Thursday, August 13, 2020

ज्यादातर फिल्मो में जनजाति समाज को जंगल में रहने वाले असभ्य मनुष्य लगभग राक्षसों के रूप में दिखाया गया है

ज्यादातर फिल्मो में जनजाति समाज को जंगल में रहने वाले असभ्य मनुष्य लगभग राक्षसों के रूप में दिखाया गया है

जनजाति समुदाय का यह शराब पी के उद्दंडता करने या होश खो देने वाला चरित्र ही सामान्य वर्ग के सामने आता है 

जनजाति समाज को उग्रवादी, हिंसक, अनपढ़, समाज विरोधी दिखने की परंपरा भारतीय फिल्मो में लगातार चली आ रही है

फिल्मो में, जनजाति पहले भी जंगलवासी थे और आज भी जंगलवासी हैं

फिल्मो में नाचने गाने से सम्बन्ध जनजाति संस्कृति या लोक गीतों से बिल्कुल नही है

भारतीय परिदृश्य और जनजाति सिनेमा


लेखक
राहुल खडिया
सहायक प्राध्यापक
एम सी यू विश्वविद्यालय
फिल्म मेकर, जनजाति  

प्रस्तावना 

सिनेमा समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, भारतीय सिनेमा ने भी अपने सौ वर्षों के इतिहास में समाज के विभिन्न पहलुओ को प्रस्तुत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है । जनजाति समाज भारत का छोटा पर निश्चित ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, पर यह हिस्सेदारी भारतीय सिनेमा के परिद्रश्य में कही गुम सी हो जाती है। ''कमर्शियल'' या  ''पापुलर'' सिनेमा का मुख्य उद्देश्य तो वैसे भी व्यावसायिक सफलता अर्जित करना होता है। इसलिए यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती की कोई नामचीन फिल्मकार जनजाति विषय या जनजाति समाज का बड़े परदे पर प्रतिनिधित्व करे। डाक्यूमेंट्री कल्पना से दूर सत्य के ज्यादा करीब होती है। 

इसके साथ ही डाक्यूमेंट्री बनाने का उद्देश्य फिक्शन या फीचर फिल्म से सर्वथा भिन्न होता है, जैसे व्यवसायिक सफलता से परे समाज के अनछुए पहलुओ को टटोलना सरोकारों और व्यवस्था की बात करना। इसलिए बड़े पैमाने पर नहीं व्यक्तिगत स्तर पर और सरकार के प्रोत्साहन के चलते डाक्यूमेंट्री फिल्मो में जनजाति समाज कहीं न कहीं नजर आता है और समय-समय पर जनजाति समाज की समस्याएं समृद्ध संस्कृति और लोकविधाये को डाक्यूमेंट्री के रूप में एक प्लेटफार्म मिल रहा है। जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा भी भारत के कई जनजाति समुदाय का विडियो दस्तावेजीकरण डाक्यूमेंट्रीज के द्वारा किया गया है, जो युट्यूब प्लेटफार्म पर बिना किसी शुल्क के उपलब्ध है। 

विषय का इतिहास

देखा जाये तो जनजाति समाज को फिल्मो में दिखाने की या कहे फिल्माने की कहानी फिल्मो के उद्भव के साथ ही शुरू हो गयी थी। हिंदी सिनेमा के आदिपुरुष धुंडीराज गोविंद फाल्के को माना जाता है, जिन्हें हम दादा साहेब फाल्के नाम से भी जानते हैं। विडम्बना यह है अगर उनकी दो फिल्मो ''बुद्धदेव'' और ''सत्यवान सावित्री'' को छोड़ दिया जाये तो उनकी ज्यादातर फिल्मो में जनजाति समाज को जंगल में रहने वाले असभ्य मनुष्य लगभग राक्षसों के रूप में दिखाया गया है जो सिनेमा के सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। लोकप्रिय फिल्म बाहुबली में कालकेय समुदाय का भयावह चित्रण एक बहुत ही ताजा उदहारण है, माना की फिल्मो में, फिल्म बनाने की तकनीक में और दर्शको में जमीन आसमान का अंतर आ गया हैं पर जनजाति पहले भी जंगलवासी थे और आज भी जंगलवासी हैं।  

