Thursday, July 15, 2021

पृथक गोंडवाना राज्य के संघर्ष साथ अब 21 जुलाई को गोंडी भाषा मानकीकरण दिवस को उत्सव के रूप में मनायेंगे-रविकांत पंन्द्रो

पृथक गोंडवाना राज्य के संघर्ष साथ अब 21 जुलाई को गोंडी भाषा मानकीकरण दिवस को उत्सव के रूप में मनायेंगे-रविकांत पंन्द्रो


कमलेश गोंड, राष्ट्रीय संवाददाता
मंडला। गोंडवाना समय। 

प्रथम गोंडवाना राज्य के लिए राज गोंडों का पहली बैठक वर्ष 1917 में हरई जिला (छिंदवाड़ा ) हुई थी। वहीं वर्ष 1927 और वर्ष 1930 में भी बैठक हुई थी। इसके बाद वर्ष 1933 में राजा जौहार सिंह नें इस माँग के लिए 11 हजार एक कोष की स्थापना की, गोंडवाना आदिवासी सेवा मंडल के अध्यक्ष नारायण सिंह उइके ने वर्ष 1955 में नागपुर विधान मंडल में गोंडवाना राज्य की माँग को लेकर सिफारिस की थी उस समय के आविभाजित छत्तीसगढ़ के विधान सभा के सदस्यों नें भी समर्थन किया था। वही कंगाली माँझी ने वर्ष 1959 से 1962 के बीच गोंड अंचल में विस्तृत यात्रा की थी, उन्होंने माँग रखी थी कि गोंडवाना राज्य का निर्माण किया जाये। वहीं उन्होंने वर्ष 1959 में भारतीय गोंडवाना माँझी संघ मांझी सरकार के ओर से अपना ताज अपना राज्य की घोषणा की, मध्यप्रदेश के राज गोंडों नें वर्ष 1960 में रायपुर में आयोजित देबर कमीशन के सामने गोंडवाना राज्य की माँग रखी। 


जिसमें छत्तीसगढ़ को गोंडवाना राज्य का दर्जा दिये जाने की सिफारिस की गई। जिससे यहाँ के आदिम समुदायों का समुचित विकास होगा परंतु सीधे साधे मूलवासियों को झूठ बोलकर 1 नवंबर 2000 को आनन फानन में गोंडवाना राज्य की बजायें 36 गढ़ राज्य बना दिया गया। देश के सभी आदिम समुदायों के साथ बहुत ही कुठाराघात किया गया हैं। वहीं 9 मई 1969 को राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष एक प्रतिवेदन दिया गया था, जिसमे कहा गया था कि आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य का निर्माण 36 गढ़ तथा रीवा राज्य को मिलाकर गोंडवाना राज्य बनाया जाये।  

गोंडवाना राज्य संग्राम की स्थापना के लिये परिषद का गठन किया गया-


वर्ष 1996 में गोंडवाना राज्य संग्राम की स्थापना की गई। जिसमे संयोजक स्वयं शीतल मरकाम, मंशाराम कुम्हरे. राजा वासुदेव शाह टेकाम. बालकृष्ण मंडावी आदि थे। इस परिषद के द्वारा पृथक गोंडवाना राज्य निर्माण हेतु दिनाँक 27 अक्टुबर 1996 में लिंगों मैदान न्यू रामदासपेठ नागपुर में गोंडवाना परिषद का आयोजन किया गया था। इस परिषद का उद्घघाटन गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम जी (विधायक ) मध्यप्रदेश ने किया था, अध्यक्षता रामाराव घोडाम आदिलाबाद (आंध्रप्रदेश) ने की थी। इस परिषद में गोंडवाना राज्य की माँग की गई तथा संपूर्ण भारत में 14 करोड से अधिक गोंड लोगों की जनसंख्या हैं जिनकी मातृभाषा गोंडी हैं, गोंडवाना राज्य के लिए दीर्घकालीन संघर्ष होते रहे लेकिन परबुधियाओं के कारण गोंडवाना राज्य का सपना पूरा नही हुआ। 

आजाद भारत में हुआ भाषावार राज्य का गठन लेकिन गोंडी बोलने वालों को नहीं मिला गोंडवाना राज्य-


