Tuesday, August 18, 2020

अर्चना सोरेंग संयुक्त राष्ट्र संघ की बनी सलाहकार, जनजाति समुदाय पर पूरी दुनिया को हो रहा गर्व

अर्चना सोरेंग संयुक्त राष्ट्र संघ की बनी सलाहकार, जनजाति समुदाय पर पूरी दुनिया को हो रहा गर्व 

अपनी योग्यता मेहनत के बल पर यूएनओ तक पहुंचकर भारत से शामिल हुई अर्चना सोरेंग

ओडिशा। गोंडवाना समय।

ओडिशा राज्य की जनजाति बाहुल्य गांव से जनजाति समुदाय खड़िया जनजाति की अर्चना सोरेंग ने अपनी मेहनत योग्यता के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) की महत्वपूर्ण पद तक का सफर तय किया है। अर्चना सोरेंग को यूएनओ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अपने सलाहकार समूह में शामिल किया है। अब क्लाइमेट चेंज पर दुनियाभर के लिए काम करेगी। 

यूएनओ तक का पहुंंचना प्रेरणादायी

जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाली अर्चना सोरेंग के लिये छोटे से गांव से यूएनओ तक का पहुंंचना प्रेरणादायी है। हालांकि अर्चना सोरेंग को पर्यावरण की देखरेख का काम विरासत में मिला है। यह इसलिये क्योंकि जनजाति समुदाय का प्रकृति से हमेशा विशेष लगाव होता है। अर्चना सोरेंगे भी अपने पुरखों के इस काम को आगे बढ़ा रही है। यही वजह है कि अर्चना ने छोटे से गांव यूएनओ तक में जगह बना ली।

युवा सलाहकार समूह में 7 सदस्य हुये शामिल 

भारत से अर्चना सोरेंग जनजाति समुदाय से एकमात्र सदस्य को युवा सलाहकार समूह में शामिल किया गया है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव युवा सलाहकार समूह की 7 सदस्य समिति में चयनित हूं। जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई के लिये सदस्यों में 1. अर्चना सोरेंग (भारत ) 2. निसरीन एल्सैम (सूडान), 3. अर्नेस्ट गिब्सन (फिजी) 4. व्लैद्स्लाव कैम (मोल्दोवा), 5. सोफिया किआनी (संयुक्त राज्य अमेरिका) 6. नाथन मेटेनियर (फ्रांस) 7. पलोमा कोस्टा (ब्राजील) शामिल है।

पर्यावरण विषयों पर सलाह और समाधान होगा काम 

अर्चना सोरेंग ने पटना वूमेंस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके मुंबई के टीआईएसएस से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। इस दौरान छात्रसंघ की अध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने वकालत की भी पढ़ाई की है। जलवायु परिवर्तन पर काम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के सलाहकार के रूप में जिस 7 सदस्ययी युवा सलाहकार समूह का चयन हुआ है। उसमें ओडिशा से अर्चना सोरेन को भी शामिल किया गया है। इस समूह का काम दुनिया के पर्यावरण विषयों पर सलाह और समाधान देना है। समूह के सदस्य सभी क्षेत्रों के साथ-साथ छोटे द्वीप राज्यों के युवाओं की विविध आवाजों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

हम जलवायु संकट का मुकाबला करने में सबसे आगे हो

आईसीवाईएम की भी सक्रिय सदस्य यूएनओ के साथ काम करने का मौका मिलने पर अर्चना की खुशी का ठिकाना नहीं है। वे कहती हैं कि 'हमारे पूर्वज अपने पारंपरिक ज्ञान और प्रथाओं के माध्यम से सदियों से जंगल और प्रकृति की रक्षा कर रहे हैं। अब यह हम पर ये दायित्व आता है कि जलवायु संकट का मुकाबला करने में सबसे आगे हो। बीते 27 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने जलवायु परिवर्तन पर एक युवा सलाहकार समूह की घोषणा करते हुए कहा था कि हम एक जलवायु आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं। हमारे पास अब समय नहीं बचा है, हमें कोविड-19 से बेहतर तरीके से उबरने, अन्याय और असमानता का सामना करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई की जरूरत है। 

आदिवासियों की जीवनशैली प्रकृति से जुड़ी हुई 

जलवायु कार्रवाई पर महासचिव के इस युवा सलाहकार समूह में शामिल भारतीय जलवायु कार्यकर्ता खड़िया जनजाति की अर्चना सोरेंग क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न युवा संगठनों के साथ काम करते हुए आदिवासी समुदायों के पारम्परिक ज्ञान और प्रथाओं को संरक्षित कर उन्हें बढ़ावा देने में काफी सक्रियता से भाग लेती रही हैं खड़िया आदिवासी समूह की जो भाषा है, उसमें मेरे उपनाम सोरेंग का अर्थ है ''पत्थर'' यह दिखाता है कि आदिवासियों की जीवनशैली प्रकृति से किस कदर जुड़ी हुई है। अर्चना ने मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज से रेगुलेटरी गवर्नेंस से एमए किया है और फिलहाल वो ओडिषा में अनुसंधान अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।

आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान पर किया रिसर्च 

आदिवासी समूह का हिस्सा होने के साथ-साथ उनकी हमेशा यह रूची रही है कि वे अपने समुदाय के बारे में लिखे, रिसर्च करे कि किस तरह से आदिवासी समुदाय वन संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली में योगदान दे रहा है। अर्चना सोरेंग ने वर्ष 2018 से 2020 तक ओडिषा के विभिन्न राज्यों में जा जाकर आदिवासियों के पारम्परिक ज्ञान पर रिसर्च की कि उनकी प्रथाएँ क्या हैं और वो किस तरह से वनों की सुरक्षा कर रहे हैं।