कोइतूरो को नाचते गाते हुए रूमानी अंदाज में लहराते हुए दिखाया हैं

कई फिल्मो में कोइतुरो को नाचते गाते हुए कभी अर्धनग्न तो कभी पत्तों से लपेटे हुए दिखाया जाता हैं और यहाँ नाचने गाने से सम्बन्ध जनजाति संस्कृति या लोक गीतों से बिल्कुल नही है जो की सर्वथा अनुचित हैं। इस नजरिए से देखने या दिखाने वाले जनजाति समुदाय या समाज के उस यथार्थ को नजरअंदाज कर जाते है, की वो अभावो से घिरा है फिर भी प्रकृति के सबसे समीप हैं और उसको बेवजह नुकसान ना पहुचाते हुए, संधारण विकास के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। भारतीय सिनेमा के शुरूआत काल की एक और फिल्म 1942 में बनी ''रोटी'' जो की स्वयं पूंजीवादी विचारधारा का खिलाफत करती हैं। उसमें भी दर्शको को आकर्षित करने के लिए उस समय के आइटम डांस के रूप में जनजाति समुदाय को फुल पत्ती लपेटकर रूमानी मुद्रा में नृत्य करते हुए दिखाया गया हैं। बिमल रॉय द्वारा निर्देशित, ऋत्विक घटक द्वारा लिखी और दिलीप कुमार, वैजैयंती माला, प्राण जैसे बेहतरीन अदाकारों से सुसज्जित 1958 में बनी फिल्म ''मधुमती'' एक बेहतरीन फिल्म थी, पर उस में भी कोइतूरो को नाचते गाते हुए रूमानी अंदाज में लहराते हुए दिखाया हैं।

जनजाति समाज के किसी सकारात्मक पहलु को दिखाए 

और मधुमती तो भारतीय सिनेमा इतिहास के स्वर्णिम युग और समानांतर सिनेमा के उद्भव काल की फिल्म हैं। जब यथार्थवादी विषय, किरदार, सेट डिजाइन और मुद्दे को प्राथमिकता दी जाती थी। ऐसे ही कई और फिल्मो के नाम गिनाये जा सकते हैं, जिनमें जनजाति समुदाय को और नृत्यों को फिल्मो में केवल नयनाभिराम रचनांश की तरह रखा गया- ''नागिन'', ''विलेज गर्ल'', ''अलबेला'', ''दुपट्टा'', ''श्रीमतीजी'', ''यह गुलिस्तां हमारा'', ''टार्जन और जादुई चिराग'', ''दिलरुबा'', ''टावर हाउस'', ''शिकार'' आदि 1970 के बाद का समय जिसे आधुनिक भारतीय सिनेमा का आगाज भी माना जाता है। यथार्थ से वैसे भी दूर था तो उससे उम्मीद करना की वो जनजाति समाज के किसी सकारात्मक पहलु को दिखाए या उसपे फिल्म बनाए तो यह तो बड़ी असंभव सी बात लगती हैं। 

जिसके बोल हैं ''ये महुआ करे क्या इशारे''

वर्ष 1983 में आई फिल्म बालू महेंद्र की फिल्म ''सदमा'' जनजाति समुदाय के बारे में मिथ्य चरित्रकरण का एक और सशक्त उदहारण है। कमल हासन और श्री देवी के फिल्मी करियर की शायद सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक, पद्मभूषण इल्लैराजा द्वारा संगीतबद्ध इस फिल्म का एक गीत और उसके पीछे विचार गौर करने लायक है। फिल्म की दूसरी सहनायिका विजयालक्ष्मी वाड़लापति जो दक्षिण भारतीय फिल्मो में स्टेज नाम सिल्क स्मिता के नाम से जानी जाती थी। नायक कमल हसन के साथ एक रूमानी गाना स्वप्न में देखती हैं, जिसके बोल हैं ''ये महुआ करे क्या इशारे'' निर्देशक ने गाने के दृश्य में नायक-नायिका दोनों को जनजाति पहनावे या कहा जाए निर्देशक या कॉस्ट्युम डिजाइनर द्वारा कल्पित अर्धनग्न जनजाति पहनावे में बेहद रूमानी अंदाज में दिखाया गया गया है। 

