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ई- टोकन का कमाल, किसान बेहाल, अपनी पीठ थपथपाती सरकार और अफसर

 ई- टोकन का कमाल, किसान बेहाल, अपनी पीठ थपथपाती सरकार और अफसर 

पहले फास्फेटिक उर्वरक खरीदने का दबाव किसान के लिए शोषण जैसा बर्ताव 

कृषि विभाग प्राइवेट एवं सरकारी खाद वितरण में क्यों फर्क कर रहे हैं ?

बिना कोई शोध किये व्यवस्था लागू कर दी गई जो किसानों के लिए बन रही नासूर 

सिवनी। गोंडवाना समय। 

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 22 मार्च 2026 से खाद वितरण हेतु नई व्यवस्था लागू की गई है जिसे ई विकास प्रणाली का नाम दिया गया है। जिसके माध्यम से कृषि रकबा के आधार पर किसानों को खाद देने का प्रावधान नियत किया गया है।
            


खाद लेने की व्यवस्था के लिए सरकार द्वारा किसानों की जमीन की फार्मर आईडी राजस्व विभाग बनवाई गई है लेकिन बहुत से जमीनो इसमें जोड़ने से बची हुई है जिसके कारण किसान को खाद लेने में समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसमें धरातल पर जो समस्यायें किसानों को आ रही है, किसान किस तरह से परेशान हो रहे है, प्रताड़ित हो रहे है।
            इसकी जानकारी धरातल पर लेने को केंद्र सरकार के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव संवेदनशीलता के साथ गंभीर नहीं है। अफसरों के कागजी घोड़ो, विभागीय आंकड़ों के आगे और किसानों की योजनाओं में आयोजनों में टारगेट देकर ढोकर लाने वाली भीड़ को देखकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है और अफसर की ड्यूटी ताली बजवाने के लिये लगवा दी गई है। इससे किसान व्यथा एवं पीढ़ा कम होने का नाम नहीं ले रही है। किसान बोवनी से लेकर अनाज बेचने तक संघर्ष का सफर करने को मजबूर है। 

बहुत ही जटिल प्रक्रिया है 

इसके अलावा विवादित संपत्तियां, मंदिरों की जमीनों से संबंधित मामले में अनुविभागीय अधिकारी की मंजूरी आवश्यक है जो एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है जिससे किसान बचने का प्रयास कर रहा है। वनाधिकार पट्टों पर खेती किसानी करने वाले किसान सहित अन्य राजस्व महकमा से परेशान किसान खाद के लिये प्रताड़ित हो रहे है। सरकार, सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधि और संगठन के नेता अपनी पीठ थपथपाकर फूले नहीं समा रहे है। एक ही दुकान पर उर्वरकों का उठाओ ना होने से किसान को अलग-अलग खाद लेने के लिए अलग-अलग कृषि केंद्रों अथवा समितियां में जाना पड़ रहा है। जिससे किसान की लागत में फर्क आ रहा है और यदि किसान पहुंच भी जाता है तो सर्वर आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जो इस प्रक्रिया को और भी जटिल बना रहा हैे

तो क्या किसान पुन: खाद उठाने का हकदार नहीं है 

ई-विकास प्रणाली के माध्यम से कितना उर्वरक का वितरण किया जाना है एवं कितने दिनों के बाद पुन: उर्वरक का वितरण होना है। इस संबंध में भी स्पष्ट दिशा निर्देश का अभाव है। विगत दिनों तेज बारिश के कारण कुछ किसानों की मक्का एवं धान आदि की फसल क्षतिग्रस्त हुई है एवं उन्हें बिजाई करने की आवश्यकता है तो ऐसी स्थिति में उन्हें खाद कहां से उपलब्ध होगी क्योंकि नियम अनुसार प्रति एकड़ एक बोरी फास्फेटिक एवं दो बोरी यूरिया खरीदी का प्रावधान है। यदि किसान की फसल बह गई या क्षतिग्रस्त हो गई और वर्षा के कारण जमीन में फास्फेटिक तत्व उपलब्ध नहीं होगा तो क्या किसान पुन: खाद उठाने का हकदार नहीं है।

खाद 12:32:06 पकड़ी गई थी लोपा पोती करने में लगा विभाग 

ई विकास प्रणाली लागू होने के बाद से अत्यधिक मात्रा में गुणवत्ता रहित बगैर टोकन एवं बगैर पीओएस मशीन की खाद बाजार में उपलब्ध है एवं कुछ कंपनियों द्वारा ग्रेड कम करते हुए खाद बगैर टोकन के बाजार में उपलब्ध करवाई जा रही है। इसी कड़ी में लगभग 8-10 दिन पहले पलारी चौराहा एवं आसपास के गांव से लगभग 250 बोरी गुणवत्ता रहित खाद 12:32:06 पकड़ी गई थी जिस पर कार्यवाही लंबित है और कृषि विभाग इस घटनाक्रम पर अपनी साख बचाने के लिए लीपा पोती करते हुए मामला दबाने की कोशिश में लगा हुआ है।