आप सभी जानते हैं की भारत सन 1947 को आजाद हुआ और  स्वतंत्रत भारत वर्ष सन 1956 में भाषावार राज्यों का गठन किया गया जैसे बंगालियों को बंगाल. तमिलों को तमिलनाडु. मद्रासियों को मद्रास.पंजाबियों को पंजाब. मराठियों को महाराष्ट्र. गुजरातियों को गुजरात. बिहारियों को बिहार. उड़िया को उड़ीसा. जब गोंडवाना राज्य की बात आई तो ये परबुधिया लोग आनन फानन में छत्तीसगढ़ियों को छत्तीसगढ़ और झारखंडियों को झारखंड दे दिया गया। गैरों के राजनैतिक दबाव के चलते आदिवासी बाहुल्य राज्य को मध्यप्रदेश का नाम दिया गया जो की इस क्षेत्र में रह रहे मूलवासी के साथ घोर अन्याय हुआ हैं। सैंधवी लिपि के ज्ञाता पेंनवासी मोती रावण कंगाली जिन्होने गोंडी भाषा के एक-एक शब्दों को समझकर कोयापुनेम में जोड़कर रखा, उसी तरह पेंनवासी दादा सून्हेर सिंह ताराम साहित्य के माध्यम से समाज में वैचारिक जागरूक आया हैं। आदिम समुदाय के लोग अपने आपको पहचाननें लगे हैं वह अपने रूढ़ि व्यवस्था, भाषा, संस्कृति अपने इतिहास को जानने समझने लगे हैं और स्वावलंबन मुक्त होकर अपने गढ़ किला को सँवारेंगे तो निश्चित ही समाज का उत्थान कर समाज में नई चैतना जरूर आयेगी तब ही ये सपना पूरा व सच होगा, तभी गोंडवाना राज्य की स्थापना होगी और गोंडी भाषा को दुनिया के आदिम समुदाय अपनी बोली भाषा को पहचान बरकरार रखेंगे।

गोंडवाना की खोयी चेतना

नव जागरण की इस प्रभात बेला में गोंडवाना की खोई हुई चेतना को पुन: प्राप्त करना हैं तो यही युग का संदेश हैं। गोंडवाना राज्य स्थापना के लिए सोई हुई समाज को जगाने के लिए आखरी कड़ी में गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह जी मरकाम खुद पेंनवासी हो चुके हैं। दादा के दर्शन और उनका जो सपना था वो जिम्मेदारी आप हम पर छोड़ दिये हैं, उसे साकार करने में कर्तव्यनिष्ठ होकर समाजिक, धार्मिक एवं राजनीति का परिचय दे व समाज के उत्थान कर पहले के गोंड राजाओं के द्वारा 1750 वर्ष तक राज्य सत्ता कायम किये, उसी प्रकार आज शपथ लेते हैं की समाज के साथ कंधा से कंधा मिलाकर गोंडवाना राज्य का ताना बाना बुनकर राज्य व्यवस्था कायम करें अब गैरों के ऊपर कभी विश्वास ना करें, वोट हम देते हैं, बनते हैं वो विधायक, सांसद, मंत्री लेकिन बाद में वोट देने वाला ही अपने हक अधिकार पाने के लिए रोड़ पर आंदोलन करना पड़ता हैं। 

भाषा का लुप्त होना किसी बड़ी त्रासदी से कम नही हैं

आज गोंडी भाषा, अपनी मातृ भाषा को बोलने में कोई कठिनाई नही हैं लेकिन लिखने के लिए कोई साधन नही हैं ऐसा क्यों हैं ? सबके तर्क अलग हैं नई पीढ़ी को गोंडी भाषा की जानकारी नहीं हैं और आने वाले पीढ़ी को भी नहीं हो पायेगी क्योंकि यह भाषा तेजी से लुप्त होती जा रही हैं। गोंडी, ओराव, मल पहाड़िया खोंड और पारजी जैसे कुछ जनजाति भाषाएँ ऐसी भाषाएँ हैं जो अपने-आप में अनूठी हैं और इन्हे किसी भाषा का लुप्त होने के साथ न सिर्फ उस भाषा का लुप्त होना किसी बड़ी त्रासदी से कम नही हैं। भाषा के लुप्त होने के साथ न सिर्फ उस भाषा के बोलने वाले खत्म हो जाते हैं बल्कि उनका गौरव पूर्ण इितहास भी खत्म हो जाता हैं। 

प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा के माध्यम से दी जाये 

विद्वानों का मानना हैं की जिस देश की संस्कृति खत्म करनी हो या देश को खत्म करना हो तो उसकी भाषाओ को खत्म कर दो, संस्कृति स्वत: खत्म हो जायेगी। आज भारत में जनजातियों की भाषाएँ खत्म की जा रही हैं, जबकि भाषा का प्रश्न उनकी अस्मिता से जुड़ा हुआ हैं, उनकी 600 भाषा /बोलियाँ हैं, जिनमे से 90 में साहित्य लिखा जा रहा हैं। दुनिया के किसी भी देश में इतनी भाषाओं में साहित्य नही लिखा जा रहा हैं। भारतीय सँविधान के अनुच्छेद 350 अ में यह प्रावधान किया गया हैं कि जहाँ जहाँ गोंडी भाषी राज्य हैं पढ़ने वालों छात्रो को मातृभाषा में ही प्रारंभिक शिक्षा दे। वही संविधान में 2 जनजाति भाषा संथाली और बोडो भाषा को 8 वी अनुसूची में रखा गया हैं। छोटा बच्चा अपनी मातृभाषा में सोचता हैं, इसलिए मातृभाषा बच्चें के जीवन के अभिन्न अंग हैं और अविस्मरण निधि होती हैं। बिना किसी बहस के बच्चे की शिक्षा का माध्यम उसकी मातृभाषा ही होनी चाहिए अब यहाँ मातृभाषा से संदर्भ ये हैं की उसके परिवार में बोली जाने वाली भाषा उसके कुल में बोली जाने वाली भाषा जनजातियों की विभिन्न भाषाओं की बचाने के का एक मात्र तरीका यही हैं कि जनजाति बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा के माध्यम से दी जाये। यदि इन बच्चों की प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य कर दिया जाये तो इन भाषाओं का भविष्य सुरक्षित रह सकता हैं फिर भी जनजातियों की शिक्षा को उनकी अपनी मातृभाषा में न देकर प्रदेश की राज्य भाषा में दिया जा  रहा हैं। 

