गया जिन्होंने मेरी मेहनत गोंडवाना समय समाचार की अहमियत को समझा था। दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन बहुत ही खर्च वाला काम है क्योंकि लागत ज्यादा लगती है और आवक कम होती है इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि विज्ञापन का सपोट गोंडवाना समय को बहुत कम मिला, जिससे आर्थिक समस्यायें समाचार पत्र की हल हो सकती थी।
          इसके बाद भी गोंडवाना समय का संघर्ष का सफर रूका नहीं बीच में जब पुन: दिक्कत आई तो भोपाल के गोंडवाना समय के शुभचिंतक लेखक इतिहास को खोजने वाले ने बिना बताये ही तकलीफ को समझ लिया और मदद के लिये गुहार लगाई तो देश भर से गोंडवाना के शुभचिंतकों ने मदद के लिये हाथ भी बढ़ाया और कुछ तकलीफ कम भी हुई।
           गोंडवाना समय के संपादक के रूप में लगभग 12 से 16 घंटे काम करने के दौरान समाचार बनाते-बनाते सबसे ज्यादा टेंशन यही होती है कि कागज खत्म हो रहा है, प्लेट खत्म हो रही है, स्याही नहीं है, कार्यालय का किराया देना है, मशीन के भवन का किराया देना है, बिजली बिल नहीं पटा है, कर्मचारियों को वेतन देना है, प्रतिदिन का कार्यालय का मेंटनेंस भी करना है कैसे होगा लेकिन संघर्ष के साथ तकलीफ आज भी साथ साथ चल रही है। 

फ्री के ब्लॉगर से चलाया काम, बेवसाईट में अ‍ॅपडेट तो किया पर

तकनीकि व आधुनिक युग व प्रतिस्पर्धा के इस युग में गोंडवाना समाचार पत्र के नाम पर इतना कमाया कि फ्री के ब्लॉगर का उपयोग करना पड़ा, इसके बाद जब बेवसाईट कुछ महिने पहले परिवर्तित किया गया है लेकिन जैसे बेवसाईट और भी समाचार पत्रों की होती है वह अत्याधिक खर्चीला है। जो इतना कमाने के बाद भी फिलहाल गोंडवाना समय के संभव नहीं है लेकिन खुशी इसी बात है कि गोंडवाना समय के लाखों की संख्या में आॅनलाईन पाठक है जो वर्तमान में 28 लाख तक पहुंचने की ओर है। 

ये है संपादक का खाता 0 बैलेंस

             
             
वैसे भी गोंडवाना समय पर तिरछी नजर हमेशा रहती है। वहीं कुछ समाजिक संगठनों के पदाधिकारियों को भारी टेंशन है कि गोंडवाना समय के नाम पर समाज से लाखों करोड़ों कमा लिया है तो उनके लिये मेरा खाता नंबर और उसमें 0 बैलेंस को वह देख सकते है इसके बाद भी संतुष्टी न हो तो वे बैंक से स्टेटमेंट निकाल सकते है जब से खाता खुला है और नहीं बन पाये तो मुझे बता सकते है मैं खाता खुलने से लेकर अभी तक स्टेटमेंट उन्हें उपलब्ध करवा सकता है ताकि उनकी टेंशन कम हो सकें। 
इसे नहीं समझते लेकिन इसके बाद भी शायद ही किसी का समाचार गोंडवाना समय में प्रकाशन होने से रूक पाता है हां कई बार प्रेस एक्ट और कानूनी प्रावधानों को भी देखना जरूरी होता है नहीं कानूनी कार्यवाही के लिये सिर्फ संपादक जिम्मेदार होता है।
गोंडवाना समय समाचार पत्र के संपादक के रूप में कार्य करते करते मैंने इतना रूपया कमाया हूं कि बीते कुछ महिने से मेरा खाता ही 0 बैलेंस बता रहा है। क्योंकि अक्सर यही होता है जो लोग मुझे समाचार भेजते है या बताते है और समय पर नहीं लग पाता है जगह के अभाव या फिर वे बिना समस्या को जाने ही सोशल मीडिया में सार्वजनिक कर देते है और कहते है कि गोंडवाना समय में ज्यादा पैसे देने वालों के समाचार लगते है क्या, पर्सनल में लिखकर भेजते है कि हमारा समाचार क्यों नहीं लगा, क्यों नहीं लगा रहे हो लेकिन वे यह नहीं देखते है कि हमें समाचारों के साथ तथ्यों को भी भेजना है, प्रमाणिक हो, इसके साथ ही समय कब तक देना है क्योंकि मैं अकेला समाचार टाईप करने वाला हूं, सिर्फ समस्या कम शब्दों में लिखकर पहुंचाते है और मुझे उसे समाचार का स्वरूप में बदलना होता है जो कितना कठिन है।