बल्कि इससे पूरी दुनिया पर खतरा है

संयुक्त राष्ट्र महासचिव की युवा सलाहकार समिति का काम छह जलवायु लक्ष्यों को लागू करने के रास्तों पर उन्हें सुझाव देना है। युवाओं को भविष्य की जलवायु कार्रवाई का हिस्सा होना बहुत जरूरी है क्योंकि जो भी आगे नीतियाँ बनेंगीं वो हम युवाओं पर ही लागू होंगी तो इसलिये बहुत जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र युवाओं की बात सुने। इसलिये इस समिति का जो गठन हुआ है वो युवाओं को योगदान देने के लिये सक्षम बनाने के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके जरिये हम युवाओं की आवाज वहाँ तक पहुँचा पाएँगे। संयुक्त राष्ट्र के सभी जलवायु लक्ष्यों को समग्र मानते हुए उनका कहना है कि इसमें केवल एक राष्ट्र या दो राष्ट्रों के काम करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि सभी को एक-साथ, एक वैशिविक समुदाय के रूप में काम करना होगा और लागू करने के लिये आगे बढ़ना होगा। कहीं न कहीं हमें ये समझना बहुत जरूरी है कि ये जो जलवायु संकट है वो किसी एक व्यक्ति या देश पर असर नहीं डाल रहा, बल्कि इससे पूरी दुनिया पर खतरा है। 

स्वदेशी समुदायों को जलवायु कार्रवाई का अभिन्न हितधारक बनाया जाए

अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर, अर्चना सोरेंग ने जलवायु परिवर्तन पर युवा सलाहकार समूह ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव, महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और उप महासचिव अमीना मोहम्मद के साथ संयुक्त राष्ट्र युवा दूत जयथमा विक्रमणायके और सहायक महासचिव सेल्विन हार्ट के साथ अपनी पहली बैठक की। जिस पर उन्होंने जोर दिया कि एक बेहतर बनाने के लिए कोविड-19 के बाद की दुनिया यह बहुत महत्वपूर्ण है कि स्वदेशी समुदायों को जलवायु कार्रवाई का अभिन्न हितधारक बनाया जाए। 

हमें कलात्मक तरीके से जलवायु कार्रवाई की माँग को आगे बढ़ाना होगा

अपनी इस नई भूमिका में भविष्य में जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने की रणनीति साझा करते हुए अर्चना सोरेंग कहती है कि युवाओं के पास अलग-अलग कला है। कोई लिखने में अच्छा है, कोई गाने में अच्छा है और इसी के अनुरूप हमें कलात्मक तरीके से जलवायु कार्रवाई की माँग को आगे बढ़ाना होगा। दूसरा, सिर्फ एक स्तर पर हमें इसकी चर्चा नहीं करनी है बल्कि एकदम जमीनी स्तर से ऊपर के स्तर तक चर्चा करनी है। वहीं उनकी इच्छा है कि हम अगर जलवायु कार्रवाई गुट बना रहे हैं, तो हम गाँवों के स्तर से शुरू करें और फिर प्राँतीय, जिÞला, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचें, ताकि हर एक युवा इसमें शामिल हो। तीसरा, हमें अपने पूर्वजों के पास वापस जाना पड़ेगा, उनसे संस्कृति सीखनी पड़ेगी कि किस तरह से हम फ्रंटलाइनर बन पायें इस जलवायु कार्रवाई में ये देखना पड़ेगा और आखिर में, हम युवा फैसला करेंगे कि जलवायु कार्रवाई कैसे होगी क्योंकि आगे की पीढ़ी में हम लोग ही रहने वाले हैं इसलिये बहुत जरूरी है कि सभी हितधारक हमारी बात सुनें और उसे स्वीकार करें। 

मुझे आदिवासी होने पर है गर्व 

विश्व आदिवासी दिवस पर ये संदेश देते हुये अर्चना सोरेंग ने विश्व स्वदेशी लोगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस की शुभकामनाएं देते हुये कहा था कि मुझे आदिवासी होने पर गर्व है। मुझे वैश्विक स्वदेशी समुदाय का हिस्सा होने पर गर्व है। विश्व आदिवासी दिवस के दिन उन्होंने कहा था कि हमारे इतिहास, संस्कृति, परंपराओं और संघर्ष को खुश करने और मनाने का दिन है।
           प्रतिबिंबित करने के लिए एक दिन कि हम एक समुदाय के रूप में कितनी दूर आए हैं। यह हम हैं जो मानव जाति के कल्याण के लिए पृथ्वी और पूरी प्रकृति को संरक्षित कर रहे हैं। यह विश्व संगठनों द्वारा भी अच्छी तरह से स्थापित किया गया है। हमे दुनिया के हर प्रकार के संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए जाना जाता है ।
         यह एक दिन है, हमें पिछली कई पीढ़ियों से निभा रहे भूमिका को प्रतिबिंबित करने की आवश्यकता है, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संरक्षण के लिए जो दुनिया की प्रकृति और जलवायु को संतुलित कर रहा है। आइए हम अपनी भूमिका और कार्यों का आकलन करें और हमारे योगदान की जांच करें और यह भी देखें कि हमारे पास कमिंग्स कहाँ हैं और अंतत: सुधारें जहां हम विफल रहे हैं। हमें सबसे पहले स्वदेशी समुदायों और इसमें सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक के साथ सभी तत्वों पर गर्व होना चाहिए और दुनिया को बनाए रखने में हमारी अच्छी तरह से स्थापित भूमिकाओं को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्प लें।

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