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थोपूलालों को जिताने मजबूर मतदाता

थोपूलालों को जिताने मजबूर मतदाता 

राजनैतिक दलों के द्वारा थोपे गये अधिकृत उम्मीदवारों को ही वोट देना मतदाताओं की मजबूरी 

कोई भी राजनैतिक दल मतदाताओं से पूछकर नहीं देता विधानसभा की टिकिट क्यों ?


विवेक डेहरिया, संपादक,
दैनिक गोंडवाना समय

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले है इसके लिये सभी राजनीतिक दलों में कार्य करने वाले पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं के साथ साथ पैराशूट उम्मीदवारों को भी मतदाता के समक्ष राजनैतिक दल थोप देते है।
            


इसके आधार पर ही जागरूक, बुद्धिजीवि, शिक्षित, अशिक्षित सभी प्रकार के मतदाता उन थोपूलाल को अपना मताधिकार का प्रयोग करते हुये उन्हें विधायक बनाते है और विधायक बनने के बाद इनमें से ही मंत्री व मुख्यमंत्री तक बनते है।
            राजनीतिक दलों के द्वारा अपनी अपनी पार्टी में कार्य करने वाले पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं में से ही अधिकांशयत: टिकिट दिया जाता है या फिर अन्य दलों से आये लोगों को भी जीतने के उद्देश्य से टिकिट दे दिया जाता है। 

थोपूलाल को अपना मत देकर उसे विधायक बनाकर सदन तक भेजेंगे


आगामी समय में होने वाले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय व क्षेत्रिय राजनीतिक दलों के द्वारा विधानसभा चुनाव की तैयारी जमकर की जा रही है। धन दौलत रूपया खर्च करने की कोई सीमा नहीं नजर आ रही है। तिजोरी खोलकर खर्च किया जा रहा है।
                जनता व मतदाताओं को लुभावने वायदों में फंसाया जा रहा है। अनेकों योजनाएं संचालित की जा रही है और आगे इससे भी अच्छी फायदा वाली योजना हम देंगे यह कहकर जनता व मतदाताओं को अपनी ओर आकृषित किया जा रहा है।
            इसके साथ ही विधानसभा चुनाव कौन लड़ेगा, विधायक कौन होगा इसके लिये विधायक का उम्मीदवार की तलाश की जा रही है तो वहीं कुछ राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने भी अपने अधिकृत उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दिया है।
            वहीं अन्य राजनैतिक दल भी आगामी समय में मतदाताओं के सर पर अपना अधिकृत उम्मीदवार थोपकर उसे जिताने के लिये मजबूर करेंगे। मतदाताओं की भी मजबूरी है कि वह किसी न किसी राजनैतिक दल के थोपूलाल को अपना मत देकर उसे विधायक बनाकर सदन तक भेजेंगे। 

थोपूलाल योग्य हो या उस लायक भी न हो लेकिन विधायक बनाना मतदाताओं की मजबूरी है 

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों के द्वारा जिस भी उम्मीदवार को थोपा जाता है या टिकिट दिया जाता है या अपनी पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार घोषित किया जाता है उसे मतदाता अपना मत देता है वही विधायक बनता है।
            इसके साथ ही राजनीतिक दलों के सरकार बनाने वाली विचारधारा के आधार पर किसकी सरकार बनेगी, इनकी सरकार बनेगी इस आधार पर भी उसी राजनैतिक दल के थोपूलाल को मतदाता मजबूरी में अपना मत देता है क्योंकि प्रदेश में इस पार्टी की सरकार बन सकती है इसलिये इस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को वोट देते है। अब चाहे विधायक बनने वाला थोपूलाल योग्य हो या उस लायक भी न हो लेकिन थोपूलाल को विधायक बनाना मतदाताओं की मजबूरी है। 

समाजसेवकों को विधायक का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाते राजनैतिक दल ?

सभी राजनैतिक दल अपनी अपनी पार्टी के लिये कार्य करने वाले पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को टिकिट देते है। कभी कभार ही ऐसा होता है कि समाजिक संगठनों में कार्य करने वाले अच्छे समाजसेवक जो शिक्षित व क्षेत्र के विकास करने का साहस रखते है, जो कि विधानसभा के सदन में अपनी बात बेबाकी से रख सकते है उन्हें बहुत ही कम संख्या में राजनैतिक दलों के द्वारा उम्मीदवार बनाया जाता है।
             राजनैतक दलों के द्वारा अपने अधिकृत उम्मीदवारो ंसे वोट तो मांगा जाता है लेकिन उन मतदाताओं पूछकर पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार राजनैतिक दलों के द्वारा कम ही किया जाता है ऐसा क्यों होता है। राजनैतिक दलों के द्वारा कई बार ऐसे ऐसे थोपूलालों को विधानसभा की टिकिट दे दी जाती है जो न तो शिक्षित होते है, जिन्हेें न तो बोलना आता है और न ही अपने क्षेत्र के विकास के लिये वे सदन में बोल पाते है या विकास कार्य कराने में सक्षम होते है। जनता से भी जिनका संपर्क नहीं के बराबर होता है इसके बाद भी राजनैतिक दल उन्हें मतदाताओं के सर पर थोप देते है।  

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