Thursday, December 9, 2021

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति भारतीय समाज के अभिन्न अंग हैं पर इन श्रमजीवी समूहों को मूलभूत मानव अधिकारों से रखा गया वंचित

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति भारतीय समाज के अभिन्न अंग हैं पर इन श्रमजीवी समूहों को मूलभूत मानव अधिकारों से रखा गया वंचित

मानव अधिकार दिवस, रूप रेखा व जन आंदोलन का वर्तमान परिदृश्य 


आलेख-
सम्मल सिंह मरकाम
वनग्राम- जंगलीखेड़ा,
गढ़ी, बैहर, जिला बालाघाट (म प्र)

भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है। जिसके आलोक में वह अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का निर्वहन करता हुआ एक अप्रतिम सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करता है। अपनी इस सर्वांगीण विकास यात्रा में वह कुछ अधिकारों को अंगीकृत कर आगे बढ़ता है, जिन्हे मानव अधिकारों के रूप मे जाना जाता है। भारतीय समाज मे मानवाधिकार संबंधी महत्वपूर्ण सिद्धांत आरंभ काल से ही आत्मसात कर लिए गये थे। सदियों से हमारी संस्कृति विरासत में संजोयी आदर्श समाज की संकल्पना निरूतर एक नये संदेश के साथ हमारे समक्ष विराजमान रहती है। हमारे यहां संपूर्ण विश्व को एक परिवार या कुटुम्ब माना जाता है ।

मूलवंश, लिंग, भाषा का विभेद किए बिना मानव अधिकारों की रक्षा की जाए

मानव अधिकार को उद्धृत करता हुआ प्रथम लिखित साक्ष्य 1215 ई मे पारित मेग्नाकार्टा, 1628 के अधिकार याचिका-पत्र, 1679 बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम, 1950 मे भारत, 1954 मे चीन मे नागरिक अधिकारो की घोषणा की गयी, को माना जाता है जिसमें कुछ मूलभूत अधिकार प्रदत्त किए जाने की बात कही गयी है । (डॉ झरौटिया 2018, मानव अधिकार शिक्षा) वर्तमान मानव अधिकार का स्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात से माना जाता है। विश्व स्तर पर मानव अधिकार की रक्षा व शांति कायम करने के उद्देश्य से 24 अक्टूबर 1945 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गयी और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारों का अंतर्राष्ट्रीय बिल प्रस्तुत किया गया। समस्त बड़े व छोटे राष्ट्र की समानता और सदस्य देशों के मूल मानव अधिकार की गरिमा, धर्म के आधार पर विभेद किए बिना स्वतंत्रता के प्रति सम्मान करने का उद्देश्य रखा गया। व्यवस्था यह की गयी कि मूलवंश, लिंग, भाषा का विभेद किए बिना मानव अधिकारों की रक्षा की जाए। मुख्य रूप से मानव की गरिमा, समान अधिकार, न्याय और सामाजिक उन्नति एवं मूल स्वतंत्रता का संरक्षण करने की व्यवस्था की गयी।

घोषणा का सरकारी पाठ अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसिसी, रूशी और स्पेनिश भाषाओं में प्राप्त है

इसके पश्चात संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकार आयोग द्वारा तैयार प्रारूप को आर्थिक तथा सामाजिक परिवेश में स्वीकार कर, दिनांक 10 दिसंबर, 1948 को सार्वभौमिक मानव अधिकार घोषणा, के रूप में अंगीकार किया गया एवं 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार दिवस घोषित किया गया। घोषणा पत्र में जिन मानव अधिकारों की चर्चा की गयी है उन्हे मान्यता देने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1965, 1976 तथा 1985 तीन विभिन्न संविदा पत्र जारी किए। इसे समस्त सदस्य देशों ने स्वीकार किया। इसमें मानव अधिकार का वृहद् रूप में वर्णन किया गया, जिसका मुख्य अंश इस प्रकार है- ''प्रत्येक मनुष्य का जीवन, स्वाधीनता, मनमानीपूर्वक गिरफ्तारी से रोक, आवागमन एवं निवास की राष्ट्रीयता का अधिकार, सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार, विचार एवं अभिव्यक्ति तथा धर्म की स्वतंत्रता, मताधिकार की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सम्मेलन, सामाजिक सुरक्षा के अधिकार,के साथ ही साथ पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार सम्मिलित है।'' इस घोषणा का सरकारी पाठ संयुक्त राष्ट्र की इन पांच भाषाओं में प्राप्त है- अंग्रेजी, चीनी, फ्रांसिसी, रूशी और स्पेनिश। 

