Tuesday, November 17, 2020

1500 आदिवासियों का बर्बर हत्याकांड आज भी मुख्यधारा और इतिहास में दर्ज नहीं हुआ

1500 आदिवासियों का बर्बर हत्याकांड आज भी मुख्यधारा और इतिहास में दर्ज नहीं हुआ 

मानगढ़ पहाडी पर आदिवासी हत्याकांड-17 नवम्बंर,1913

जलियांवाला हत्याकांड इतिहास और सबकी जुबान पर है लेकिन मानगढ़ हत्याकांड (नरसंहार) के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं

दोनों हत्यााकांडों में देश के लोग ही मातृभूमि को बचाने के लिए कुर्बान हुए हैं


विशेष लेख-प्रस्तुतकर्ता 
डॉ. हीरा मीणा
पूर्व सहायक प्रोफेसर, दिल्लीी विश्ववविद्यालय
वर्तमान संप्रति-स्वतंत्र लेखन एवं आदिवासी रचनाकार
मोबाइल नं. 9910832689

 भारत के इतिहास का मानगढ़ आदिवासी हत्याहकांड राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमा पर अरावली पर्वत श्रृंखला में दफन रहा है। स्थानीय रियासतों और ब्रिटिश सरकार की कारगुजारियों से आदिवासियों का बर्बर हत्या कांड आज भी मुख्यधारा और उसके इतिहास में दर्ज नहीं हुआ हैं। आजादी के 73 साल बाद भी देश की गुलामी के खिलाफ लड़ने वालों और बलिदान देने वालों को इतिहास में ठीक से अंकित नही किया, 107 साल पुरानी आदिवासी समाज की बहुत बड़ी कुबार्नी का प्रमुख क्षेत्र मानगढ़ पहाड़ी हैं। राजस्थान के बॉंसवाड़ा और कुछ गुजरात में अरावली पर्वत श्रृंखला पर स्थित है, मानगढ 1500 से भी अधिक आदिवासियों का बलिदान/हत्याडकांड स्थंल हैं। जिसे मानगढ़ धाम के नाम से भी जाना जाता है । 

 गोला-बारूद, गोली-बंदूकों के द्वारा नृशंस हत्याकांड किया गया था


17 नवम्‍बर 1913 में राजस्थान के मानगढ़ पहाड़ी पर भील, गरारिया, मीणा, सहरिया, बंजारा आदिवासियों के शांतिपूर्ण धूणी कार्यक्रम के विशाल आयोजन पर स्थानीय रजवाड़ों के इशारों पर ब्रिटिश सरकार की फौज द्वारा गोला-बारूद, गोली-बंदूकों के द्वारा नृशंस हत्याकांड किया गया था। इस धूणी कार्यक्रम में समाज सुधार संबंधी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आदिवासी बच्चें, स्त्रियॉं, युवा और बुजुर्गों ने हजारों की तादात में भाग लिया था। यह कार्यक्रम सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और समाज सुधार से संबंधित था। इसी कारण लोगों ने परिवार सहित भारी संख्याा में भाग लिया था। गोविन्दा गुरू की धुणी पर लगभग 30 हजार से भी अधिक आदिवासीजन शामिल हुए थे। 

 निहत्थे आदिवासियों का नरसंहार किया गया था


17 नवम्बर,1913 को मानगढ़ पहाड़ी बांसवाड़ा, डूंगरपुर के शासक स्थानीय रजवाड़ों, जगीरदार और ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों पर घुड़सवारों, हजारों पैदल सैनिकों आधुनिक हथियारों के साथ बंदूकें, गोला-बारूद और तोपों के साथ पहाड़ी को तीनों और से घेरकर निहत्थे आदिवासियों का नरसंहार किया गया था। इस हत्याकांड में 1500 से भी अधिक आदिवासी निर्दयता पूर्वक मारे गये थें। हजारों की संख्या में गंभीर रूप से घायल और लहुलूहान हुए थे। 

गोविन्द गुरू ने भीलों के बीच समाज सुधार आंदोलन 1830 के दशक में शुरू किया था

समाज सुधारक गोविन्द गुरू के नेतृत्व के साथ समाज में जनजागृति कार्यक्रमों और सम्मेलनों का आयोजन होता रहता था। गॉव-गॉंव में पाठशाला खोलकर बच्चो और बड़ों को शिक्षित करने के साथ प्रमुख रूप से अशिक्षा दूर करना, झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं करना, मांस मदिरा का सेवन त्यागना, प्रकृति धर्म और स्वच्छता को बढ़ावा देना, बैठ बैगार, बंधुआ मजदूरी, लगान, शोषण व उत्पीड़न को लेकर विचार मंथन होता था। खेती, मजदूरी करके परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाने पर विशेष जोर होता था। गोविन्द गुरू ने भीलों के बीच समाज सुधार आंदोलन 1830 के दशक में शुरू किया था। जन-जन तक इस आंदोलन को पहुँचाने के लिए हवन-धूणी का संदेश पहुँचाया जाता था। गोविंद गुरू के आंदोलन में धूणी के रूप में अग्नि देवता को प्रतीक माना था। समाज के लोगों को बुराइयों को मिटाने, व्यसन छोड़ने और सद्विचारों के साथ जिन्दगी जीने की शपथ या प्रेरणा इसी धुणी से मिलती थी। आदिवासी समाज के लोग गोविन्द गुरू के आदर्शों और नेक नीतियों से काफी प्रभावित हो रहे थे। उनका समाज सुधार का कारवां राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के आदिवासियों को करीब लाकर एकजुट कर रहा था।