जिन देशो की भाषाएँ खतरे में हैं उनमे भारत शीर्ष पर हैं

राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने के नाम पर शिक्षण के दायरे से जनजाति भाषाओं को बहिष्कृत रखा गया है। आज दक्षिण के सभी राज्यों में जनजातियों की भाषाएँ गायब हो रही हैं, उनकी संस्कृति और अस्मिता लुप्त होने की कगार पर संयुक्त राष्ट्र संघ के संस्कृतिक संघठन यूनेस्को की रिपोर्ट अ३’ं२ ङ्मा ६ङ्म१’ ि’ं१ॅी२३ ’ंल्लॅ४ँी ्रल्ल ंिल्लॅी१ 2009 में कहा हैं कि मौजदा सभी भाषाओं में से तकरीबन 90 फीसदी भाषाएँ अगले 100 वर्षों में अपना वजूद खो सकती हैं, जिन देशो की भाषाएँ खतरे में हैं, उनमे भारत शीर्ष पर हैं। यहाँ 196 भाषाएँ मिटने की कगार पर हैं। दुनिया भर में बढ़ रहे हैं, आर्थिक और बौद्धिक साम्राज्यवाद के चलते अंगेजी या दूसरी वर्चस्व वाली भाषाएँ तेजी से विकास कर रही हैं, जो भाषाएँ सीधे तौर पर आर्थिक रूप से जुड़ी हैं और शासन सत्ता को प्रभावित करती हैं। वे अपना विकास तेजी से कर रही हैं। वही जो भाषाएँ कमजोर वर्गो के समुदायों की हैं वे नष्ट हो रही हैं क्योंकि उनमे रोजगार की कोई गारंटी न होने के कारण उस समुदाय के लोग भी भाषाई पलायन करके उस भाषा का दामन थाम रहे हैं।  


इसलिए सगा समाज में गोंडी भाषा को जिंदा रखना हमारा मूल्य कर्तव्य है

जिनमे रोजगार की सुरक्षा मिलता हैं, भाषा एक सामाजिक संपति एवं सामूहिक विरासत हैं। इसलिए किसी भाषा की मौत एक जाति समुदाय उसके इतिहास सांस्कृतिक मूल्यों और सौंदर्य चेतना का अंत हैं। जिसके निर्माण में सदियों बीत जाता हैं, उसे बचायें रखना कर्तव्य हैं। मौजूदा परिस्थति यह हैं कि आपको गोंडी न आती हो किन्तु आप अपने बच्चों को या अभी नई पीढ़ी को प्रेरित करें की वह गोंडी भाषा को सीखे बोले इसलिए नहीं कि गोंडी भाषा बोलने में भी हैं, गोंडी भाषा बोलने में लिखने पर गर्व होना चाहिए कि एक ऐसी भाषा जिसके मापदंड को प्रकृति के स्वरों से मापा जाना चाहिए और उसकी गुणवक्ता कितनी उच्च होने वाला, इसलिए सगा समाज में गोंडी भाषा को जिंदा रखना हमारा मूल्य कर्तव्य हैं। 

मध्यप्रदेश के 35 लाख लोग गोंडी बोलते है-कमलेश मारको


21 जुलाई को गोंडी भाषा मानकीकरण उत्सव के संबंध में गोंडवाना महासभा के नव नियुक्त युवा प्रदेश अध्यक्ष तिरूमाल कमलेश मरकाम ने बताया कि सिर्फ मध्यप्रदेश में 35 लाख लोग गोंडी भाषा बोलते हैं राष्ट्रीय स्तर की बात करे तो सवा सौ करोड़ लोग प्रचीन कोया भाषा (गोंडी भाषा) बोलते हैं, उन्होने यह भी कहा गोंडवाना समग्र विकास क्रांति आंदोलन से जुड़े गोंडवाना महासभा एवं जितने भी सामाजिक  संघठनों के द्वारा गोंडी भाषा मानकीकरण दिवस को उत्सव के रूप मनायेगी। ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर, संभाग स्तर एवं राष्ट्र स्तर पर इस दिवस को उत्सव के रूप में मनाया जाऐगा और समाज के द्वारा देश के महामहिम राष्ट्रपति के नाम पर ज्ञापन सौपकर उस भाषा को 8 वी अनुसूची में शामिल करने हेतु ज्ञापन देंगे और इस उत्सव दिवस को गोंडवाना महासभा मध्यप्रदेश ने आह्वान करती हैं की सभी गाँवो कस्बो तहसील जिला स्तर पर इसी दिन 21 जुलाई को उत्सव के रूप में हर लोग मनायें। 

No comments:

Post a Comment

Translate