केवल भारत मे ही मानव इतिहास की सबसे मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री खजाने के रूप में सहेजी गई है

हमारा भारत वर्ष भी 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ मानव अधिकार घोषणा पर हस्ताक्षर करने के साथ ही इसके कई अभिसमयों का एक पक्षकार है तथा मानव अधिकार सुनिश्चित करने में अग्रणी है। 16 दिसंबर 1966 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा अंगीकृत सार्वभौमिक घोषणा पत्र के अनुच्छेद 01 से 30 तक आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता दी गयी है। हमारा भारत मानव अधिकारों के लिए 1966 में स्थापित एशिया प्रशांत मंच, का भी एक सदस्य है। जो क्षेत्र में राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थानों के गठन एवं उन्हे मजबूत करने का समर्थन करता है। (पृष्ठ भूमि से-मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993), भारत मानव जाति के विकास का उद्गम स्थल तथा मानव बोली का जन्म स्थान है और साथ ही साथ यह देश गाथाओं और प्रचलित परंपराओं का कर्मस्थल तथा इतिहास का जनक है । केवल भारत मे ही मानव इतिहास की सबसे मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री खजाने के रूप में सहेजी गई है- मार्कट्वैन । (भारत 2012- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार) 

संविधान की उद्देशिका का मानव मूल्यों की रक्षा के लिए विशेष महत्व है

भारतीय संस्कृति और सभ्यता बेमिसाल है फिर मानव अधिकार संरक्षण पर देश का कदम कैसे पीछे हो सकता है। वहीं 1947 को भारत आजाद हुआ। जिन उद्देश्यों को लेकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी गयी थी, यह कमोबेश मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए उपर्युक्त उदाहरण है। संविधान की उद्देशिका का मानव मूल्यों की रक्षा के लिए विशेष महत्व है। भारतीय संविधान की उद्देशिका से ही इस बात की झलक मिलती है कि संविधान इनके लिए कृत संकल्पित है। मानव अधिकारों को भारतीय संविधान के भाग-3  में मूल अधिकारों एवं भाग-4 में राज्य के नीति निर्देशक तत्व के रूप में अंगीकृत एवं प्रावधानित किया गया है । प्रत्येक नागरिक को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण  का अधिकार प्रदान किया गया है।

मानव अधिकार अधिनियम भारत मे मानव अधिकारों के संरक्षण का मुख्य सैद्धांतिक आधार है

कालांतर मे वर्ष 1976 में संविधान संशोधन द्वारा भाग-4 क जोड़ा गया जो भारतीय नागरिकों के मूल कर्तव्यों को उल्लेखित करता है। मानव अधिकार की परिभाषा दो महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी ऐतिहासिक घोषणाओं से प्रेरित है-(1) अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा (1776) तथा (2) फ्रांस के मनुष्य एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा (1789)।  उल्लेखनीय है कि दोनो घोषणाएं निरंकुश शासन को समाप्त करने एवं सभी व्यक्तियों की स्वतंत्रताओं की रक्षा करने हेतु तैयार की गयी थी। जब मानव अधिकारों का हनन हुआ तो कानून मानव अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने हेतु, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993, पारित किया गया। भारतीय संसद द्वारा 1993 में पारित मानव अधिकार अधिनियम भारत मे मानव अधिकारों के संरक्षण का मुख्य सैद्धांतिक आधार है। यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद- 51 के अधीन दिए गये निदेर्शों के अनुकरण में और वियना सम्मेलन मे दिए गए भारत के वचन को ध्यान मे रखते हुए निर्मित किया गया है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना की व्यवस्था की गयी है