अंग्रेजों के सामने 33 मांगे रखीं

संप सभा की स्थापना 1883 में हुई थी। भीली भाषा में संप का अर्थ होता हैं ''भाईचारा, एकता और प्रेम'' संप सभा के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों में जनजागरूकता और समाज सुधार कार्यक्रम चलाये जा रहे थे । गोविन्दय गुरू ने 1903 में अपनी धुणी मानगढ़ पहाड़ी पर जमाई थी। गोविन्द गुरू के नेतृत्व में सभी आदिवासियों की दयनीय और शोषणकारी स्थिति का जायजा लेकर अंग्रेजों के सामने 33 मांगे रखीं, जिसमें मुख्य मांगें अंग्रेजों और स्थानीय रजवाड़ों द्वारा किये जा रहे शोषण, दमन और अत्याचारों के खिलाफ थी, जिसमें बैठ बैगार, बंधुआ मजदूरी, भूमि या उपज पर भारी लगान को खत्मर करने की थी ।
 

जन चेतना और शिक्षा के प्रचार-प्रसार से स्थांनीय रजवाड़ों में खौफ बैठ रहा था 


आदिवासियों की जायज मांगे नहीं मानने के कारण गोविन्दर गुरू ने अपने अनुयायियों के साथ मानगढ़ टेकरी पहाड़ी पर रहना शुरू कर दिया। आदिवासी संगठित होकर एक बड़ी जन शक्ति बन गये। उनका कारवां बढ़ता जा रहा था, इसी कारण स्थानीय राजपूत शासक और जागीरदारों की चूलें हिलनें लगी थी। जन चेतना और शिक्षा के प्रचार-प्रसार से स्थांनीय रजवाड़ों में खौफ बैठ रहा था कि पढें-लिखें आदिवासी उनके शोषण और अत्याचारों का विरोध करेंगे और विगत इतिहास का पता चलने पर वे अपनी पुरखो के गणराज्यों को प्राप्त करने की पूरी कोशिश भी करेंगे। धूणी कार्यक्रम से गोविन्द गुरू के सानिध्य में आदि‍वासियों में जन चेतना का व्योपक प्रचार-प्रसार हो रहा था। उनके साथ सभी आदिवासी संगठित होकर अपने हक अधिकारों के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे। 

भील, सहरिया, मीणा, गरासिया, बंजारा आदि समुदायों का काफिला बढ़ता गया


हजारों की संख्या में भील, सहरिया, मीणा, गरासिया, बंजारा आदि समुदायों का काफिला बढ़ता गया। स्थानीय शासन के सामंतों और रजवाड़ो ने ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाकर आदिवासियों के खिलाफ भड़का दिया और 15 नवम्बर को विभिन्न फौजी दस्तों के कमाण्डर मेजर वेली ने मेवाड़ भील कोर कमाण्डेंट जे पी स्टो क्लेिनवीं राजपूत के कमाण्डेंट कैप्टी्न आइस कोह एवं जाट रेजीमेंट की कम्पनी के कमाण्डेंट से सैनिक कार्यवाही के दौरानी अपनायी जाने वाली रणनीति पर दिनभर दो सत्रों में चर्चा की। वहीं 17 नवंबर 1913 को कैप्टीन स्टोरक्लेर के आदेश पर मेवाड़ भील कोर, नवीं राजपूत कंपनी, वेल्स ले रायफल्सं की एक कंपनी, बांसवाडा राज्य के 100 घुड़सवार, स्थानीय रजवाड़े, जागीरदारों ने सुबह 3-4 बजे फौजी दस्तों के साथ आदिवासियों का निर्दयतापूर्वक नरसंहार कर दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा गोविन्द गुरू के शांतिपूर्ण कार्यक्रम में निहत्थे, निरापराधी लोगों को मौत के घाट उतारा गया, इसमें बच्चेंं, महिलाएं, बुजुर्ग, युवा हजारों की तादात में शामिल थे। 

