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नरेश मरावी बने सिवनी जिÞला कांग्रेस अध्यक्ष

नरेश मरावी बने सिवनी जिÞला कांग्रेस अध्यक्ष 

महाकौशल में पहली बार आदिवासी वर्ग से बनाए गए पांच जिलाध्यक्ष 


सिवनी। गोंडवाना समय। 

लंबी प्रतीक्षा के बाद अंतत: अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा मध्य प्रदेश में सभी जिलों और बड़े जिलों में संगठन के नगर अध्यक्षों के नाम की सूची जारी कर दी गई है।
                घोषित सूची में महाकौशल क्षेत्र के प्रमुख राजनैतिक केंद्र सिवनी जिले में एक दशक के बाद अध्यक्ष पद में परिवर्तन करते हुए जिले और प्रदेश के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय ठाकुर हरवंश सिंह के स्नेहपात्र रहे ग्रामीण परिवेश के आदिवासी नेता नरेश मरावी को राजकुमार खुराना के स्थान पर जिले के संगठन की बागडोर सौंपी गई है। 

ग्राम चुटका के निवासी हैं उनके पिता पेशे से शिक्षक थे 

श्री नरेश मरावी स्व हरवंश सिंह के समय उनके प्रयासों के चलते सिवनी जैसी विशाल जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष का दायित्व निभा चुके हैं। यद्यपि उसके बाद वे लगातार दो बार वर्तमान बरघाट विधायक कमल मर्सकोले से जनपद सदस्य का चुनाव हार गए थे।
                मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त श्री नरेश मरावी कांग्रेस सेवादल के प्रदेश पदाधिकारी रहने के साथ ही वर्तमान में जिला कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। नरेश मरावी मूल रूप से केवलारी विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख राजनैतिक केंद्र कान्हीवाड़ा के निकट छोटे से ग्राम चुटका के निवासी हैं उनके पिता पेशे से शिक्षक थे।

सिवनी सहित बालाघाट, मंडला, डिंडोरी और पांढुर्णा जिले शामिल हैं 

कांग्रेस पार्टी द्वारा जारी सूची पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया जाए तो साफ दिखाई देता है कि पहली बार पार्टी ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रभाव वाले महाकौशल क्षेत्र में पांच जिलों के अध्यक्ष आदिवासी वर्ग से बनाए है जिनमें सिवनी सहित बालाघाट, मंडला, डिंडोरी और पांढुर्णा जिले शामिल हैं,जो पार्टी की अत्यंत सोची समझी रणनीति का अंग माना जा सकता है यह अलग बात है कि अब ये नेता पार्टी की उस रणनीति में कितने उपयोगी सिद्ध हो पाते हैं।
                सिवनी जिले में ज्ञात इतिहास में पहली बार किसी आदिवासी को यह दायित्व मिला है जिस से उस समाज में हर्ष व्याप्त होना स्वाभाविक है किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि  शहर की राजनीति के साथ गुटबाजी की आदी हो चुकी कांग्रेस पार्टी के  लोग ग्रामीण क्षेत्र के किसी आदिवासी नेता का नेतृत्व किस सीमा तक स्वीकार कर पाते हैं?

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