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पत्रकारिता पर सत्ता, बाजार, कापोर्रेट का हावी होना चिंतनीय विषय

पत्रकारिता पर सत्ता, बाजार, कापोर्रेट का हावी होना चिंतनीय विषय

प्रजापिता ब्रह्मकुमारी परिवार कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता का बेमिसाल उदाहरण

सिवनी। गोंडवाना समय। 
वर्ष 1980 के बाद की पत्रकारिता पर सत्ता, बाजार, कापोर्रेट हावी होना शुरू कर दिया था। समय के साथ-साथ पत्रकारिता के मूल्य में गिरावट जरुर आई है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता को बरकरार नहीं रख सकते। इस दिशा में काम करने वालों की संख्या कम हो सकती है पर उनकी पहल का लाभ एक बड़े वर्ग को मिल सकता है। यह बात राजयोग केन्द्र में प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज सिवनी के लोनिया ग्राम स्थित केन्द्र में आयोजित मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता व स्नेह मिलन व परिचर्चा में मुख्य वक्ता सिवनी से शामिल हुए प्रो. कमल दीक्षित ने कही। परिचर्चा के दौरान गिरावट की बात सामने आने पर उन्होंने कहा कि कहीं न कहीं हमारे भाव हैं कि मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता का दौर वापस आए लेकिन आज हम जहां बैठे हैं वहां से वापस लाना आसान नहीं होगा। उन्होंने प्रजापिता ब्रह्मकुमारी परिवार को कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारिता का बेमिसाल उदाहरण बताया। कहा कि यह एक ऐसा सामाजिक सरोकार रखने वाला संगठन है जो 30 साल से प्रति वर्ष 2 बार पत्रकारिता के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने पहल कर रहा है। इससे बड़ा मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता का उदाहरण नहीं हो सकता। जिंदगी में धन कमाने के साथ ही इन शिक्षाओं को अर्जित करना भी उतना ही जरूरी है। महात्मा गांधी के विचार में उन मूल्यों को सिखाते हुए सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

गिरते सामाजिक और मूल्यों की बात कोई नहीं कर रहा 

आपने आगे कहा कि निरंतर विकास जीवन का नियम है और जो व्यक्ति खुद को सही दिखाने के लिए हमेशा अपनी रूढ़िवदिता को बरकरार रखने की कोशिश करता है वो खुद को गलत स्थिति में पंहुचा देता है।  गांधी जी कहते थे कि आदमी अक्सर वो बन जाता है जो वो होने में यकीन करता है। अगर मैं खुद से यह कहता रहूँ कि मैं फला चीज नहीं कर सकता, तो यह संभव है कि मैं शायद सचमुच वो करने में असमर्थ हो जाऊं। इसके विपरीत, अगर मैं यह यकीन करूँ कि मैं ये कर सकता हूँ, तो मैं निश्चित रूप से उसे करने की क्षमता पा लूँगा, भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता ना रही हो। दुनिया के लगभग सभी देशों में लोग विकास की अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं, उसमें भारत भी शामिल है। लेकिन लगातार गिरते सामाजिक और मूल्यों की बात कोई नहीं कर रहा है। जिंदगी में पैसे रुपये तो कभी भी कमाए जा सकते हैं, लेकिन नैतिक मूल्य जैसी चीजें इंसान को काफी संयम और सही मार्गदर्शन के बाद ही हासिल होती हैं। जिनके लिए ये मूल्य मायने रखते हैं उनके लिए रुपये-पैसे और बाकी सुख सुविधाओं की कीमत कम हो जाती है। जिंदगी में धन कमाने के साथ ही इन शिक्षाओं को अर्जित करना भी उतना ही जरूरी है। महात्मा गांधी के विचार में उन मूल्यों को सिखाते हुए सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

गिरते सामाजिक मूल्य को सिर्फ आध्यात्म के माध्यम से ही बचाया जा सकता है

आपने कहा कि गिरते सामाजिक मूल्य को सिर्फ आध्यात्म के माध्यम से ही बचाया जा सकता है उसके अतिरिक्त कोई उपाय नही है । श्री दीक्षित ने अनेक उदाहरण के माध्यम से इस बात को मीडिया कर्मियों के समक्ष रखा इस अवसर पर ब्रम्हकुमारी ईश्वरी आश्रम की प्रमुख ज्योति दीदी, गीता दीदी एवं भ्राता धनराज, योगेश विश्वकर्मा सहित मीडिया कर्मियों में समीम खान, अजय ठाकरे, अजय राय, शरद दुबे, गोपाल चौरसिया, अमरनाथ चतुवेर्दी, लिमटी खरे, महेन्द्र देशमुख, आर के सेंगर, नितिन यादव, लोकेश उपाध्याय, मंजूला कौशल, क्षितिज कौशल, जितेन्द्र ठाकुर, संतोष बंदेवार, शरद छांगवानी, जिब्राईल मंसूरी, रवि सनोडिया, संजय अग्रवाल, प्रदीप धोगड़ी, संजय जैन, चेतन गांधी सहित अनेक लोग उपस्थित हुये। इस अवसर पर सभी मीडिया कर्मियों का शाल श्रीफल एवं स्नेह भोज के साथ सम्मान श्री कमल दीक्षित द्वारा किया गया।

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