...फिल्मकार का दायित्व समाप्त नहीं हो जाता

गोयाकि अगर कोई अंतरंगता की कल्पना भी करें तो उसमे जनजाति ही हो और वो महुआ के फूल से बनी ग्रामीण शराब को पीने से हो या उसके बाद होश खो दे। जनजाति समुदाय का यह शराब पी के उद्दंडता करने या होश खो देने वाला चरित्र ही सामान्य वर्ग के सामने आता है क्योंकि वर्षो से सिनेमा और मीडिया के अन्य माध्यमों में यही दिखाया गया हैं और जैसा की लेख के आरम्भ में लिखा गया था कि सिनेमा समाज का सजीव और हुबहू चित्रण करता है और केवल कल्पित रचना लिख देने से या फिल्म के सभी पात्र काल्पनिक लिख देने से फिल्मकार का दायित्व समाप्त नहीं हो जाता क्योंकि फिल्मकार की कल्पना निराधार नहीं होती बल्कि प्रच्छन्न विचार या सोच होती है, जिसे वह फिल्म के माध्यम से अभिव्यक्त करता हैं।

''चक दे इंडिया'' फिल्म में भी फाइनल टीम में जगह नहीं मिलती

यदा कदा जनजाति  समाज को या किसी जनजाति व्यक्ति विशेष को भारतीय मुख्यधारा की फिल्मो में दिखाया भी जाता है। एक दशक पहले आई ''चक दे इंडिया'' फिल्म में भारतीय नेशनल टीम में चार जनजाति हॉकी प्लेयर्स को दिखाया गया था। फिल्म में वे भारतीय टीम में झारखण्ड और उत्तर भारत राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। जिनके बिना हॉकी टीम की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। संख्या के रूप में तो छोड़िये फिल्म में भी उनका रूपण कम पड़ी लिखी हुई, कम समझ वाली और हिंदी न बोल पाने वाली प्लेयर्स के रूप में किया गया है। कमाल की बात ये है की उन्हें फिल्म में भी फाइनल टीम में जगह नहीं मिलती और उन्हें पूरे समय दरकिनार रखा जाता है। 

जनजाति समाज को एक काल्पनिक कहानी में भी हाशियें पर रखा गया 

गोयाकि जनजाति समाज को एक काल्पनिक कहानी में भी हाशियें पर रखा गया है, प्रसिद्ध फिल्मकार मणिरत्नम द्वारा निर्देशित फिल्म ''रावण'' की कहानी एक ऐसे जनजाति समाज के मुख्या बीरा के इर्द गिर्द घुमती है, जो की हिंसक उग्रवादी है और अपने साथियों के साथ समाज का बहिष्कार करता है। लोगो का अपहरण करता है, जनजाति समाज को उग्रवादी, हिंसक, अनपढ़ और समाज विरोधी दिखने की परंपरा भारतीय फिल्मो में लगातार चली आ रही है। फिल्म ''टैंगो चार्ली'' भारतीय सेना के एक बड़े आॅपरेशन पर आधारित है, जिसे असम राज्य में प्रतिबंधित कर दिया गया था। फिल्म में एक ''बोडो'' जनजाति विद्रोही को एक बंदी का कान काटकर अपनी प्रेमिका को भेंट करके दिखाया गया था। 

बल्कि उसे फिल्म में समाज, सरकार और व्यवस्था विरोधी बताया गया

एक अन्य फिल्म ''रेड अलर्ट'' भी नक्सलवाद के इर्द गिर्द ही घुमती है और अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी जनजाति समाज की समस्या का कोई समाधान नहीं बताया है बल्कि उसे फिल्म में समाज, सरकार और व्यवस्था विरोधी बताया गया है। वर्ष 1980 में आई ''द नक्सलाइट'', वर्ष 2002 में आई ''लाल सलाम'', वर्ष 2003 में आई ''हजारों ख्वाहिशें ऐसी'' और वर्ष 2012 में आई ''चक्रव्यूह'' में भी जनजाति प्रतिनिधित्व है, जो नक्सलवाद पर केंद्रित हैं। फिल्म में उनके संगठन, भर्ती, अनुशासन, नेतृत्व, रणनीति, पुलिस के साथ मुठभेड़, मुखबिरी, महिला कैडर की उपस्थिति, प्रेम संबंध वगैरह को चित्रित किया गया है। '' 