किसानों एवं व्यापारियों के बीच कहासुनी एवं मनमुटाव 

ई विकास प्रणाली लागू होने के बाद से ही किसानों एवं व्यापारियों के बीच मनमुटाव की स्थिति आम बात है। वर्तमान में समय-समय पर ई विकास प्रणाली में आवश्यकता अनुसार परिवर्तन किया जा रहे हैं इससे यह प्रतीत होता है कि उक्त नियम बिना किसी सोच समझ एवं जल्दबाजी में लागू किए गए हैं एवं बार-बार नियम  बदलने से किसानों को समस्या का सामना करना पड़ा।

समस्याओं से जूझ रहा है किसान 

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार दिनांक 2 जुलाई 2026 को पुन: एक बार नियम बदलते हुए पहले फास्फोरस उर्वरकों का उठाव आवश्यक कर दिया गया। जिस कारण पुन: किसान को समस्या का सामना करना पड़ता है पिछले साल से किसान मक्का का मूल्य, गेहूं में कम पैदावार, सरकार द्वारा कम गेहूं खरीदी एवं मार्केट रेट एवं सरकारी रेटों में फर्क जैसी समस्याओं से जूझ रहा है एवं इन सभी समस्याओं के कारण किसान आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका है। ऐसी स्थिति में पहले फास्फेटिक उर्वरक खरीदने का दबाव किसान के लिए शोषण जैसा है।

दो दुकानों के चक्कर लगायेगा किसान 

वर्तमान में किसान के लिए यह आवश्यक हो गया है कि पहले वह फास्फेटिक उर्वरक जिस दुकान से बुक हुआ है। वहां जाए और जाकर के उर्वरक खरीदें इसके बाद ही यूरिया वाली दुकान अथवा समिति से उसे यूरिया प्राप्त होगी। इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने पर पता चला कि कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर मुक्ति योजना का कोई प्रचार प्रसार भी नहीं किया जा रहा है। जिससे इसके संबंध में हो रहे परिवर्तन की जानकारी व्यापारियों एवं किसानों को प्राप्त नही हो पा रही है।

व्यापारियों का मत 

व्यापारियों से उनके मत लेने पर यह पता चला कि इस व्यवस्था में अनेको खामियां है जिसमें मशीन का ना चलना, समय पर ई विकास प्रणाली में खाद का ना चढ़ना, होलसेल विक्रेता द्वारा अधिक मूल्य खाद देना, खाद के साथ अन्य मैटेरियल देना एवं प्राइवेट के लिए कम मात्रा में खाद उपलब्ध होना शामिल है। व्यापारियों का कहना है कि खाद बुक करवाने के बाद तीन दिन का समय दिया जाता है और यदि किसान खाद नहीं लेता है तो पुन: तीन दिन बाद वह माल पोर्टल पर दिखता है। 

इससे यह दुविधा उत्पन्न हो रही है कि यदि व्यापारिक किसी व्यक्ति को खाद देना भी चाहता है और पोर्टल में खाद पूरी तरह से बुक है तो वह उस व्यक्ति विशेष को खाद नहीं दे पा रहा है। विभाग के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त करने पर ज्ञात हुआ कि सरकार द्वारा 70:30 के हिसाब से खाद का वितरण सहकारी एवं प्राइवेट दुकानदारों के मध्य किया जाता है। 

इसी कड़ी में सहकारी समितियां, एमपी एग्रो, मार्कफेड, एवं अन्य सरकारी दुकानों को 70% माल दिया जाता है जबकि प्राइवेट दुकानों के लिए 30% का कोटा निर्धारित किया गया है। जानकारी प्राप्त करने पर ज्ञात हुआ कि सिवनी जिले में सरकारी माल के वितरण हेतु अधिकतम 50 केंद्र उपलब्ध है जिनके माध्यम से युक्त 70% खाद का वितरण किया जाना एवं लगभग 800 प्राइवेट दुकानदार है जिनके माध्यम से 30% खाद का वितरण किया जाना है। यदि सरकारी मूल्य पर ही खाद का वितरण हो रही है और व्यवस्था में कोई खामी नहीं है तो कृषि विभाग प्राइवेट एवं सरकारी खाद वितरण में क्यों फर्क कर रहे हैं?

वितरण केंद्र के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त करने पर यह ज्ञात हुआ उनके पास खाद तो उपलब्ध है लेकिन वह पोर्टल में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाद डाल रहे हैं जिससे कि भीड़ एवं अन्य विवादों से बचा जा सके क्योंकि वितरण केंद्रों पर कर्मचारी की संख्या कम है और यदि अधिक खाद पोर्टल पर दिखेगी तो अधिक लोग लेने के लिए आएंगे जिससे अव्यवस्था फैल सकती हैं।

इस विषय में किसानों एवं व्यापारियों का मत है कि यदि वितरण प्रणाली में पारदर्शिता रखी जाए एवं सरकारी एवं प्राइवेट दुकानदारों के पास खाद उपलब्ध होगी तो किसानों की भीड़ नहीं होगी ओर किसानों को सुगमता से खाद प्राप्त होगी। सभी बिंदुओं से यह तो स्पष्ट होता है कि बिना किसी पूर्व अनुमान के आनन फानन में बिना कोई शोध किया एक व्यवस्था लागू कर दी गई है जो किसानों के लिए नासूर बनी हुई है।

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