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा -3 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना की व्यवस्था की गयी है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग , संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंगीकार अधिकारों के संरक्षण व संवर्धन के लिए गठित राष्ट्रीय संस्थाओं व पेरिस सिद्धांतो के पूर्णतया अनुरूप है। यह मानव अधिकार के पृथक-पृथक मुद्दों पर विचार करने में स्वतंत्र है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को व्यवहार प्रक्रिया संहिता 1908 के अधीन किसी मामले में सुनवाई करने के लिए व्यवहार न्यायालय को प्रदत्त समस्त शक्तियां, यथा साक्षियों को बुलाने, साक्ष्य लेने, किसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने शपथ पत्रो पर साक्ष्य ग्रहण करने , किसी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजनिक दस्तावेज या उसकी प्रति मांग करने, साक्षियों व दस्तावेजों की जांच के आदेश देने की शक्ति प्राप्त होती है। भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष होते हैं। वहीं 4 पूर्ण कालिक व 4 मानद सदस्यों से गठन होता है । जिसमें, अध्यक्ष - राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग , अध्यक्ष - राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, आध्यक्ष- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग , एवं अध्यक्ष- राष्ट्रीय महिला आयोग, मानद सदस्य होते हैं।

म प्र राज्य मानव अधिकार आयोग गठन करने वाले अग्रणी राज्य मे शामिल है 

वही अधिनियम की धारा-21 में राज्य मानव अधिकार आयोग के गठन को उपबंधित किया है। जिसके अनुसार राज्य सरकार,राज्य आयोग को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए और सौंपे गये कृत्यों का पालन करने के लिए एक निकाय बना सकेगी, जिसका नाम राज्य मानव अधिकार आयोग होगा। अब तक केवल 20 राज्यों ने अपने यहां राज्य मानव अधिकार आयोग की स्थापना की है । म प्र राज्य मानव अधिकार आयोग गठन करने वाले अग्रणी राज्य मे शामिल है, म प्र में मानव अधिकार आयोग का गठन सितम्बर 1995 मे किया गया। राज्य मानव अधिकार आयोग केवल संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 और सूची 3 मे प्रगणित प्रविष्ठियों मे से किसी से संबंधित विषयों की बाबत मानव अधिकारों के अतिक्रमण किए जाने की जांच कर सकेगा। यदि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग आवश्यक व समीचीन समझे तो किसी लंबित या अन्य विषय को प्रावधान अनुसार निराकरण के लिए राज्य को अंतरित कर सकता है। राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष व सदस्यो की नियुक्ति प्रदेश के महामहिम राज्यपाल चयन समिति की अनुशंसा पर करते हैं। अध्यक्ष वह होता है जो किसी माननीय उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा हो। राज्य मानव अधिकार आयोग (प्रक्रिया) विनियम 1996 के माध्यम से प्रक्रियागत होती है ।