'' ये आदिवासी न इंसान हैं और न जानवर, ये शैतान हैं''

आपने इस इलाके में आकर बड़ी गलती कर दी, '' ये आदिवासी न इंसान हैं और न जानवर, ये शैतान हैं''  ये डायलॉग है। हिंदी फीचर फिल्म ''एम एस जी 2'' के जो की डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह द्वारा निर्मित निर्देशित की गयी थी। जिसमे मुख्य किरदार भी उन्ही के द्वारा निभाया गया था, जनजाति समाज के देश व्यापी विरोध के बाद इसे कई राज्यों में रिलीज होने से रोक दिया गया था। बाद में गुरमीत राम रहीम ने एक टीवी चैनल को अपनी सफाई देते हुए कहा था कि '' फिल्म जब बनी भी नहीं उससे पहले मैं 2000-2002 के बीच छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में आदिवासियों के बीच गया था। वहां मैने देखा कि वे लोग बिल्कुल मध्ययुगीन तरीके से बिना कपड़ों के सिर्फ पत्ते लपेटे रहते हैं, जिंदा जानवर का मांस खाते हैं, ऐसे लोगों को जो जंगली हैं, शैतान हैं, उन्हें हमने इंसान बनाने की बात कही है, जो कहीं से भी गलत नहीं है। 

''बाहुबली'' में कालकेय जनजाति को नेगेटिव किरदार में दिखाया गया 

जनजाति समाज का रुपण अगर इस तरह सामान्य दर्शक के सामने जायेगा तो कही न कही वह उसकी विचारधारा का हिस्सा बन ही जाती है। इसी तरह के मिथ्या निरूपण की पराकाष्ठा हमें देखने को मिलती है। हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी और व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म ''बाहुबली'' में इसमें नेगेटिव किरदार में कालकेय जनजाति को विभत्स, खूंखार, हिंसक, बलात्कारी के रूप में दिखाया गया था। जिसको उतनी ही क्रूरता से खत्म करने पर युवा राजकुमार अपने को कुशल प्रशासक के रूप में स्थापित करता है। पीरियड फिल्मो में जनजाति समाज का चित्रण तो एक अलग नजरिया है, पर सच्चाई से प्रेरित बायोपिक फिल्मो में ऐसे जनजाति व्यक्तित्व के चित्रण में उसके समाज को पूरी तरह से भुला दिया जाता है। जबकि एक व्यक्तित्व के निर्माण में उसकी परवरिश और उसके समाज के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 

''मैरी कॉम'' में संस्कृति, लोकगीतों और भाषा को दरकिनार कर दिया 

जैसे ''वर्ल्ड चैंपियन बॉक्सर'' और ट्राइब्स इंडिया की ब्रांड एम्बेसडर मैंगते चंग्नेइजैंग मैरी कॉम पर बनी फिल्म ''मैरी कॉम'' में उत्तर पूर्वी राज्य की समृद्ध संस्कृति, लोकगीतों और भाषा को दरकिनार कर दिया गया था। व्यावसायिक मापदंडो के चलते फिल्म की मुख्य अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा जिन्होंने मैरी कॉम का किरदार निभाया था उन्हें मैरी कॉम जैसा दिखने के लिए प्रोस्थेटिक और मेकअप का इस्तेमाल करना पड़ता था। जिसमे फिल्म प्रोडक्शन की दृष्टि से काफी समय और पैसा खर्च हुआ। इसकी जगह मैरी कॉम के जैसे चेहरे और ढीलढौल वाली उत्तर पूर्व की किसी मूल निवासी को लेकर भी यह फिल्म बनायीं जा सकती थी7 जिससे न केवल बजट कम होता , उसके साथ ही किसी नये चेहरे को हिंदी सिनेमा में परिचय करवाया जा सकता था। 