गोविन्द गुरू का देशभक्ति आह्वान का लोकप्रिय जन गीत

बड़े-बुजुर्गों की तीसरी चौथी पीढ़ी के मुख से आज भी उस हत्याकांड को लोकगीतों-लोकथाओं के माध्यम से सुना जा सकता हैं। राजस्थान गुजरात में गोविन्द गुरू के धुणी धाम आज भी जन चेतना के साथ उस दारूण महागाथा को बयां करते नजर आ रहे हैं। गोविन्द गुरू का देशभक्ति आह्वान का लोकप्रिय जन गीत इस प्रकार है। 

झालोद मांय मारी कुंडी है 

दाहोद मांय मारो दीयो है 

भूरेटिया नी मानू रे, नी मानू 

गोधरा मांय मारी जाजम है, 

अहमदाबाद मांय बैठक हैं।

भूरेटिया नी मानू रे, नी मानू 

दिल्ली मांय मारी गादी है

बेणेश्वार मांय मारो चोपड़ो है 

मानगढ़ मारी धूणी है

भूरेटिया नी मानू रे,  नी मानू 

जाम्बूय में मारो अखाड़ो है 

मानगढ़ मारो वेरा है 

वेरा ने वाली ने पंचायत राज करबू है 

भूरेटिया नी मानू रे,  नी मानू 

भूरेटिया अर्थात फिरंगियों को वे अपना असली दुश्मन मानते थे 

प्रसिद्ध वरिष्ठ आदिवासी साहित्यककार हरिराम मीणा के अनुसार गोविंद गुरू वागड़ प्रदेश को ही जम्बूद खंड मानते थे। भूरेटिया अर्थात फिरंगियों को वे अपना असली दुश्मनन मानते थे चूंकि उन्हीं के कारण देशी राजाओं ने आदिवासी विरोधी नीतियां लागू की थी। जाग्रती आंदोलन का प्रमुख केंद्र मानगढ़ ही बन गया था। अंग्रेजों का सत्ता केंद्र दिल्ली था, इस गीत से संकेत मिलते हैं कि गोविंद गुरू का अन्तिम लक्ष्य दिल्ली की गद्दी था अर्थात अंग्रेजी राज का खात्मा। उनका सपना था भविष्य में आदिवासी पंचायत राज करें। उनकी विचारधारा का केंद्रीय भाव आदिवासियों को कष्टों से मुक्ति दिलाना था।  यह राजस्थान के आदिवासी समाज का बहुत बड़ा हत्याकांड है, जो जलियांवाला हत्या कांड (13 अप्रैल, 1919) से 6 वर्ष पूर्व 17 नवम्ब्र, 1913 में घटित हुआ था। जलियांवाला हत्या कांड में 400 लोगों को और मानगढ़ हत्याकांड में 1500 से भी ज्याादा लोगों को मौत के घाट उतारा गया था। सैकडों, हजारों की संख्या में लोग गंभीर रूप से जख्मीं हुए थे, दोनों हत्याकांड बेहद क्रूर और अमावीय थे। प्रशासन के इशारों से अंजाम दिये गये थे। जलियांवाला हत्याकांड इतिहास और सबकी जुबान पर है लेकिन मानगढ़ हत्याकांड (नरसंहार) के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं । दोनों हत्यााकांडों में देश के लोग ही मातृभूमि को बचाने के लिए कुर्बान हुए हैं । 

इतिहास को महत्व  देकर हम वर्तमान और भविष्य  को बेहतर गढ़ सकते है 

आज हम स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश के सात दशक देख चुकें है । अब हम सबको पूर्वजों के इतिहास को सम्मान के साथ दर्ज करके आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरवशाली धरोहर सहेजनी चाहिए। साहित्य समाज का दर्पण होता हैं और इतिहास उसका भूतकाल इसीलिए इतिहास को महत्व  देकर हम वर्तमान और भविष्य  को बेहतर गढ़ सकते है। जिस समाज का इतिहास नहीं लिखा जाता, उसकी पहचान मिट जाती है। आदिवासियों के इतिहास से आप अतीत, साहित्य, संस्कृति, परंपराओं, बोलियो, भाषाओं के साथ अपनी और आने वाली पीढ़ियों की पहचान को संरक्षित दर्ज कर समाज की अमिट बनायेंगे।

बलिदानों की शौर्यगाथाओं को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए

आदिवासी समाज के नायक-नायिकाओं के संघर्षों और बलिदानों को उचित सम्मान के साथ उनकी गौरव गाथा को साहित्य, इतिहास और पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाना चाहिए। बच्चों और युवकों को प्रोत्सािहित करने के‍ लिए इनके नामों से पुरस्कार दिए जाने चाहिए। देश के लिए बलिदान होने वाले नायक और नायिकाओं की गौरवगाथाओं के साथ स्थानीय, राज्य और राष्‍ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी चाहिए। उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर विशेष कार्यक्रमों के द्वारा उनके व्यक्तित्व, संघर्षों और बलिदानों की शौर्यगाथाओं को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। जय आदिवासी ।। जय जोहार ।। जय मूलवासी ।।


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