संवैधानिक प्रावधानों के लिए जन आंदोलन लगातार हो रहे हैं


मानव अधिकारों की रक्षा के इस क्रम मे संसद द्वारा अनुसूचित जाति, जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 प्रभावशील किया गया है। इस अधिनियम का क्रियान्वयन नागरिक अधिकार संरक्षण प्रकोष्ट द्वारा किया जाता है। इसके क्रियान्वयन के लिए विशेष न्यायालय स्थापना के प्रावधान हैं-अधिसूचना दिनांक 16/10/1998 द्वारा 10 विशेष न्यायालय की स्थापना की गयी जिला -मण्डला भी सम्मिलित है। अधिसूचना दिनांक 07/05/1999 द्वारा भी 10 विशेष न्यायालय स्थापित किये गये जिसमें जिला झाबुआ में विशेष न्यायालय सम्मिलित है। उपरोक्त विषय पर लक्ष्याकेंद्रित किया जाना आवश्यक है क्योंकि वर्तमान मे लगातार भारतीय गणतंत्र के 70 वर्षों बाद भी देश के विभिन्न प्रदेशों यथा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, असम, राजस्थान, गुजरात, उत्तर पूर्वी राज्यों और तेलंगाना प्रदेश के विभिन्न अंचलों में संवैधानिक प्रावधानों के लिए जन आंदोलन लगातार हो रहे हैं, यह जनता की जागरूकता का परिचय है, वहीं उससे ज्यादा गणतांत्रिक राष्ट्र में लगातार अत्याचार, शोषण, लूटपाट, मूलभूत अधिकारों से वंचित, विस्थापन, भूखमरी, बेरोजगारी, बेकारी, संवैधानिक अधिकारों का हनन, नियमों का व्यतिक्रम, धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक अधिकारों पर प्रहार आदि के लगातार बढते प्रतिशत, और मानव अधिकार संरक्षण की धरातल पर पूर्ण क्रियान्वयन न हो पाना जैसे ज्वलंत समस्याओं का परिणाम परिलक्षित होता है ।

इस कलंक को समूल मिटाना भारतीय गणतंत्र का एक पवित्र कर्तव्य है 

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति भारतीय समाज के अभिन्न अंग हैं पर भारतीय समाज में सदियो से इन श्रमजीवी समूहों को मूल-भूत मानव अधिकारों से वंचित रखा गया है पर स्वतंत्र भारत ने इन समूहों को वे सारे अधिकार वापस करने का निर्णय लिया जिन्हे कभी इतिहास के क्रूर नियमों ने छीन लिया था। संवैधानिक रूप से अधिकार सम्पन्न इन सामाजिक समूहो को व्यवहारिक जीवन में आज भी इितहास की उस काली छाया में जीना पड़ता है, जो सभ्य समाज के माथे पर एक कलंक है। इस कलंक को समूल मिटाना भारतीय गणतंत्र का एक पवित्र कर्तव्य है । (म प्र जन संपर्क, म प्र सरकार की मार्गदर्शिका -2002)

अनिवार्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा

आज भी तमाम वैधानिक प्रावधानों के सम्मुख लगातार अधिकारों का यदि हनन हो रहा है, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा नहीं हो पा रही है तो हम इतिहास की काली परछाई को कैसे हटा पायेंगे, इसकी प्रतिबद्धता कौन लेगा ? और संवैधानिक न्याय के लिए कौन कृत संकल्प है ? यह आज के विचारणीय प्रश्न हमारे जेहन मे है। समस्त वंचित वर्गों एवं देशज समुदायों को संयुक्त राष्ट्र संघ की सार्वभौमिक घोषणा अनुसार मानव अधिकारों के रक्षार्थ पंचायत राज संस्थाओं, नगरीय निकायों, सहकारी संस्थाओं, मंडी कमेटियों, निजी क्षेत्रों, सार्वजनिक क्षेत्रों, शैक्षणिक दिशा में और व्यवसायिक क्षेत्र में अनिवार्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा, जिससे शासन प्रशासन में हिस्सेदारी सुनिश्चित ही नही बल्कि अपने परिवार, समाज, अपने गांव,अपनी बस्ती, अपने नगर , और प्रदेश और देश के निर्माण और सर्वांगीण विकास मे सहभागी हो सकें । 


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सम्मल सिंह मरकाम
वनग्राम- जंगलीखेड़ा,
गढ़ी, बैहर, जिला बालाघाट (म प्र)

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