तो सामान्य लोगो को मुख्यधारा आने में तो बरसो लग जायेंगे

सोनम वांगचुक जो की लद्दाख की पहचान के रूप में जाने जाते है और आजकल चीन के घुसपैठ के विरोध में और चीन के उत्पादों के बहिष्कार का मुख्य चेहरा बनके सामने आये है, उन्ही से प्रेरित थी, फिल्म 3 इडियट्स का मुख्य किरदार जो की आमिर खान द्वारा अभिनीत किया गया था, 3 इडियट्स जो की एक व्यवसायिक रूप से सफल और अत्यंत प्रेरणा दायक फिल्म थी। उसमें भी मैरी कॉम के समान ही सोनम वांगचुक के जनजाति व्यक्तित्व और लद्दाखी संस्कृति को केवल अमुख्य प्लॉट का हिस्सा ही बनाया गया। अगर नये भारत के ये दो जनजाति आदर्श व्यक्तित्वों सिनेमा के माध्यम से अपनी बात नही कह पाएंगे तो सामान्य लोगो को मुख्यधारा आने में तो बरसो लग जायेंगे। 

मिथुन चक्रवर्ती को अपनी पहली ही फिल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला 

भारतीय सिनमा में जनजाति जीवन शैली को यथार्थ से परे दिखाने वाली अनेकों फिल्मों के बावजूद कुछ फिल्मकार या फिल्मे ऐसी भी है। जो घनी काली घटाओं में उम्मीद की किरण के सामान हैं। अगर फीचर फिल्मों की बात की जाए तो यथार्थवादी फिल्मकार मृणाल सेन की सन 1977 में ''मृगया'' एक दर्शनीय फिल्म है, जो एक संथाली युवक की कहानी हैं, जो अंग्रेजी हुकमत द्वारा अपनी पत्नी के यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाता हैं। जानने योग्य बात यह है की फिल्म में बेहतरीन अभिनय के लिये मिथुन चक्रवर्ती को अपनी पहली ही फिल्म में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। 

फिल्म में वास्तविक शिकारी धूर्त साहूकार है

आदिवासी विषयों को विश्वसनीयता के साथ फिल्माने वाली ''मृगया'' में पद्मभूषण, पद्मविभूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजे गए निर्देशक मृणाल सेन ने दिखाने का प्रयास किया है कि फिल्म में वास्तविक शिकारी धूर्त साहूकार है, शायद उसी तरह जिस तरह भारत की सामाजिक संरचना रही है, उसमें निचली जाती या तबके का शोषण उनकी नियति बन गई है। पर यह सब तभी तक संभव है जब तक वह निरंतर दमन से परेशान तबका जाग न जाएं। इसी विचार का समर्थन करती है 

ताकि फिल्मकार भी आजाद होके हर विषय, हर समाज, हर समस्या को सामने ला सकें 

गोविन्द निहलानी की 1998 में आई नेशनल अवार्ड से पुरस्कृत फिल्म ''हजार चौरासी की मां'' हैं। जया बच्चन, अनुपम खेर, जोय सेनगुप्ता, सीमा बिस्वास, नंदिता दास और मिलिंद गुनाजी जैसे मंझे हुए कलाकारों से सुसज्जित और नक्सलवाद का एक अलग कोण दिखाती। इस फिल्म का निष्कर्ष है, कि क्रांति की समाप्ती तभी हो सकती है जब शासन गरीबो और शोषितों को मुलभुत अधिकारों के साथ ही सम्मान भी देगी। जनजाति समुदाय या समाज स्वचैतन्य है और धीरे-धीरे प्रकृति के साथ चलते हुए भी निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। फिल्म निमार्ताओं के साथ ही दर्शक भी अपनी विचारधाराओं को व्यापक उड़ान भरने दे, सालो से आये पूर्वाग्रहों, एकतरफा विचारधाराओं और मानसिकताओं को विराम दे ताकि फिल्मकार भी आजाद होके हर विषय, हर समाज, हर समस्या को सामने ला सकें। 

सन्दर्भ सूची 

 

·         सिनेमाकॉलम में हरि राम मीणा का लेख : हिंदी फिल्मों में आदिवासी

·         Adivasi Community Remains Invisible And Unheard In The Hindi Movie Industry by  Sameer Bhagat

·         The changing representations of tribal people in Hindi cinema SOHINI CHATTOPADHYAY


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