ये है गोंडवाना समय का करेंट एकाऊँट मात्र 158 रूपये 

         
जो लोग सोचते है कि गोंडवान समय के नाम लाखों कमा रहा हंू उन्हें क्या पता कि मुुझे करेंट एकाऊँट खुलवाने में ही कई साल लग गये क्यों कि करेंट एकाऊंट खोलने के लिये 5000 और बड़ी बैंकों में 10000 रूपये लगते है।
जिसे मैंने लगभग डेढ़ साल से पहले ही खुलवा पाया जिसका खाता नंबर का प्रमाणीकरण और उसका वेलेंस देख सकते है और स्टेटमेंट मैं ही निकलवाकर दे सकता हूं ताकि शक और संदेह समाप्त हो जाये।
             वहीं गोंडवाना समय के करेंट एकाउंट में 158 रूपये का बैलेंस हो तो बैंक में गोंडवाना समय की क्या साख होगी यह भी पता चल सकता है कि मैंने कितना कमाया हूं, कितना खोेया हूं और क्या आज तक पाया हूं। 

खूब कमा रहे हो गोंडवाना समय के नाम पर 

गोंडवाना समय समाचार पत्र के कार्यालय में आने वाले कुछ लोग कई बार यह कहते है कि तुमने तो एक कम्पयूटर से तीन कंप्यूटर कर लिये खूब कमा रहे हो गोंडवाना समय के नाम पर, पत्रकारिता के नाम पर इस तरह सम्मान करते है लेकिन उन्हें क्या पता कि यह भी कर्ज लेकर लिया गया सामान है जो दैनिक समाचार पत्र के लिये आवश्यक है। बजाज फाईनेंस लिमिटेड जहां से कर्ज लिया हूं उसका लोन खाता नंबर 5Q3RPL62988211 ये है और वहां पर मेरी सीआर क्या है यह संपर्क करने पर गोंडवाना समय के नाम पर खूब कमा रहा हूं और ज्यादा पैसे लेने वालों के समाचार लगाता हूं वालों को जवाब मिल सकता है। 

न थकेगा, न रूकेगा, जब तक हूं जीवित गोंडवाना समय का संघर्ष 

             कुछ लोग चाहते है कि गोंडवाना समय समाचार पत्र बंद हो जाये, कुछ लोगों ने तो कोशिश भी किया और अपने घर व अपने क्षेत्र से गोंडवाना समय समाचार पत्र को बंद करवाने का प्रयास भी किया लेकिन वह कामयाब नहीं हो पायेंगे।
           गोंडवाना समय के साथ प्रकृति शक्ति का साथ है और कम संख्या भले ही होगी हिम्मत देने वालों की उनके द्वारा मेरा मनोबल निरंतर बढ़ाया जाता है, मेरा उत्साह में कभी कमी नहीं होने देते है ऐसे शुभचिंतकों को रहते हुये गोंडवाना समय का संघर्ष न थकेगा और न ही कभी रूकेगा। इसके साथ ही मैं गोंडवाना आंदोलन की भट्टी में तपकर निकला हूं, गोंडवाना का त्याग, तपस्या, संघर्ष को करीब से देखा हूं, उसका अनुभव मेरे साथ है इतना आसान नहीं है गोंडवाना समय का सफर को रोकना जब तक जीवित हूं।
            अब लोग मेरे यह लेख पढ़ने के बाद यह न सोचने लगे कि कमाई का ये नया तरीका निकाल लिया तो उन्हें बता दूं कि मेरे और गोंडवाना समय के साथ प्रकृति शक्ति का हाथ है साथ है जब विपरीत परिस्थिति में गोंडवाना समय समाचार पत्र का प्रकाशन हो सकता है, अब तो प्रकृति शक्ति की कृपा से साधन की कमी नहीं है मुझे अटूट विश्वास प्रकृति शक्ति पर है।
            आखिर में यही कि गोंडवाना आंदोलन के लिये सिर्फ मैं अकेला ही नहीं हूं, हजारों सिपाही है जिन्होंने तन, मन, धन सब कुछ खो दिया लेकिन हार नहीं माना है, उनकी प्रेरणा मुझे मजबूत करती रहेगी संघर्ष के लिये। 
आपबीती, अनुभव लेख
विवेक डेहरिया
संपादक 
दैनिक गोंडवाना समय

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