Saturday, December 25, 2021

घंसौर विधानसभा समाप्त कर पंचायती राज में भी आदिवासियों का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीनने का षडयंत्र क्यों ?

घंसौर विधानसभा समाप्त कर पंचायती राज में भी आदिवासियों का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीनने का षडयंत्र क्यों ?

अपना ही अधिकार लेने में क्यों पीछे है आदिवासी समाज व नेतृत्वकर्ता


सिवनी/घंसौर। गोंडवाना समय।

अनुसूचित क्षेत्र घंसौर ब्लॉक में आदिवासी समाज की बाहुल्यता है, इसी आधार पर घंसौर विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित थी लेकिन परिसीमन की आड़ में घंसौर विधानसभा सीट समाप्त कर आदिवासियों का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीन लिया गया।
       


घँसौर विधानसभा सीट को समाप्त कर घंसौर ब्लॉक को लखनादौन विधानसभा क्षेत्र में जोड़ दिया गया है, जबकि लखनादौन भी पहले से ही अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित थी इस आधार पर लखनादौन व घँसौर दो विधानसभा क्षेत्र आदिवासी समाज के लिये जनप्रतिनिधित्व का अधिकार सुरक्षित था। 

आदिवासी समाज का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीनने में सहभागी बनकर शोषणकारियों का दे रहे साथ 


इसी तरह हम पंचायती राज के तहत मिलने जनप्रतिनिधित्व के अधिकार में आदिवासी वर्ग के साथ छलावा षडयंत्र होते रहा है। इसके खिलाफ आवाज उठाने के लिये अन्य दलों के वे जनप्रतिनिधि जो आदिवासी आरक्षित क्षेत्र से चुनाव जीतकर आदिवासी समाज का मताधिकार पाकर सांसद-विधायक बनकर जनप्रतिनिधित्व का अधिकार पाने में तो सफल हो गये लेकिन घंसौर विधानसभा सीट समाप्त होने पर बुलंद आवाज नहीं उठा पाये।             इसके बाद आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक घंसौर में पंचायती राज में भी आदिवासियों से उनके जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीनने का षडयंत्र किया गया लेकिन आदिवासी समाज के वरिष्ठ नेतृत्वकर्ता तो मौन ही रहे वहीं आदिवासी के नाम पर राजनीति करने वाले राजनैतिक दल के नेतागणों ने भी अपना मुंह खोलना उचित नहीं समझा और न ही इसके लिये कागजी आंदोलन या सड़कों पर अपना विरोध दर्ज कराने का साहस जुटाया आखिर क्यों ?     
        अपने ही अधिकार को प्राप्त करने के लिये आदिवासी समाज के नेतृत्वकर्ता पीछे रहे इसके पीछे क्या कारण यह सवाल उठ रहा है जिसका जवाब आदिवासी नेतृत्वकर्ताओं के पास ही लेकिन जानबूझकर अपने ही आदिवासी समाज का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार छीनने में सहभागी बनकर शोषणकारियों का साथ दे रहे है। 

आदिवासी समाज का भविष्य और विकास किसके सहारे आदिवासी क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ता करना चाहते है

आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक घंसौर में जिला पंचायत की 2 सीट है जिसमें एक सीट अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित है और एक सीट सामान्य है। अब सवाल यह उठता है कि आदिवासी ब्लॉक घंसौर में जहां पर आदिवासी वर्ग की सर्वाधिक मतदाता संख्या भी है और जनसंख्या भी है। इसके बाद भी कैसे जिला पंचायत की सीट सामान्य हो गई।
        इस दौरान आदिवासी वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों ने तो पंचायती राज में आदिवासी समाज के जनप्रनिधित्व अधिकार समाप्त होने पर कोई सवाल नहीं उठाया वहीं आदिवासी के हक अधिकार के नाम पर राजनीति करने वाले राजनैतिक दल के क्षेत्रिय नेतृत्वकर्ता भी मौनधारण करते आ रहे है और आज भी मुंह अपने समाज के विरोध में बंद कर 5 वोट वाले को जिताकर सर पर बैठालने के लिये आवाज बुलंद कर रहे है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आदिवासी समाज का भविष्य और विकास किसके सहारे आदिवासी क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ता करना चाहते है। 

अब आदिवासी युवा और आदिवासी समाजिक संगठन से ही है उम्मीद 

आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक घंसौर में आदिवासी समाज के हक अधिकार के लिये आदिवासियों के जनप्रतिनिधित्व के अधिकार को बचाने के लिये और आदिवासी समाज के मान-सम्मान-स्वाभिमान को बचाने के लिये जागरूक आदिवासी युवाओं को आगे आने की सबसे ज्यादा जरूरत है उन्हें यह समझना होगा कि हमारे समाज का विकास कौन कर सकता है हमारे समाज का व्यक्ति या शोषणकारी ताकत के रूप में पहचान बनाने वाला व्यक्ति है इसका निर्णय करने का सही वक्त है।
            वहीं घंसौर ब्लॉक में आदिवासी समाज के संवैधानिक हक अधिकारों के लिये आदिवासी समाजिक संगठन के पदाधिकारी गांव-गांव में संवैधानिक अधिकारों की अलख जगाकर जनजागरूकता लाने की कोशिश निरंतर कर रहे है जिससे गांव-गांव में आदिवासी समाज में जागरूकता अपने हक अधिकारों के प्रति आ रही है। इसके साथ ही आदिवासी समाजिक संगठन के पदाधिकारी चाहे तो आदिवासी समाज का जनप्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त करने में बड़ी भूमिका निभाकर समाजिक जिम्मेदारी व जवाबदारी निभा सकते है। 

जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा देने वालों पर उठ रहे सवाल

आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक घंसौर में ही नहीं आदिवासी समाज के नाम पर राजनीति करने वाले नेतृत्वकर्ता मंच पर, सम्मेलन व कार्यक्रम में बड़े-बड़े जोर से नारे लगाते है, सोशल मीडिया में लिखकर डालते है कि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी लेकिन जब जनप्रतिनिधित्व का अधिकार देने की बात आती है तो 5 वोट वाले को अगुआ बनाकर अपने ही समाज की बागडोर का विकास सौंपने को तैयार हो जाते है आखिर क्यों ?             देखा जाये तो आदिवासी समाज में ही जनप्रितधित्व करने वालों की योग्य व्यक्तियों की कमी नहीं है लेकिन उसके बाद भी 5 वोट वाले को ही अगुआ बनाने का तैयार है। इस आधार पर जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा देने वालों से जागरूक आदिवासी युवा वर्ग सवाल पूछ रहा है कि आखिर आदिवासी नेतृत्वकर्ताओं को 5 वोट वाले अगुआ बनाकर नेतृत्व सौंपने के पीछे कौन सा लाभ हो रहा है।  



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